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Wednesday, November 6, 2013

आखिर टीवी में खबरों का टोटा क्यों है... Nadeem S. Akhter



आखिर टीवी में खबरों का टोटा क्यों है??---------------------------

नदीम अख्तर
प्रोफेसर, आईआईएमसी

खबर के लिए मैं कभी किसी एक माध्यम पर निर्भर नहीं होता. जब-जैसी जरूरत होती है, उस चीज का सहारा ले लेता हूं. इंटरनेट, टीवी, रेडियो, अखबार, सोशल मीडिया और मित्रगण. ऐसा भी नहीं है कि इनमें से कोई एक चीज किसी दिन ना देखूं-सुनूं तो खाना हजम नहीं होगा, बेचैनी बढ़ जाएगी, बीपी बढ़ जाएगा. 
मैं इस बात से भी इत्तफाक नहीं रखता कि अगर अखबार नहीं आए-मिले तो टीवी के लिए खबरों का टोटा पड़ जाएगा. अगर ये बात है तो क्या यह मान लिया जाए कि अखबार में सुपर रिपोर्टर्स रहते हैं और टीवी में कमतर रिपोर्टर. नहीं, ऐसा नहीं है. ये इस बात पर निर्भर करता है कि आपने अपने खबरों के संचयन का कैसा तरीका अपनाया हुआ है. अगर आपने निर्भरता अखबार पर बढ़ाई है तो ये आपकी समस्या है. वरना टीवी चैनल्स के पास रिपोर्टर्स और स्ट्रिंगर्स का जो लंबा चौड़ा देशव्यापी नेटवर्क होता है, वह तो अच्छे-अच्छे बड़े अखबारों के पास भी नहीं होता. हर प्रमुख राज्य में एक ब्यूरो चीफ और उसके साथ उस राज्य में ही रिपोर्टर्स-स्ट्रिंगर्स की एक पूरी सेना. तब अंदाजा लगा लीजिए कि भारत में कितने राज्य हैं और ये नेटवर्क कितना बड़ा होगा. और अखबार की तरह टीवी में भी स्ट्रिंगर्स को बंधा-बंधाया पैसा देने की परंपरा नहीं है. अगर भूले-भटके कभी स्टोरी चल गई तो उसका पैसा मिल जाता है. लेकिन स्ट्रिंगर अपने इलाके में उस चैनल (या यूं कहें कि कई चैनल्स) का संवाददाता बनकर सालभर घूमता है. खबरें शूट करके भेजता भी है. ये अलग बात है कि उचित मार्गदर्शन के आभाव में और टीआरपी की रेस के कारण उसकी भेजी ज्यादातर खबरें Assignment desk कूड़े के डिब्बे में डाल देता है. हर टीवी चैनल में यही होता है. हिन्दी का हो या अंग्रेजी का या किसी और भाषा का. और फिर कहा जाता है कि टीवी में खबरों के लाले पड़ गए हैं. आखिर कैसे भइया???
तो जरुरत अखबारों पर निर्भरता बनाने-बताने की बजाय अपना सिस्टम सुधारने की है. टीवी के अगर कुछ रिपोर्टर आरामतलब या यूं कहें कि -खबर उठाऊ- टाइप हो गए हैं, तो इसे कौन ठीक करेगा?? इसके लिए कौन जिम्मेदार है??? आप न्यूज मीटिंग में अखबार के रिपोर्टर से बात करिए और टीवी के रिपोर्टर से. अखबार का रिपोर्टर जहां आपको तीन-चार स्टोरी आइडिया बताएगा, वहीं टीवी का रिपोर्टर एक या ज्यादा से ज्यादा दो आइडियाज. ये ठीक है कि दोनों माध्यम अलग हैं और दोनों में खबरों के चयन-प्रकाशन-प्रसारण के अलग नियम-रूल्स होते हैं, तरीका होता है, पर ये तो हो ही सकता है कि जो पत्रकार जिस विधा में काम कर रहा है, वह उसकी जरूरतों के अनुसार स्टोरी आइडिया ढूंढे और बताए. और अगर विधा का बहाना बनाकर आप अपनी कमजोरी छुपाते हैं तो फिर अखबार से स्टोरी उठाकर उसे टीवी के लायक आप कैसे बना लेते हैं?? ये भी बताना होगा.
सच ये है कि टीवी में news gathering का वही पुराना चला-चलाया ढर्रा आज तक चल रहा है. कुछ एजेंसी से ले लो, कुछ अखबार देख के उठा लो और एकाध स्टोरी अपना टीवी वाला रिपोर्टर तो बता ही देगा. अगर ये भी कम पड़ गया तो इंटरनेट पर कोई तड़क-भड़क-सांप-बिच्छू-भूत-प्रेत-रहस्य-रोमांच वाली स्टोरी खोज लो. फिर youtube से उससे मिलते-जुलते विजुअल निकालो और पैकेजिंग करके स्टोरी या आधे घंटे का शो बना दो. मेरे ख्याल से ज्यादातर चैनलों में यही हो रहा है. सच तो ये है कि news gathering और content planning पर यहां नए सिरे से सोचने की जरूरत