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Friday, August 16, 2013

जोया के प्यार में..!



श्रवण शुक्ल
आ गए 
स्स्साला...
हम भी
किसी 
जोया के
प्यार में..!

एकबार
फिर से
जी उठे हैं हम!

देखते हैं
मरना
नसीब में
होता है..

या
लापता
ही होंगे हम!!

हर
हर
महादेव!!!

Sunday, July 14, 2013

गोधराकांड और गुजरात दंगों में 'मोदी सरकार' की कार्यशैली पर बड़ा खुलासा by AAJTAK

श्रवण शुक्ल
2002 के दंगों को लेकर न्यूज चैनल 'आजतक' ने जबरदस्त खुलासा करते हुए एसआईटी और गुजरात सरकार को जबरदस्त चुनौती पेश की है. हालांकि यह रिपोर्ट अब इतने समय के बाद 'आजतक' ने क्यों जाहिर की इसपर बहस की जा सकती है. कुछ दिन पहले तक यही आजतक मोदी की अगवानी और अपने कार्यक्रमों में मुख्य वक्ता के तौर पर उन्हें प्रतिष्ठापित करने में व्यस्त था. इस बात पर एक और शंका सामने आती है कि कहीं कांग्रेस द्वारा अगले चुनावों के लिए जारी किए गए 500 करोड़ के बजट से करोडो रूपए आजतक के हिस्से में मोदी को बदनाम करने के लिए तो नहीं दी गए, ताकि नरेद्र मोदी को गुजरात दंगों के सच को सामने लाकर फिर से रोका जा सके.. मामला चाहे जो कुछ भी हो, लेकिन रिपोर्ट महत्वपूर्ण है. हम सच्चाई को सामने लाने के लिए 'आजतक' का शुक्रिया अदा करना चाहते हैं, लेकिन यदि यह पैसे  के दम पर मोदी को बदनाम करने के लिए है तो इसकी भर्त्सना भी करते हैं, कि आखिर पूरी 11 साल बाद आजतक के पार यह दस्तावेज कहाँ से आए? पढ़िए पूरी खबर.. 
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श्रवण शुक्ल
9871283999

न्यूज चैनल ‘आज तक’ की खबर के अनुसार.....  
27 फरवरी, 2002 को सुबह 7:43 बजे पर अयोध्या से लौट रहे तीर्थयात्री साबरमती एक्सप्रेस गोधरा स्टेशन पर पहुंचे, जैसे ही ट्रेन चलने लगी, कुछ यात्रियों ने चैन खींचकर इमरजेंसी ब्रेक लगा दिया, क्योंकि ट्रेन के कोच नंबर एस-6 और एस-7 में आग लग गई थी। इस हत्याकांड में 59 लोगों की जलने के कारण मौत हो गई थी। यह कांड ‘गोधरा कांड’ के नाम से काले इतिहास में अंकित हो गया और इसके गुजरात भयानक दंगे ने 1 हजार 44 लोगों की जान ले ली।
गुजरात में भाजपा के बहुत से नेताओं का दावा है कि दंगे तो गोधरा कांड की स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी। मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने 5 मार्च को एक इंटरव्यू में कहा कि गोधरा की स्वाभाविक प्रतिक्रिया में दंगे हुए। हम गोधरा और उसके बाद जो कुछ हुआ, उसकी संयुक्त जांच कराएंगे।
मार्च, 2002 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) की ऑल इंडिया जनरल काउंसिल की बैठक में एक प्रस्ताव पास हुआ। उस प्रस्ताव में गोधरा के बाद फैली हिंसा कोसाबरमती एक्सप्रेस में लगी आग का स्वाभाविक और सहज प्रतिक्रिया बताया गया, लेकिन वह दंगा लोगों के गुस्से का तत्काल नतीजा नहीं था। दंगा भड़कने से काफी पहले ही विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) के नेता भीड़ को भड़का रहे थे और पुलिस भी उस खतरनाक साजिश से वाकिफ थी, जो उस वक्त रची गई थी।
न्यूज चैनल ‘आज तक’ को पुलिस कंट्रोल रूम के संदेश और प्रदेश के इंटेलिजेंस ब्यूरो की रिपोर्ट मिली हैं, जिन्हें गोधरा कांड के तुरंत बाद तैयार किया गया था। अप्रैल, 2011 में पुलिस कमिश्नर पी.सी. पांडे ने इन रिपोर्टों को स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम के समक्ष पेश किया। पांडे वर्ष 2002 के दंगों के समय अहमदाबाद के पुलिस कमिश्नर थे। सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल 7 फरवरी को गुजरात सरकार को ये निर्देश दिया कि वह सभी पीसीआर रिकॉर्ड्स और खुफिया रिपोर्ट जाकिया जाफरी को सौंप दे, ताकि वे उस स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम के खिलाफ विरोध याचिका दायर कर सकें, जिसने गुजरात सरकार को क्लीन चिट दे दी थी।
