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Monday, December 16, 2013

अन्य पार्टियों से अलग क्यों खड़ी हो जाती है SP ?



समाजवादी पार्टी आखिर उन मुद्दों पर अन्य पार्टियों से अलग क्यों खड़ी हो जाती है जिस पर पूरे देश की लगभग सारी पार्टियाँ सहमत रहती हैं?फिलहाल तीन ऐसे मुद्दे हैं जिन पर सपा बाकी पार्टियों से अलग खड़ी है।पहला मुद्दा है लोकपाल का-पूरे देश में किंतु-परंतु के साथ लोकपाल की अवधारणा पर सहमति है लेकिन सपा इस अवधारणा को ही खारिज करती है।दूसरा मुद्दा है प्रोन्नति में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण का-इस मुद्दे पर भी लगभग सभी पार्टियाँ सहमत हैं लेकिन सपा इसका उग्र विरोध करती है।तीसरा मुद्दा है राज्यों के विभाजन का-छोटे राज्यों की अवधारणा पर भी लगभग सभी पार्टियों की सहमति है,भले ही हर मामले में अपना नफा-नुकसान देखकर ये पार्टियाँ अपना रुख तय करती हैं परंतु सपा सीधे छोटे राज्यों की अवधारणा को ही नकार देती है।

अब प्रश्न उठता है कि ऐसा क्यों है?देश की सबसे बड़ी और पुरानी पार्टी होने के नाते कांग्रेस पर भ्रष्टाचार के सर्वाधिक आरोप हैं लेकिन उसने भी मजबूरी में ही सही लोकपाल के गठन की बात मान लिया है,अन्य पार्टियाँ(भ्रष्ट तो लगभग सभी हैं) भी लोकपाल के गठन को तैयार हैं परंतु सपा बिना किसी ठोस तर्क के इसके विरोध में है।आखिर ऐसा क्यों है?क्या सपा को ऐसा लगता है कि लोकपाल/लोकायुक्त कि नियुक्ति से उसके चरने-खाने में बाधा आएगी?

प्रोन्नति में दलितों के लिए आरक्षण का विरोध कर सपा क्या दर्शाना चाहती है?उत्तर प्रदेश में पिछड़ों और दलितों के बीच प्रतिद्वद्विंता जग जाहिर है।ये दोनो वर्ग जितने स्वाभाविक साथी हो सकते हैं व्यवहार में आपस में उतने ही परस्पर विरोधी हैं।ऐसे में स्वाभाविक है कि सपा दलितों के सशक्तीकरण में यथासंभव अड़चन डाले।वैसे सपा के इस रुख से सवर्ण स्वाभाविक रूप से खुश हैं।

जहाँ तक छोटे राज्यों के विरोध की बात है तो ये आसानी से समझा जा सकता है कि सपा का विरोध छोटे राज्य के निर्माण से नहीं है बल्कि उसका डर उत्तर प्रदेश के संभावित विभाजन(फिलहाल नहीं) को लेकर है,क्योंकि मुलायम सिंह के विशाल कुनबे को चरने-खाने के लिए उत्तर प्रदेश का चौथाई हिस्सा बहुत कम होगा।अपने विशाल कुनबे के भरण-पोषण के लिए यूपी जैसा विशाल प्रदेश मुलायम सिंह के लिए जरूरी है।

यहाँ ये भी कहने की इच्छा होती है कि देश की लगभग सभी पार्टियाँ अंदर से सपा के इस रुख की समर्थक हैं परंतु विवशताएं उन्हें इन मुद्दों का समर्थक बनाती हैं।चूँकि मुलायम सिंह की राजनीतिक विवशताएं सीमित हैं लिहाजा वे इन मुद्दों का खुलकर विरोध कर सकते हैं।

अब प्रश्न उठता है कि ऐसा क्यों है?देश की सबसे बड़ी और पुरानी पार्टी होने के नाते कांग्रेस पर भ्रष्टाचार के सर्वाधिक आरोप हैं लेकिन उसने भी मजबूरी में ही सही लोकपाल के गठन की बात मान लिया है,अन्य पार्टियाँ(भ्रष्ट तो लगभग सभी हैं) भी लोकपाल के गठन को तैयार हैं परंतु सपा बिना किसी ठोस तर्क के इसके विरोध में है।आखिर ऐसा क्यों है?क्या सपा को ऐसा लगता है कि लोकपाल/लोकायुक्त कि नियुक्ति से उसके चरने-खाने में बाधा आएगी?
प्रोन्नति में दलितों के लिए आरक्षण का विरोध कर सपा क्या दर्शाना चाहती है?उत्तर प्रदेश में पिछड़ों और दलितों के बीच प्रतिद्वद्विंता जग जाहिर है।ये दोनो वर्ग जितने स्वाभाविक साथी हो सकते हैं व्यवहार में आपस में उतने ही परस्पर विरोधी हैं।ऐसे में स्वाभाविक है कि सपा दलितों के सशक्तीकरण में यथासंभव अड़चन डाले।वैसे सपा के इस रुख से सवर्ण स्वाभाविक रूप से खुश हैं। 
जहाँ तक छोटे राज्यों के विरोध की बात है तो ये आसानी से समझा जा सकता है कि सपा का विरोध छोटे राज्य के निर्माण से नहीं है बल्कि उसका डर उत्तर प्रदेश के संभावित विभाजन(फिलहाल नहीं) को लेकर है,क्योंकि मुलायम सिंह के विशाल कुनबे को चरने-खाने के लिए उत्तर प्रदेश का चौथाई हिस्सा बहुत कम होगा।अपने विशाल कुनबे के भरण-पोषण के लिए यूपी जैसा विशाल प्रदेश मुलायम सिंह के लिए जरूरी है।
यहाँ ये भी कहने की इच्छा होती है कि देश की लगभग सभी पार्टियाँ अंदर से सपा के इस रुख की समर्थक हैं परंतु विवशताएं उन्हें इन मुद्दों का समर्थक बनाती हैं।चूँकि मुलायम सिंह की राजनीतिक विवशताएं सीमित हैं लिहाजा वे इन मुद्दों का खुलकर विरोध कर सकते हैं।


