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Friday, October 11, 2013

वो सचिन का “असर” था...ये सचिन का “असर” है !

आगे बढ़ने से पहले..
मनीष शर्मा
(स्पोर्ट्स हेड: महुआ न्यूज)
बात 1995-96 की है| मैं उत्तर प्रदेश स्पोर्ट्स कॉलेज (लखनऊ) में था| दीपावली की छुट्टियों पर घर आया हुआ था| रिश्तेदारों, मुहल्ले और आस-पास के इलाकों में नाम हो चला था| मेरी माता, जिनकी पृष्ठभूमि पूरी तरह से ग्रामीण है, और जिनके लिए क्रिकेट का मतलब काला अक्षर भैंस बराबर था, का इसी वजह से खेल में इंट्रेस्ट पैदा हुआ| भारत का कोई मैच चल रहा था और सचिन आउट हो गए| मेरे मुंह से निकला: 

“ओह शिट, सचिन आउट हो गया....”

मम्मी ने खाना बनात-बनाते कहा;

“कोई बात नहीं सचिन आउट हो गया..तेंदुलकर तो बाकी है न, वो मैच जिता देगा”

ये वो बात है, जिसे लेकर आज भी मम्मी की खिंचाई करते हैं...

बहरहाल, ये वो दौर था, जब सचिन कमोबेश हर दिन हिंदुस्तान के घर-घर (गांव के दूर दराज के एरिया में भी) में चर्चा का विषय बन चुके थे...उनकी आभा एक नया मुकाम गढ़ने की ओर बढ़ रही थी...वो मां-बाप भी अपने बच्चों में सचिन को ढूंढने लगे थे, जिन्हें न क्रिकेट समझ में आती थी, न ही जिनकी खेल में तनिक भी रुचि थी| लेकिन सचिन ने ऐसे ही न जाने कितने लाखों-करोड़ों लोगों का क्रिकेट से परिचय ही नहीं कराया, बल्कि खेल का और अपना मुरीद भी बना दिया....इसमें उन घरेलू महिलाओं की संख्या भी बहुत बड़ी तादाद में थी, जिनकी दुनिया टीवी सीरियलों या रसोईघर तक ही सीमित थी....ये सचिन का असर था...

भारत तेजी से (उस दौर में) में आर्थिक तरक्की की ओर अग्रसर था और उदारीकरण के बाद अगर बाजार, या विदेशी कंपनियां और ज्यादा क्रिकेट पर मेहरबान होना शुरू हो गए, तो उसमें सचिन का असर सबसे बड़ा था...धोनी आज भले ही भारतीय बाजार और ब्रांड्स (विज्ञापनों) के बादशाह बने हुए हैं, लेकिन सच ये है कि इसकी नींव करीब डेढ़ दशक पहले सचिन ने ही रखी थी।

सचिन का पहली बार जब साल 1995 में वर्ल्ड टेल से करोड़ों का करार हुआ, तो वो मां-बाप जिनकी जुबां पर एक ही मुहावरा रहता था- “पढ़ोगे लिखोगे, बनोगे नवाब’, खेलोगे कूदोगे बनोगे खराब, बच्चों को खुद मैदान पर लेकर पहुंचने लगे....बेटे के सचिन बनने की उम्मीदों के साथ..ये सचिन का असर था.

वो भी समय आया, जब भारतीय टीम की जीत और सचिन और एक-दूसरे के पूरक बन गए...वो भी समय था, जब सचिन का चलना टीम की जीत होता था...सचिन का जल्द आउट होने का मतलब था टीम की हार....ऐसे भी करोड़ों क्रिकेटप्रेमी थे, जो सचिन के आउट होते ही टीवी का स्विच ऑफ यकर देते थे...ये दौर लंबे समय तक चला...और ये वो दौर (अच्छा खासा) था, जब सचिन वास्तव में खेल से बड़े हो गए!!


शायद मैं गलत हो सकता हूं कि लेकिन सचिन ने अपनी सर्वश्रेष्ठ क्रिकेट (चरम परफॉर्मेंस, कंसिस्टेंसी) 95 से 2000 तक खेली...कई प्रथम श्रेणी (रणजी, दलीप ट्रॉफी) क्रिकेटरों को मैंने सचिन की तकनीक की नकल करने पर घंटों पसीने बहाते देखा...कई क्रिकेटरों का करियर सचिन की नकल करते-करते खत्म हो गया...ये कहते कहते- “देख, सचिन की तरह ही खेला न ये शॉट”...ये सचिन का असर था, लाख कोशिशों के बावजूद इक्का दुक्का क्रिकेटर सचिन की तकनीक के आस-पास पहुंच पाने में कामयाब रहे..मसलन वीरेंद्र सहवाग। ये सचिन का असर था.....करोड़ों बच्चे मैदान पर सचिन बनने पहुंचने...कभी नहीं ही बन सकते थे...लेकिन टीम इंडिया को सहवाग मिल गए.. विराट कोहली मिल गए...ये सचिन का ही असर है...अब सचिन क्रिकेट से जा रहे हैं....ड्रेसिंग रूम में, भारतीय क्रिकेट में इससे बहुत ही बड़ा शून्य पैदा हो जाएगा??...क्या ये कभी भर पाएगा???...क्या हमारे मरने तक???.....क्या अगले सौ-डेढ़ सालों तक??........ये सचिन का असर है....और ये असर हमेशा रहेगा!!...ब्रह्मांड में क्रिकेट के अस्तित्व तक जब भी बड़े परिप्रेक्ष्य में क्रिकेट पर गंभीर चर्चा होगी, तो सचिन के इस असर की चर्चा अनिवार्य रूप से होगी ही होगी और करनी पड़ेगी...क्योंकि बिना इस चर्चा के क्रिकेट की हर बाइबल, महाभारत और क्रिकेट का हर ग्रंथ अधूरा रहेगा...धन्यवाद सचिन बहुत बहुत धन्यवाद...इतना ढेर सारा आनंद और गौरव देने के लिए...!

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