28 फरवरी, 2002 को जाकिया जाफरी के पति और कांग्रेस सांसद एहसान जाफरी को 69 और लोगों के साथ गुलबर्ग सोसायटी में जिंदा जला दिया गया था। बाद में अपनी शिकायत में जाकिया ने दंगा बढ़ाने और भड़काने के लिए नरेंद्र मोदी और 57 दूसरे लोगों के खिलाफ मुकदमा चलाने की मांग की। फिर भी गुजरात सरकार की भूमिका की जांच करने वाली एसआईटी ने मार्च, 2012 में क्लोजर रिपोर्ट पेश कर दी। इस रिपोर्ट में दंगे को रोकने में नाकामी के लिए गुजरात सरकार की खिंचाई की गई थी, लेकिन एसआईटी को मोदी और दूसरे आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चलाने लायक सबूत नहीं मिल। इसी दौरान जाकिया जाफरी ने एसआईटी से नरेंद्र मोदी को मिली क्लीन चिट के खिलाफ एक विरोध याचिका दायर की।
इस मामले में पीसीआर रिकॉर्ड्स और स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो रिपोर्ट, जो ‘आज तक’ के पास हैं, वे सारे जाकिया जाफरी की ओर से दायर याचिका में शामिल हैं। एसआईटी के समक्ष गुजरात पुलिस ने ऑन रिकॉर्ड यह दावा किया है कि इन पुलिस वायरलैस मैसेजेज को हासिल नहीं किया जा सकता क्योंकि इन्हें नष्ट कर दिए जाने की आशंका है, लेकिन ये सच नहीं है।
वर्ष 2002 में अहमदाबाद में दो सेंट्रलाइज्ड पुलिस कंट्रोल रूम बनाए गए थे। शहर के बीचों-बीच स्थित शाहीबाग में अहमदाबाद पुलिस कंट्रोल रूम बनाया गया। 28 फरवरी को जिस नरोडा और गुलबर्ग सोसायटी में करीब डेढ़ सौ लोग जलकर मर गए, वे दोनों इलाके पुलिस कंट्रोल रूम के 6 किलोमीटर के दायरे में आते है। दूसरा, स्टेट पुलिस कंट्रोल रूम गांधीनगर के पुलिस भवन में स्थित है।
अहमदाबाद पुलिस कंट्रोल रूम को अहमदाबाद शहर में लोगों के जमावड़े का पूरा संदेश मिल रहा था, वही स्टेट कंट्रोल रूम को राज्य के अलग-अलग जिलों से संदेश प्राप्त हो रहे थे।
फरवरी, 2012 में एसआईटी ने अहमदाबाद कोर्ट में एक लिफाफाबंद रिपोर्ट पेश की, जिसमें सिर्फ अहमदाबाद सिटी पीसीआर के मैसेजेज हैं। उस रिपोर्ट की एक कॉपी ‘आज तक’ के पास है।
एक तीसरा कंट्रोल रूम भी था, वह गांधीनगर के पुलिस भवन के अंदर स्थित स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो के हैडक्वार्टर में था। यह वही बिल्डिंग है, जहां राज्य के डीजीपी बैठते हैं। इस एसआईबी कंट्रोल रूम में राज्यभर में फैली इसके खुफिया यूनिट्स की तरफ से भेजी गई इंटेलिजेंस रिपोर्ट्स आ रही थीं। इनमें अहमदाबाद और गांधीनगर की भी रिपोर्ट्स थीं.। ये एसआईबी रिपोर्ट्स भी एसआईटी की तरफ से कोर्ट में पेश हो चुकी हैं। इनकी भी एक कॉपी ‘आज तक’ के पास है।
27 फरवरी के दोपहर तक गुजरात सरकार के गृह विभाग के पास हर जगह की पुलिस से लगातार ये मैसेज आने लगे कि विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) और बजरंग दल के कैडर लामबंद हो रहे हैं। पूरे राज्य में दंगाई बैठकें करने लगे हैं। ये संगठन भड़काऊ भाषण देकर भीड़ को उकसाने लगे हैं। पुलिस ने स्टेट इंजेलिजेंस ब्यूरो को सैकड़ों वायरलेस मैसेजेज भेजे, जो सभी दस्तावेज में रिकॉर्ड हैं। जिन दस्तावेज को आपने पहले कभी नहीं देखा, वे भी ‘आज तक’ के पास हैं।
गोधरा त्रासदी के चंद घंटों के भीतर ही गुजरात वीएचपी के तीन वरिष्ठ नेता-जयदीप पटेल, दिलीप त्रिवेदी और कौशिक पटेल ने राज्यव्यापी बंद के लिए एक बयान जारी किया। 27 फरवर, 2002 को रात 8:38 बजे एक अधिकारी ने इस बयान को एसआईबी के हैडक्वार्टर में फैक्स किया था।
तारीख :27 फरवरी, 2002समय : रात 8:38 बजेस्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो : मैसेज नंबर/ पेज नंबर : 188 (एनेक्सचर:III, फाइल : XVIII)वीएचपी के महासचिव दिलीप त्रिवेदी और संयुक्त सचिव जयदीप पटेल और कौशिक मेहता ने बयान दिया। वीएचपी ने बंद का ऐलान किया। गुजरात बंद कार सेवकों के मारे जाने के विरोध में है। बयान में कहा गया है कि गोधरा हमले के लिए मुसलमानों ने पहले से तैयारी कर रखी थी। इसके तहत निशाना बनाकर महिलाओं से छेड़छाड़ की गई और बोगियों में आग लगा दी गई, साथ ही रामसेवकों को जिंदा जला दिया। 27 फरवरी को पूरे दिन एसआईबी कंट्रोल रूम को वे मैसेजेज मिलते रहे, जिनमें वीएचपी की भड़काऊ नारेबाजी और लोगों को लामबंद करने की बात थी।