है. और ये तभी होगा जब आपकी priorities तय होंगी. खबरों को लेकर क्या दृष्टिकोण अपनाना है, कैसी खबरें लेनी है या चलानी है, ये guidelines क्लियर होंगे. फिलहाल तो ये दिखता है कि एक दफा hard news और सरोकारी खबर की बात टीम से कह दी जाती है और अगले ही पल चैनल का एजेंडा बदल जाता है. जब दूसरे चैनल हजार टन सोना ढूंढने निकलते हैं तो फिर क्या दूध और क्या पानी. सब बराबर. फिर सारे एजेंडे एक तरफ और टीआरपी वाली खबर सब पर भारी. यानी खजाना ही चलेगा, बाकी स्टोरीज गईं तेल लेने. Assignment और रिपोर्टर्स की सारी मेहनत बेकार. वो भी हाथ पर हाथ धरे बैठ जाते हैं कि जब स्टोरी चलनी ही नहीं है तो फिर काहे कोई सिर फोड़े. 
लेकिन अखबार में ऐसा नहीं है. अगर खबर मंगाई जाती है या भेजी जाती है तो यथासंभव उसे तवज्जो दी जाती है. अगर स्टोरी में -time value- है तो उसे story bank मे डाल दिया जाता है और जरूरत पड़ी तो नए सिरे से डिवेलप कराकर स्टोरी छापी जाती है. रिपोर्टर्स की मेहनत बेकार नहीं जाती वहां पर. उनका हौसला इतना नहीं तोड़ा जाता, जितना टीवी में तोड़ा जाता है. जब 1000 टन खजाना चलेगा तो फिर डिस्कशन भी उसी पर होगा, स्टोरी भी उसे से संबंधित जाएगी. तब आपके नैशनल-मेट्रो-स्टेट ब्यूरो sleeping mode में चले जाएंगे. हां, अगर कुछ Breaking हो गया तो थोड़ी देर के लिए उस खबर पर जाएंगे और फिर पुराने ढर्रे-आलाप पर लौट आएंगे. 
सो टीवी में जब खबरों के चयन-संचयन-प्रसारण और उसकी योजना का ये हाल होगा तो -खजाने वाली या उसके जैसी स्टोरी- नहीं होने पर आपके यहां खबरों का टोटा तो होगा ही. इसके लिए आप लोग ही जिम्मेदार हुए ना. वरना यदि रोज priority के अनुसार खबर मंगाने और उसे चलाने का ढर्रा बना दिया जाए तो टीवी माध्यम के हिसाब से ही (visual के साथ) खबरों का टोटा या कंगाली कैसे होगी???!!! इतना विशाल देश है और पल-पल यहां कई खबरें जन्म ले रही हैं. ऐसे में अखबार के बिना खबरों के आकाल की बात मेरे गले नहीं उतरती. हां, ये जरूर है कि टीवी वालों को यदि आरामतलबी की आदत हो गई है, दूसरों की मेहनत टीपने की लत पड़ गई है (अखबार से खबर उठाकर उसे लीपपोत के पेश कर दो) और ये उनके work culture में शामिल हो गया है, तो खबरों का टोटा उनको जरूर होगा. और ये work culture ऐसा है, जो हर सीनियर अपने जूनियर को सिखाता जा रहा है, पीढ़ी दर पीढ़ी. कि बेटा, ज्यादा दिमाग मत लड़ाओ. ऐसे प्लान करो और बॉस को खबरें परोस दो. चल गया चैनल.
तो अखबार की ही तरह टीवी में जरूरत है long term planning की. अरे खबरें इतनी है कि आप चला नहीं पाओगे. 24 घंटे कम पड़ जाएंगे आपको. बस जरूरत है मजबूत इच्छाशक्ति की और ढर्रा बदलने की हिम्मत की. जब टीवी इस देश में शुरु हुआ तो किसी ना किसी ने बैठकर इसके लिए news gather का तरीका बनाया होगा ना. तो इतना समय बदल गया, जरूरतें बदल गईं, दर्शकों के टेस्ट बदल गए, मार्केट का dynamics बदल गया, फिर खबरों के संकलन का तरीका लगभग पहले जैसा ही क्यों, क्यों वही पुराना ढर्रा?? लगभग सारे चैनलों में. अपनी जरूरत के हिसाब से अपना खुद का तरीका डिवेलप करिए ना. नया work culture बनाइए ना. अगर ये बन जाए तो शायद टीवी की खबरों में भी कुछ ताजगी आए. रिपोर्टर्स का हौसला बढ़े और फिर खबरों का टोटा ना रहे. कितना अच्छा हो हर चैनल पर हर तरह की खबर. सबके अपने-अपने exclusive. अखबार के भी अपने exclusive. फिर टीवी और अखबार एक-दूसरे से खबरें ले और डिवेलप करे. यानी News-खबरों का पूरा bombardment. जनता की जय-जय. सबका दुख सुना जाएगा, सबसे हिसाब लिया जाएगा. यही तो है लोकतंत्र का असली मतलब और मीडिया के चौथे खंभे होने की सार्थकता.