Narendra Tomar समाजवादी पार्टी का अर्थ मुलायम सिंह यादव खानदान है जो देश में शायद सवसे बडा राजनीतिक खानदान है। लोकपाल कितना भी कमजोर क्‍यों न बने सपा खानदान के लिए परेशानी का सबब ही रहेगा। उसका विरोध्‍ इसी के चलते है। 
और वोटों के अपने मूलाधार को बचाए रखने के लिए आरक्षण का अर्थात दलितों का विरोध उयकी मजबूरी है।
और वोटों के अपने मूलाधार को बचाए रखने के लिए आरक्षण का अर्थात दलितों का विरोध उयकी मजबूरी है।


Rajneesh Kumar Chaturvedi जी के वाल से साभार..



Monday, November 4, 2013

मीडिया हाउसेज के स्वार्थ, तो ओपिनियन पोल्स पर बैन क्यों नहीं?



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Nadeem Akhtar,
Pro., IIMC
 

बहुत-बहुत अच्छा होगा, अगर बेसिर-पैर के टेढ़े-मेढ़े ओपिनियन पोल पर पाबंदी लग जाए. इस लोकतंत्र का भला होगा. हां, ऐसे सर्वे कराने वाले बहुत से संस्थानों की दुकानदारी बंद हो जाएगी, टीवी चैनलों पर एक high profile TRP मसाला कम हो जाएगा, उनकी 'Bargaining' की ताकत कम हो जाएगी, टीवी स्क्रीन पर चुनाव परिणाम का ज्ञान देने वाले विद्वतजनों की कमाई थोड़ी घट जाएगी और टीवी से लेकर प्रिंट मीडिया तक किसी पार्टी-व्यक्ति विशेष को चुनाव में आगे दिखाकर मतदाताओं को गुमराह करने की प्रवृत्ति पर रोक लगेगी. 
ये opinion poll भी टीवी के TRP Meter की तरह ही फ्रॉड होते हैं. महज कुछ हजार लोगों की 'राय' जानकर ये करोड़ों-लाखों लोगों द्वारा दिए जाने वाले वोट का रूझान बता देते हैं. यानी सैम्पल साइज इतना छोटा कि पूरा का पूरा सर्वे ही निरस्त किए जाने लायक है. यही हाल TRP बताने वाले method का भी है. लेकिन चालबाजी देखिए कि शुतुरमुर्ग की तरह मुंडी बालू में घुसाकर शान से TRP & Opinion Polls को ऐसे प्रोजेक्ट किया जाता है, जैसे भाई लोगों ने एक-एक घर जाकर पूछा हो. उनके दिमाग-टीवी सेट को स्कैन किया हो. हद होती है बेशर्मी की भी. 


लेकिन इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता. ये बहुत बड़े वाले बेशर्म हैं. गालथेथर हैं. गालबजाऊ हैं. इस अवैज्ञानिक सर्वे को वो ऐसे आपके सामने पेश करते हैं, जैसे बस चुनाव होने की देर है. सरकार उसी पार्टी की बनेगी, जिसकी वो बात कर रहे हैं. इनकी पोल तो उसी समय खुल गई थी, जब 2004 में सारे ओपिनियन पोल्स ने एनडीए की सत्ता में वापसी का बिगुल बजा दिया था. अटल बिहारी वाजपेयी के 'करिश्मे' और इंडिया शाइनिंग के नारे के साथ बीजेपी को कॉरपोरेट्स-बाजार-ओपिनियन पोल्स ने दुबारा गद्दी मिलने की बात कही थी. लेकिन हुआ इसके ठीक उलट. कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए ने एनडीए को बुरी तरह पछाड़ दिया. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने और Opinion Polls की ऐसी पोल-पट्टी खुली की पूछिए मत. फिर भी ये ऐसे छिछोरे हैं कि अब तक जमे हुए हैं. हर इलेक्शन से पहले इन्हें अपनी तिजोरी भरनी होती है. राजनीतिक पार्टियों और मीडिया हाउसेज के एजेंडे को implement करना होता है. और बहाना होता है opinion polls का.