तारीख : 27 फरवरी 2002स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो : मैसेज नंबर/पेज नंबर : 345ऑर्डर नंबर : 24 (एनेक्स्चर : III फाइल : XIX)भेजने वाला : डीओ, अहमदाबादपाने वाला : इंटेलिजेंस ऑफिस, विरनगाम (अहमदाबाद)विरनगाम टाउन चाली और गोलवाड़ा इलाके में वीएचपी और बजरंग दल के 75 सदस्य एकत्र हुए। इलाके में हालात बेहद तनावपूर्ण।
तारीख : 27 फरवरी, 2002, समय : शाम 6:10 बजेस्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो मैसेज नंबर : 531पेज नंबर : 19 (एनेक्स्चर : III, फाइल : XVIII (डी-160)
गोधरा से आने वाली साबरमती एक्सप्रेस अहमदाबाद स्टेशन पर शाम साढ़े चार बजे पहुंची। रॉड और लाठी से लैस कारसेवकों की नारेबाजी- ‘खून का बदला खून’समय : रात : 10:12 बजेभावनगर सीआईडी, इंटेलिजेंस के पुलिस इंस्पेक्टर ने गांधीनगर में गुजरात स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो के इंस्पेक्टर जनरल को एक फैक्स भेजा। इसमें कहा गया कि साधु समाज के अध्यक्ष गोपाल नंद और स्थानीय वीएचपी नेताओं ने जूनागढ़ में भीड़ को बदला लेने के लिए उकसाया। मैसेज में कहा गया कि वीएचपी नेताओं ने नफरत फैलाने वाले भाषण दिए और लोगों को एकजुट होने के लिए कहा।
तारीख :27 फरवरी, 2002, समय : रात 10:12 बजेस्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो फैक्स मैसेज: 311/02पेज नंबर : डी-1/ एचए/जहर सभा/जूनागढ़भेजने वाला : सीआईडी, भावनगरपाने वाला : आईजी, गुजरात और इंटेलिजेंस ब्यूरो, गांधीनगर
साधु समाज के अध्यक्ष गोपाल नंद ने जूनागढ़ कदवा चौक पर शाम साढ़े सात बजे से रात 9:00 बजे के बीच भड़काऊ भाषण दिया। गोपाल नंद ने ट्रेन में आग लगने के 12 घंटे बाद भी हिंदुओं की ओर से जवाब नहीं दिए जाने पर सवाल उठाया। गोपाल नंद ने भारत के प्रति खास वर्गों की देशभक्ति पर सवाल खड़ा किया और भीड़ को हमला करने के लिए उकसाया। 27 तारीख की दोपहर तक दंगे भड़क गए।
तारीख : 27 फरवरी 2002, समय : शाम 5:45 बजेस्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो : फैक्स मैसेज : 273फाइल : -XIX एनेक्सचर : IIIभेजने वाला : बी.एम. मोहित आनंद सेंटर
साबरमती एक्सप्रेस दोपहर 3:00 आणंद रेलवे स्टेशन पर पहुंची। कारसेवकों ने स्टेशन पर मौजूद एक खास वर्ग के चार लोगों को छूरा घोंप दिया। आनंद के एक 65 वर्षीय निवासी अब्दुल राशिद की मौत। बाकी सभी आणंद सरकारी अस्पताल में भर्ती।पूरे राज्य से कारसेवकों की ओर से हिंसक हमलों की रिपोर्ट आने लगी। हिंसा का एक दूसरा केंद्र बन रहा मोदासा के वडाग्राम में वीएचपी के कार्यकर्ताओं की भीड़ जमा होने लगी। अतिरिक्त सुरक्षा के लिए आपातकालीन संदेश लगातार आने लगे। पूरी भीड़ रातभर क्रोध की चरम सीमा पर थी। आक्रोषित लोग घरों और गाड़ियों में आग लगा रहे थे।
तारीख : 27 फरवरी 2002, समय : रात 11: 59 बजेस्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो फैक्स मैसेज : Com/HM/550/ Out No. 398भेजने वाला : एसीपी, गांधीनगर रीजनपाने वाला : आईजी, गुजरात और इंटेलिजेंस ब्यूरो, गांधीनगर
अहमदाबाद से 50 कार सेवक स्पेशल बस में सवार होकर शाम 6:30 बजे मोदासा के वड़ाग्राम में पहुंचे। 500 लोगों की भीड़ ने कारसेवकों की अगवानी की। कारसेवकों ने भीड़ को साबरमती एक्सप्रेस कांड के बारे में अटैक के बारे में बताया। रात 9:30 बजे तक भीड़ में शामिल लोगों की संख्या हजारों तक पहुंच गई। हालात पर काबू पाने में वहां मौजूद पुलिस नाकाफी थी. एक खास वर्ग की दस दुकानें और कई गाड़ियों में भीड़ ने आग लगा दी।
इन तमाम चेतावनी के बावजूद गुजरात सरकार की तरफ वीएचपी नेताओं और उनकी लामबंदी को रोकने की कोई पहल नहीं हुई और न ही वीएचपी और बजरंग दल के सदस्यों को हिरासत में लिया गया। स्पेशल इन्वेट्सिटगेशन टीम ने अपनी रिपोर्ट में कबूल किया कि वीएचपी के बंद को मोदी सरकार का समर्थन हासिल था। एसआईटी की क्लोजर रिपोर्ट के पेज नंबर 134 में लिखा है कि गृह विभाग के अंडर सेक्रेट्री विजय बढ़ेका ने एसआईटी के सामने कहा कि 28 फरवरी, 2002 का गुजरात बंद और 1 मार्च, 2002 का भारत बंद-दोनों को ही बीजेपी का समर्थन था।
बंद ने वीएचपी को मनमानी की खुली छूट दे दी, बावजूद इसके कि एसआईबी दंगे शुरू होने के संकेत दे रहा था और इन्हें रोकने के लिए जरूरी कदम उठाने की मांग कर रहा था।