Monday, November 4, 2013

मीडिया हाउसेज के स्वार्थ, तो ओपिनियन पोल्स पर बैन क्यों नहीं?



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Nadeem Akhtar,
Pro., IIMC
 

बहुत-बहुत अच्छा होगा, अगर बेसिर-पैर के टेढ़े-मेढ़े ओपिनियन पोल पर पाबंदी लग जाए. इस लोकतंत्र का भला होगा. हां, ऐसे सर्वे कराने वाले बहुत से संस्थानों की दुकानदारी बंद हो जाएगी, टीवी चैनलों पर एक high profile TRP मसाला कम हो जाएगा, उनकी 'Bargaining' की ताकत कम हो जाएगी, टीवी स्क्रीन पर चुनाव परिणाम का ज्ञान देने वाले विद्वतजनों की कमाई थोड़ी घट जाएगी और टीवी से लेकर प्रिंट मीडिया तक किसी पार्टी-व्यक्ति विशेष को चुनाव में आगे दिखाकर मतदाताओं को गुमराह करने की प्रवृत्ति पर रोक लगेगी. 
ये opinion poll भी टीवी के TRP Meter की तरह ही फ्रॉड होते हैं. महज कुछ हजार लोगों की 'राय' जानकर ये करोड़ों-लाखों लोगों द्वारा दिए जाने वाले वोट का रूझान बता देते हैं. यानी सैम्पल साइज इतना छोटा कि पूरा का पूरा सर्वे ही निरस्त किए जाने लायक है. यही हाल TRP बताने वाले method का भी है. लेकिन चालबाजी देखिए कि शुतुरमुर्ग की तरह मुंडी बालू में घुसाकर शान से TRP & Opinion Polls को ऐसे प्रोजेक्ट किया जाता है, जैसे भाई लोगों ने एक-एक घर जाकर पूछा हो. उनके दिमाग-टीवी सेट को स्कैन किया हो. हद होती है बेशर्मी की भी. 


लेकिन इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता. ये बहुत बड़े वाले बेशर्म हैं. गालथेथर हैं. गालबजाऊ हैं. इस अवैज्ञानिक सर्वे को वो ऐसे आपके सामने पेश करते हैं, जैसे बस चुनाव होने की देर है. सरकार उसी पार्टी की बनेगी, जिसकी वो बात कर रहे हैं. इनकी पोल तो उसी समय खुल गई थी, जब 2004 में सारे ओपिनियन पोल्स ने एनडीए की सत्ता में वापसी का बिगुल बजा दिया था. अटल बिहारी वाजपेयी के 'करिश्मे' और इंडिया शाइनिंग के नारे के साथ बीजेपी को कॉरपोरेट्स-बाजार-ओपिनियन पोल्स ने दुबारा गद्दी मिलने की बात कही थी. लेकिन हुआ इसके ठीक उलट. कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए ने एनडीए को बुरी तरह पछाड़ दिया. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने और Opinion Polls की ऐसी पोल-पट्टी खुली की पूछिए मत. फिर भी ये ऐसे छिछोरे हैं कि अब तक जमे हुए हैं. हर इलेक्शन से पहले इन्हें अपनी तिजोरी भरनी होती है. राजनीतिक पार्टियों और मीडिया हाउसेज के एजेंडे को implement करना होता है. और बहाना होता है opinion polls का.