सबसे गंभीर चर्चा का विषय ये है कि जिन media houses के मार्फत ये opinion polls दिखाए-छापे जाते हैं, ये देखना बहुत जरूरी है कि उन media houses का मालिकाना हक किनके पास है? कुछ चैनलों और अखबारों का मालिकाना हक तो सीधे-सीधे किसी पार्टी के नेताजी के पास है. तो क्या यह संभव है कि अपने चैनल या अखबार के माध्यम से नेताजी जो opinion polls दिखाएंगे या छापेंगे, उसमें वह अपनी पार्टी की हार दिखा दें और विरोधी की जात दिखा दें. ऐसा ना आज तक हुआ है और ना होगा. तो इसका मतलब है कि सीधे-सीधे वह अखबार या चैनल संबंधित पार्टी का मुखपत्र बन जाता है, जिसे -एक निष्पक्ष मीडिया हाउस का सर्वे- बताकर opinion polls बाजार में बेचे जाते हैं. इसके द्वारा जनता की राय को प्रभावित करने की कोशिश की जाती है. यानी हींग लगे ना फिटकरी और रंग भी चोखा. संबंधित पार्टी के घोषित मुखपत्र के अलावा यह एक ऐसा -अघोषित मुखपत्र- होता है, जिसे निष्पक्ष मीडिया का लबादा ओढ़ाकर राजनीतिक पार्टीयां पर्दे के पीछे से खेल करती हैं.


अब बात उन मीडिया हाउसेज की, जिनके मालिक किसी राजनीतिक पार्टी से नहीं जुड़े हैं. लेकिन यहां भी पूंजी निजी हाथों में केंद्रित है. कुछ मालिकों के मीडिया बिजनेस के अलावा भी कई तरह के लंबे-चौड़े बिजनेस होते हैं. साथ ही कुछ मीडिया हाउसेज के शेयरों को देश की नामी-गिरामी कंपनियों के मालिकों ने खरीद रखे हैं. सो खेल यहां भी होता है. कभी पेड न्यूज की शक्ल में तो कभी.... जब आपके business interests होंगे तो जाहिर है, सरकार आपको प्रभावित कर सकती है. करती भी है. साथ ही कुछ media houses के मालिक किसी खास पार्टी के प्रति वफादार देखे गए हैं. उनकी यह वफादारी अखबार में उनके संपादकीयों और टीवी में खबरों के सेलेक्शन-प्रसारण तथा कुछ खास खबरों को drop करके उन्हें ना दिखाने की policy के तहत देखने-जानने को मिलती रहती है. ऐसी स्थिति में इस बात का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है कि ये तथाकथित ---स्वतंत्र और निष्पक्ष-- मीडिया संस्थान अगर opinion poll दिखाएंगे या छापेंगे तो किस पार्टी का पक्ष लेंगे?? वह भी तब, जब ऐसे opinion polls को दिखाने-छापने की कोई जवाबदेही नहीं होती. मतलब कि opinion poll गलत साबित होता है तो सर्वे करने वाली एजेंसी या छापने-प्रसारण करने वाले मीडिया हाउसेज पर किसी तरह को ना तो कोई जुर्माना लगता है और ना ही उनके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई की जा सकती है. जिस पार्टी या व्यक्ति को opinion polls में हारता दिखाया जा रहा था, अगर वह जीत जाता है तो ऐसा नहीं देखा गया है कि उन्होंने सर्वे करने वाली एजेंसी या उसे दिखाने-छापने वाले मीडियाहाउस के खिलाफ कोई मानहानि का मुकदमा भी किया हो.

तो पूरा मैदान खुला है opinion polls के इस फर्जीवाड़े को करने के लिए. जो जिसे चाहता है, जिस पार्टी को चाहता है, अपने सर्वे के माध्यम से उसे जीतने वाला बता देता है. इस पर भी एक व्यपाक रिसर्च की जरूरत है कि इन opinion polls का वोटरों पर क्या असर पड़ता है? क्या इसे देखकर वह भी अपनी राय बनाते या बदलते हैं और उस कैंडिडेट-पार्टी को वोद दे देते हैं, जिसे opinion poll में जीतता हुआ बताया जा रहा है?. इन opinion polls में निष्पक्षता और पारदर्शिता का आभाव तो होता ही है, साथ ही जवाबदेही की पूर्णतः कमी होने के कारण लोकतंत्र के एक महत्वपूर्ण उत्सव यानी वोटिंग प्रक्रिया को हाईजैक करने की ये पूरी-पूरी कोशिश करते हैं. सबके अपने एजेंडे हैं और अपने निहित स्वार्थ. सो भारतीय लोकतंत्र पर कुठाराघात करने वाले इन अवैज्ञानिक opinion polls पर चुनाव आयोग को जल्द से जल्द पाबंदी-बैन लगाना चाहिए. हम वोटिंग से पहले छद्म रूप में आकर जनता-जनार्दन की राय को प्रभावित करने का मौका किसी को नहीं दे सकते. किसी को भी नहीं.
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