तारीख : 28 फरवरी 2002, समय: सुबह 9:00 से 10:00 बजे के बीचस्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो : मैसेज नंबर: 73/02पेज नंबर : 365 ((Anne & ure III File XXI (D-166)भेजने वाला : एसीपी (इंटेलिजेंस), सूरतवीएचपी और बीजेपी नेताओं ने वापी शहर के सरदार चौक पर भड़काऊ भाषण दिए। वीएचपी के दिनेश बेहरी, बजरंग दल के आचार्य ब्रह्मभट्ट, बीजेपी के जवाहर देसाई और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के विनोद चौधरी भी मौजूद थे। भड़काऊ भाषण देने वाले भीड़ को गोधरा का बदला लेने के लिए उकसा रहे थे।
तारीख : 28 फरवरी 2002, समय: सुबह 9:24 बजेस्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरोपेज नंबर : 37 (Anne & ure III, File XVIII, D-160)पाने वाला : एसीपी, इंटेलिजेंस, अहमदाबाद रीजनबजरंग दल और वीएचपी के सदस्य अल्पसंख्यकों पर हमले के लिए मोटरसाइकिलों पर घूम रहे हैं। वीएचपी और बजरंग दल के सदस्य धारदार हथियारों से लैस हैं।तारीख : 28 फरवरी 2002, समय- सुबह 10:53 बजेस्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरोपेज नंबर :12 (Anne & ure III, File XVIII, D-160)पाने वाला : एडीजीपी, गांधीनगर
भाजपा नेता मनोज भाई, वीएचपी नेता शैलेश केला और बजरंग दल नेता धर्मेंद्र खत्री भीड़ की अगुवाई कर रहे हैं। ये नेता हिंसा में लिप्त हैं, जबरन बंद करा रहे हैं। जब अहमदाबाद पुलिस कमिश्नर पी.सी.पांडे और राज्य के डीजीपी के चक्रवर्ती से एसआईटी ने पूछताछ की, वे लोग इन एसआईबी रिपोर्ट्स का मुकम्मल जवाब नहीं दे पाए। 24 मार्च, 2010 को एसआईटी के समक्ष दिए अपने बयान के पेज नंबर 7 पर पांडे ने कहा है कि 27 फरवरी, 2002 या 28 फरवरी, 2002 को ऐसी परिस्थिति नहीं थी कि कर्फ्यू लगाया जाए और जल्दबाजी में उठाया गया कोई भी कदम शहर में तनाव बढ़ाता। दूसरी तरफ सीमित बल के साथ कर्फ्यू लागू करने से शहर में गंभीर समस्या खड़ी होती और लोग बार-बार कर्फ्यू का उल्लंघन करते।
राज्य सरकार ने एसआईटी के समक्ष कहा कि वर्ष 2002 का गुजरात दंगा गोधरा त्रासदी की त्वरित प्रतिक्रिया थी, लेकिन दस्तावेजी सबूत कुछ अलग कहानी ही बयां करते हैं। पीसीआर और एसआईबी संदेश ये बता रहे हैं कि राज्य प्रशासन को लगातार खुफिया चेतावनी आ रही थी, जिसमें व्यवस्थित तरीके से दंगा शुरुरू होने के संकेत मिल रहे थे, लेकिन इस पर कार्रवाई करने में सरकारी तंत्र नाकाम रहा।
राज्य का खुफिया ब्यूरो लगातार खतरे की घंटी बजाता रहा। गृह विभाग को दंगा भड़कने की आशंका को लेकर संकट भरा संदेश भेजता रहा। कारसेवकों के शव को लेकर प्रदर्शन शुरू हो गया, लेकिन रिकॉर्ड बताते हैं कि वीएचपी और उसके कार्यकर्ता भीड़ का उन्माद बढ़ाने में जुटे रहे।
28 फरवरी, 2002 को रात के करीब 12:30 बजे राज्य खुफिया ब्यूरो को एक फैक्स मिला, जिसमें अहमदाबाद में शव लाए जाने की हालत में दंगा भड़कने की आशंका को लेकर चेतावनी दी गई। उस वक्त वीएचपी की राज्य इकाई के अध्यक्ष जयदीप पटेल 54 कारसेवकों के शवों को लेकर गोधरा से अहमदाबाद के रास्ते में थे।
तारीख : 28 फरवरी 2002, समय : रात के 12:30 बजेस्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो का फैक्स नंबर- 525शवों को अहमदाबाद के कालूपुर रेलवे स्टेशन लाया जाएगा। शवों का अंतिम संस्कार किया जाएगा। वीएचपी ने बंद बुलाया है। अहमदाबाद में दंगा भड़कने की जबरदस्त आशंका है। रोकथाम के लिए कार्रवाई की जाए।
तारीख : 28 फरवरी, 2002राज्य खुफिया ब्यूरो ने गृह सचिव और सभी पुलिस कमिश्नर, सभी एसपी को रिपोर्ट भेजी। वीएचपी ने गुजरात बंद बुलाया, जरूरी निगरानी रखी जाए।कार सेवकों के शवों को लेकर वाहनों का काफिला सुबह के 3:34 मिनट पर आखिरकार अहमदाबाद के सोला सिविल अस्पताल पहुंच गया। सोला अस्पताल के बाहर वीएचपी और आरएसएस कार्यकर्ताओं की भीड़ पहले से ही एकत्र थी। सोला सिविल अस्पताल के बाहर तैनात पीसीआर वैन ने शहर के पुलिस कंट्रोल रूम को संदेश भेजा। अस्पताल और पुलिस कंट्रोल रूम के बीच की दूरी 11 किलोमीटर थी।
तारीख : 28 फरवरी 2002, समय: तड़के 4:00 बजेपृष्ठ संख्या : 5790 (एनेक्चर : IV, फाइल : XIV)आरएसएस के 3000 सदस्यों की भीड़ सोला अस्पताल के इर्द-गिर्द जमा हो गई।