सबसे गंभीर चर्चा का विषय ये है कि जिन media houses के मार्फत ये opinion polls दिखाए-छापे जाते हैं, ये देखना बहुत जरूरी है कि उन media houses का मालिकाना हक किनके पास है? कुछ चैनलों और अखबारों का मालिकाना हक तो सीधे-सीधे किसी पार्टी के नेताजी के पास है. तो क्या यह संभव है कि अपने चैनल या अखबार के माध्यम से नेताजी जो opinion polls दिखाएंगे या छापेंगे, उसमें वह अपनी पार्टी की हार दिखा दें और विरोधी की जात दिखा दें. ऐसा ना आज तक हुआ है और ना होगा. तो इसका मतलब है कि सीधे-सीधे वह अखबार या चैनल संबंधित पार्टी का मुखपत्र बन जाता है, जिसे -एक निष्पक्ष मीडिया हाउस का सर्वे- बताकर opinion polls बाजार में बेचे जाते हैं. इसके द्वारा जनता की राय को प्रभावित करने की कोशिश की जाती है. यानी हींग लगे ना फिटकरी और रंग भी चोखा. संबंधित पार्टी के घोषित मुखपत्र के अलावा यह एक ऐसा -अघोषित मुखपत्र- होता है, जिसे निष्पक्ष मीडिया का लबादा ओढ़ाकर राजनीतिक पार्टीयां पर्दे के पीछे से खेल करती हैं.


अब बात उन मीडिया हाउसेज की, जिनके मालिक किसी राजनीतिक पार्टी से नहीं जुड़े हैं. लेकिन यहां भी पूंजी निजी हाथों में केंद्रित है. कुछ मालिकों के मीडिया बिजनेस के अलावा भी कई तरह के लंबे-चौड़े बिजनेस होते हैं. साथ ही कुछ मीडिया हाउसेज के शेयरों को देश की नामी-गिरामी कंपनियों के मालिकों ने खरीद रखे हैं. सो खेल यहां भी होता है. कभी पेड न्यूज की शक्ल में तो कभी.... जब आपके business interests होंगे तो जाहिर है, सरकार आपको प्रभावित कर सकती है. करती भी है. साथ ही कुछ media houses के मालिक किसी खास पार्टी के प्रति वफादार देखे गए हैं. उनकी यह वफादारी अखबार में उनके संपादकीयों और टीवी में खबरों के सेलेक्शन-प्रसारण तथा कुछ खास खबरों को drop करके उन्हें ना दिखाने की policy के तहत देखने-जानने को मिलती रहती है. ऐसी स्थिति में इस बात का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है कि ये तथाकथित ---स्वतंत्र और निष्पक्ष-- मीडिया संस्थान अगर opinion poll दिखाएंगे या छापेंगे तो किस पार्टी का पक्ष लेंगे?? वह भी तब, जब ऐसे opinion polls को दिखाने-छापने की कोई जवाबदेही नहीं होती. मतलब कि opinion poll गलत साबित होता है तो सर्वे करने वाली एजेंसी या छापने-प्रसारण करने वाले मीडिया हाउसेज पर किसी तरह को ना तो कोई जुर्माना लगता है और ना ही उनके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई की जा सकती है. जिस पार्टी या व्यक्ति को opinion polls में हारता दिखाया जा रहा था, अगर वह जीत जाता है तो ऐसा नहीं देखा गया है कि उन्होंने सर्वे करने वाली एजेंसी या उसे दिखाने-छापने वाले मीडियाहाउस के खिलाफ कोई मानहानि का मुकदमा भी किया हो.

तो पूरा मैदान खुला है opinion polls के इस फर्जीवाड़े को करने के लिए. जो जिसे चाहता है, जिस पार्टी को चाहता है, अपने सर्वे के माध्यम से उसे जीतने वाला बता देता है. इस पर भी एक व्यपाक रिसर्च की जरूरत है कि इन opinion polls का वोटरों पर क्या असर पड़ता है? क्या इसे देखकर वह भी अपनी राय बनाते या बदलते हैं और उस कैंडिडेट-पार्टी को वोद दे देते हैं, जिसे opinion poll में जीतता हुआ बताया जा रहा है?. इन opinion polls में निष्पक्षता और पारदर्शिता का आभाव तो होता ही है, साथ ही जवाबदेही की पूर्णतः कमी होने के कारण लोकतंत्र के एक महत्वपूर्ण उत्सव यानी वोटिंग प्रक्रिया को हाईजैक करने की ये पूरी-पूरी कोशिश करते हैं. सबके अपने एजेंडे हैं और अपने निहित स्वार्थ. सो भारतीय लोकतंत्र पर कुठाराघात करने वाले इन अवैज्ञानिक opinion polls पर चुनाव आयोग को जल्द से जल्द पाबंदी-बैन लगाना चाहिए. हम वोटिंग से पहले छद्म रूप में आकर जनता-जनार्दन की राय को प्रभावित करने का मौका किसी को नहीं दे सकते. किसी को भी नहीं.
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