तारीख : 28 फरवरी 2002, समय : सुबह 7:14 बजेपीसीआर वायरलैस संदेश (सोला अस्पताल)पृष्ठ संख्या : 5796 (एनेक्चर : IV, फाइल : XIV)सोला अस्पताल के करीब भीड़ जमा होने लगी। भीड़ बेकाबू होती जा रही थी और कभी भी हिंसा भड़कने का पूरा अंदेशा था।
तारीख : 28 फरवरी, 2002, समय : सुबह 7:17 बजेपीसीआर वायरलैस संदेश : (सोला अस्पताल)पृष्ठ संख्या : 5797 (एनेक्चर : IV, फाइल : XIV)500 लोगों की भीड़ ने ट्रैफिक रोक दिया।सुबह : 8:10 बजे कंट्रोल रूम से संदेश आया कि तीन एसआरपी कंपनियां सोला अस्पताल के लिए रवाना कर दी गईं।
तारीख : 28 फरवरी 2002, समय : सुबह 11:55 बजेपीसीआर वायरलैस संदेशपृष्ठ संख्या : 5894 (एनेक्चर : IV, फाइल : XIV)भीड़ ने गाड़ियों में आग लगा दी, हाईवे पर आगजनी ।
तारीख : 28 फरवरी, 2002, समय : सुबह 11:55 बजेपीसीआर मैसेज : स्टेट खुफिया ब्यूरोपेज नंबर : 6162 (एनेक्चर : IV, फाइल : XIV)सोला अस्पताल और हाईकोर्ट के करीब दंगा शुरू हो गया, जहां कारसेवकों के शव ले जाए गए।
तारीख : 28 फरवरी 2002, समय : उल्लेख नहींपीसीआर मैसेज (सोला अस्पताल)स्टेट खुफिया ब्यूरो : पेज नंबर : 6172सोला अस्पताल के कर्मचारियों को 500 लोगों की भीड़ ने घेर लिया। अस्पताल पर सुरक्षा के तुरंत इंतजाम करें। ये खुलासे बताते हैं कि कैसे भीड़ को अस्पताल के बाहर जमा होने दिया गया और हिंसा शुरू होने के बावजूद कर्फ्यू नहीं लगाया गया। जब पांडे एसआईटी के समक्ष पेश हुए तो उनसे यह नहीं पूछा गया कि पुलिस बल की मौजूदगी के बावजूद क्यों नहीं भीड़ को तीतर-बितर किया गया। पांडे ने एसआईटी के सामने अपने बयान में यह दावा किया कि उन्होंने सुबह के 10:00 बजे अस्पताल का दौरा किया और सबकुछ सामान्य पाया गया। पांडे ने एसआईटी के सामने यह भी दावा किया कि वहां गोधरा में मारे गए लोगों के लिए कोई अंतिम यात्रा नहीं निकाली गई, लेकिन पीसीआर से मिले संदेश साफ बताते हैं कि वहां न केवल अंतिम यात्रा निकाली गई, बल्कि अस्पताल के आस पास दंगा भी भड़का।
तारीख : 28 फरवरी 2002, समय : सुबह 11:58 बजेपीसीआर संदेश (सोला अस्पताल) : स्टेट खुफिया ब्यूरोपेज नंबर : 5907 और 5925 (एनेक्चर : IV, फाइल : XIV)10 कारसेवकों के शवों को लेकर अंतिम यात्रा रामोल जनतानगर से लेकर हटकेश्वर श्मशान घाट तक निकाली गई। अंतिम यात्रा में 6 हजार लोग शामिल थे। अंतिम यात्रा को पूरे शहर में घुमाया गया। भीड़ अहमदाबाद के गुलबर्ग सोसायटी, नरोदा पाटिया और नरोदा गाम के करीब बेकाबू होने लगी।
तारीख : 28 फरवरी 2002, समय : उल्लेख नहींपीसीआर संदेश : (खेडब्रह्मा, साबरकांठा) Com/538स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो : पेज नंबर : 258 (एनेक्चर : III, फाइल : XIX)कारसेवकों की अंतिम यात्रा साबरकांठा जिले के खेडब्रह्मा में निकालने की इजाजत दी गई। हालात तनावपूर्ण, खेडब्रह्मा में एक खास वर्ग के 2 लोगों को चाकू मारा गया।
तारीख : 28 फरवरी 2002, समय : दर्ज नहींपीसीआर संदेश (खेडब्रह्मा, साबरकांठा)स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो: पेज नंबर : 262 (एनेक्चर : III, फाइल : XIX)खेडब्रह्मा के रास्ते में 150 बजरंग दल के कार्यकर्ता।
तारीख : 28 फरवरी, 2002, समय : शाम 3:32 बजेपीसीआर मैसेज: (खेडब्रह्मा, साबरकांठा)स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो : पेज नंबर : 254, (एनेक्चर : III, फाइल : XIX) Com/574साबरकांठा में गोधरा कांड में मारे गए बाबूभाई पटेल की अंतिम यात्रा की इजाजत।
विशेष जांच दल ने अपने क्लोजर रिपोर्ट के पेज नंबर 59 से 64 के बीच अपनी रिपोर्ट दी कि वहां कोई अंतिम यात्रा नहीं निकाली गई और इसी आधार पर गुजरात सरकार को क्लीन चिट दी गई, लेकिन पीसीआर संदेश अहमदाबाद में दंगा भड़कने से पहले गुजरात सरकार की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल खड़े करते हैं

source: http://aajtak.intoday.in/story/aajtak-have-unseen-documents-gujrat-riots-1-727438.html 

Saturday, May 4, 2013

दोस्त की शादी, बोले तो मस्ती का फुलडोज..

श्रवण शुक्ल
आज दिनांक 05/05/2013 है। सुबह का समय है, 3.11AM हो रहे हैं। नींद नहीं आ रही है, पता है क्यों? क्योंकि 8 मई को मुझे अपने गांव के लिए निकलना है। हां! वहां शादी है, शादी है मेरे दोस्त की। और आज बरीक्षा होने वाला है। वैसे यह दोस्त से ज्यादा बड़े भाई हैं मेरे, लेकिन अहम कभी नहीं दिखा। 
Shravan Shukla
9716687283
वैसे तो वह मुझे कई साल बड़े हैं, लेकिन हम दोनों की अच्छी ट्यूनिंग है। वजह कुछ भी हो सकती है। मुझे नहीं मालूम! वैसे एक समय होता था, जब मेरे सगे बड़े भाई और विमल में जमकर लड़ाई हुई थी, लाठियां तक चल गई थी। मगर, इतना सब होने के बाद भी हम दोनों के बीच सबकुछ नार्मल रहता है, नार्मल क्या? हमेशा हमारा रिश्ता एक नई उंचाई पर ही मिलता है।
एक और बात! देखा जाए तो वह मेरे दूर की रिश्तेदारी में मौसी के बेटे हैं, इस लिहाज से भी वह मेरे बड़े भाई हुए। हां! हम दोनों अगर किसी जगह बराबर दीखते थे, तो वह क्रिकेट के मैदान में। अक्सर हम दोनों एक ही टीम से होते थे, मेरा काम सिंगल देने का होता था, तो विमल का ऑफ साइड की गेंदों को भी लेग साइड में दूर तक उछाल देने का था, जो एक ओवर में 5 छक्के तक हो जाया करती थी। अब जब से दिल्ली जैसे महानगर में निरंतर रहने लगा हूं, तब से गांव के दोस्तों की बेहद याद आती है। याद सबकी आती है, लेकिन टिंकू, डिम्पू, रिंकू, सेके और विमल की बात अलग है। एक और बात, जितने नाम मैंने लिए उनमें से रिंकू एक नंबर का डरपोक खिलाडी है, सिर्फ क्रिकेट में! वैसे तो वह लड़ाई झगडे के मैदान का बेख़ौफ़ खिलाडी है, किसी के आगे झुकता नहीं. सभी से भिड जाता है, इसलिए उससे भी मेरी अच्छी बैठती है। आजकल वह दिल्ली में ही है, इसलिए हम दोनों साथ में विमल की शादी के लिए निकलेंगे, एक ही पीएनआर पर दोनों के टिकट हैं। खास बात यह है कि रिंकू और जिसकी शादी में जाना है, यानि विमल.. यह दोनों चचेरे भाई हैं। खैर, ज्यादा नहीं उल्झाऊंगा, रिंकू का छोटा भाई टिंकू है, रिंकू जहां मेरा क्लासमेट रहा है तो टिंकू मेरी उमर का है, मुझसे कुछ महीनों छोटा, लेकिन क्रिकेट का मास्टर है। वह बहुत कम उम्र से ही हरफनमौला प्लेयर है, हालांकि पहले जैसी अब बात नहीं। इसकी वजह भी काफी हद तक मुझसे जुडी रही। खैर, क्या वजहें रहीं, उनका उल्लेख नहीं करना चाहूंगा।
एक और खिलाड़ी सेके, जिनका वास्तविक नाम छोटे जीतेन्द्र है, क्योंकि रिंकू का नाम भी जीतेंद्र है, और दोनों एक साथ एक ही क्लास में आए, तो मास्टर जी के लिए बड़े जीतेंद्र और छोटे जीतेंद्र में बदल गए। घर भी दोनों का सटा हुआ है। वैसे रिंकू-सेके और शुकुल यानि मैं, हम तीनों 4-5वीं क्लास में एक ही स्कूल में साथ ही पढ़े थे।  
इन दोस्तों में एक और किरदार जों शायद सबसे अहम है, उसके बारे में बताना चाहूंगा। नाम है डिम्पू यानि शैलेन्द्र उर्फ नेताजी। मेरे पहली की पहली कक्षा से लेकर अबतक, हर कदम पर मेरे साथ रहा है। हमने लड़कियां छेड़ी हैं, तो साथ में दूर दूर तक मंदिर भी गएं हैं। विन्ध्याचल मंदिर से लेकर महावीरन बाबा और अन्य जगह। नेवता खाने में हम दोनों का कोई सानी नहीं। कइयो किलोमीटर तक हम दोनों साथ नेवता खाने चले जाया करते थे। हम दोनों कई कुटम-कुटाइयों में भी साथ रहे हैं। इंटर कालेज के दौरान चाहे पूरे गांव के गांव पर भारी पड़ना रहा हो, या पड़ोस की गांव में रहने वाली लड़की के पीछे जब मैं पड़ा था, उस समय पूरे गांव से बचाने की जिम्मेदारी जिसपर थी, वह नेताजी ही हैं। मेरा देर रात को सुल्तानपुर शहर से गांव आना हो, या दिल्ली में रहकर गांव का वोटर-आई कार्ड बनवाना। सारी जिम्मेदारी नेताजी की होती है, कह सकते हैं कि अगर नेता जी मेरे दोस्त नहीं होते तो शायद ज़िन्दगी में इतनी तेज़ी नहीं होती, ठहरन सी रहती। वैसे विमल की शादी में तो जरूर जा रहा हूं, सभी दोस्त मिलेंगे, लेकिन नेताजी के साथ तो कुछ अलग ही प्लान है। देखते हैं, हम कहां तक जाते हैं।
वैसे तो हर किसी की ज़िंदगी में दोस्तों की जगह बेहद अहम होती है, लेकिन मेरे मुट्ठी भर दोस्तों में बस इतने ही हैं, जिन्हें मैं हर जगह बेधड़क अपने साथ लिए चल सकता हूं। और भी किरदार हैं, जैसे दिल्ली में राहुल पल्हानिया, लालित्य वशिष्ठ और अब एक नया दोस्त प्रतीक। दिल्ली वालों दोस्तों के बारे में फिर कभी बताऊंगा, खासकर राहुल के साथ बिताए समय को। अगर गांव में नेताजी हैं तो शहर में राहुल। वैसे, दोस्त हमेशा अच्छे ही होते हैं, कुछ कमीने समय को छोड़कर।
अमां यार! पूरे फ्रेंड सर्कल में आप लोगों को घुमा चुका हूं। अब विमल की शादी पर आते हैं। आज 5 मई है। सुबह के 3.31AM हो चुके हैं। आंखो से नींद गायब है। पता है क्यों? दरअसल आज विमल का बरीक्षा है। गांवो में कन्या पक्ष को लूटने का एक कार्यक्रम समझ लीजिए, वैसे तो मैं ऐसे किसी भी शाहीखर्च से दूर रहता हूं, लेकिन परम्पराओं को लेकर अभी उस स्थिति में नही हूं, कि मैं बड़े लोगों से बहस कर सकूं। हां! अपनी शादी के समय इन सबसे दूर रहने की कोशिश जरूर करूंगा।
तो, आज विमल का बरीक्षा है, कन्यापक्ष के लोग उलट बाराती की तरह आज विमल के घर आएंगे, यहां बहुत सारी प्रक्रियाएं संपन्न होंगी, जिन्हें यहां नहीं बता सकते, कोई गांव का बंदा होगा तो समझ जाएगा। वैसे, आज शाम नेवते का भी प्रोग्राम है। वही नेवता, जिसके पीछे हम कई-कई किलोमीटर तक चले जाया करते थे, अक्सर नेताजी के साथ, नहीं तो टिंकू, रिंकू के साथ। दूर वालों में विमल के साथ भी। एक बात और याद आ गई, नेवते से। काफी समय पहले की बात है, जब हम बहुत छोटे थे। हां, तो उस समय हम पड़ोस के गांव में नेवता खाने गए थे, मैं और टिंकू। बाकी भी थे, लेकिन वह आगे निकल गए। सभी लौट रहे थे, उसी समय एक लड़के से किसी बात को लेकर टिंकू की बहस हो गई। टिंकू शुरू से छोटा भीम जैसा रहा है, हां! अंदर से थोड़ा डरता था, लेकिन सपोर्ट पाने पर किसी को भी पटकने की ताकत रखता था। उस लड़के से जब बहस हुई तो टिंकू ने कहा, बेटा, अभी हम घर जा रहे हैं, और अकेले हैं, वरना बताते। यही वह लाइन थी, जों हमारे बीच अभी भी बेहद अच्छी ट्यूनिंग रखती है। उस समय मैंने कहा, अरे टिंकुआ! शाम ही तो हुई है न? मैं भी साथ हूं, आज इसकी ले ही लेते हैं। इतना कहना भर ही था कि टिंकू उस लड़के पर टूट पड़ा, उसके बाद उस लड़के की क्या गत हुई, बताने लायक नहीं है। बस! वह लड़ाई, और हम दोनों हमेशा के लिए दोस्त! कंधे पर हाथ रखकर दोनों घर को चले आए, उसके बाद ऐसी किसी भी हालत में हम दोनों मार-कुटाई से कभी भागे नहीं। हाहाहा! क्या दिन थे यार।
खैर! नेवते पर थे हम। आज हम नेवते के बाद और सभी कार्यक्रम शुरू हो जाएंगे, लेकिन उससे खास मतलब नहीं रहेगा, हम लैसे लौडों को। हम तो बस क्रिकेट खेलेंगे, या फिर तफरी करेंगे।
आज के बाद अगला खास दिन 11 मई रहेगा। उसी दिन हम सभी नाचते गाते, विमल की बारात में धूम मचाएंगे। विमल की शादी के बारे में सोचकर दिल रोमांचित हो उठता है। पता है क्यों? दिल में सिर्फ यही आ रहा है कि हम सभी कभी किसी और की शादी में धूम मचाते थे, आज इसका नंबर आ गया। इतना खुश हूँ कि अभी भी सोने के बारे में नहीं सोच रहा हूं। शायद विमल से बात कर लेने के बाद नींद आए, तो 6 बजे के बाद बात करूंगा। वैसे शादी के बारे में जब सोचता हूं तो अच्छा लगता है। 11 को शनिवार का दिन रहेगा, शाम के समय हम सभी जी भरके नाचेंगे। पूरे गांव की महिलाएं और बच्चियां बारात को बिदाई देने जाएंगी। सबकी निगाहें विमल पर रहेंगी, लेकिन सभी दूल्हों से उलट यह दूल्हा शर्माएगा नहीं। पता है क्यों? क्योंकि गांव में होने वाली रामलीला में विमल हमेशा से अच्छे-अच्छे किरदारों को जीता आया है, कभी लक्ष्मण तो कभी राम। यहां तक कि कई दैत्यों का भी वेश धर चुका है। ऐसे में, कितनी भी निगाहें उसपर हो वह अच्छा ही महसूस करेगा, वास्तविकता क्या होगी, वह मैं उसी दिन उसकी शकल से भांप लूंगा। यह सोचकर थोड़ा अजीब लगता है, अजीब इसलिए लग रहा है कि हर दोस्त के बाद अपना नंबर करीब आता जा रहा है। फिर भी, मैं निश्चिन्त हूं। क्योंकि शादी के झंझट से दूर रहने की इच्छा घर पर पहले ही व्यक्त कर चुका हूं। शायद मेरी इच्छा का सम्मान किया जाए।
शाम के समय हम सभी बारात विदा होने के बाद कन्यापक्ष के घर पहुंच जाएंगे। वहां फिर हम दोस्तों की धूम मचेगी। खूब डांस होगा। इस बार भी शायद पिंटू-दीपक का मशहूर नागिन डांस हो। दरअसल, यह दोनों गांव की शादियों में खूब नाचते हैं, दोनों शुरू से दोस्त रहें हैं, और गांव की शादियाँ वैसे भी घर की शादियाँ होती है, तो सभी लोगों की दिमांड दोनों पूरी करते ही हैं। इस बार भी ऐसा ही होगा। एक और खास बात! इस बार विमल की शादी के साथ ही नाचने का आगाज मैं भी करूंगा। स्वभाव से शर्मीला होने की वजह से अबतक किसी भी शादी में ढंग से नाच नहीं पाया, लेकिन अब लगता है कि जरूरी परिपक्वता मेरे अंदर आ चुकी है, कि अब मैं अपने दोस्तों की शादी में खुलकर नाच सकता हूं।
काफी एक्साइटेड हूं। शादी विमल की है, लेकिन दोस्त होने के चलते उससे कहीं ज्यादा खुशी मुझे है। पता है क्यों? क्योंकि, शादी में आए रिस्तेदारों और दोस्तों से निपटने में ही लगा होगा बेचारा, तो उसे सोचने की फुर्सत ही कहां? इसीलिए उसके हिस्से का काम मैं कर रहा हूं। लेकिन सिर्फ अघोषित तौर पर।
आधी रात द्वारपूजा तक नाच-गाना चलता रहेगा। इसी दौरान खाना-पीना भी हो जाएगा। इसके बाद दूल्हे की असली परीक्षा शुरू होगी। पता है क्या? शादी की सारी प्रक्रिया। उफ़ पूरी बारात खाना खाकर आराम करने की ओर होगी तो बेचारे दूल्हे मियां, अपनी जिंदगी के सबसे अहम पड़ाव पर होंगे।
इस पड़ाव पर मैं खुद भी रहना चाहता हूं। इस पल का साक्षी बनना चाहता हूं। पता है क्यों? क्योंकि यह मेरे अच्छे दोस्त की शादी है। इसके बाद शुरुआत हो जाएगी। इसलिए भी कि मैं खुद शादी नहीं करना चाहता। लेकिन मजे और सजे की बात तभी पता चलती है, जब आनंद उठाया जाए। खैर, यह आगे की बात है, अभी से क्या सोचना। हो सकता है, कि माताजी के इमोशनल अत्याचार के आगे झुकना पड़े। यह तो देखा जाने वाला मामला है। इस वक्त वह सात फेरों के साथ कई अन्य वचन निभाने की कसमें खाने की तैयारी करता रहेगा। और मैं, गवाह के तौर पर उपस्थित रहने की कोशिश करूंगा।
शादी के इस राउंड के बाद भी दूल्हे को चैन नहीं रहेगा। पता है क्यों? क्योंकि इसके बाद भी ढेर सारे काम होते हैं। अरे! वह काम नहीं, बल्कि सालियों से भिड़ने का काम। अगर मैं सही हूं तो, शायद कोहबर का पूजा वाला राउंड। अगर कुछ गलत हो तो माफ करना, अनुभवी नहीं हूं न।
अब से ठीक एक सप्ताह बाद इस समय यानि 4.00 AM बाराती, गहरी नींद में सो रहे होंगे। शायद मैं भी। लेकिन इसमें बहुत सुख मिलेगा, पहला तो यह कि दोस्त अब ज़िंदगी के सफर पर अकेला नहीं चलेगा। उसका साथ निभाने को भाभीजी के रूप में जीवन संगिनी को लेने जो हम आए रहेंगे।
घंटे-दो-घंटे बाद सभी बाराती, मूड फ्रेस करने के मूड में होंगे। हां भई, सुबह सबसे जरूरी काम वही होता है। इसके बाद सारे के सारे गंवई बाराती टूट पड़ेंगे। पता है किसपर? चाय-पकोड़े-और नमकीन पर। हां! बारात में सुबह यही मिलता है। घंटे-दो-घंटे यही चलेगा। फिर कन्यापक्ष का नाई बारातियों को फाइनल राउंड के लिए घर पर आने का आमंत्रण देगा, तबतक यह बारात गांव के बाहर किसी स्कूल की बिल्डिंग में या खेत को बराबर कर लगाए गए शामियाने में रहेगी।
अब से एक सप्ताह बाद यानि 12 मई को 9 बजे लगभग खिचड़ी खाने का प्रोग्राम होगा। गांव की शादियों में सबसे रसिया प्रोग्राम। भई, सालियां और समधनी यहीं तो अपनी कसर निकालेंगी। गालियों की बौछार रहेगी, दुल्हे राजा खाय ला खिचड़ी जैसे गाने भी गाएं जाएंगे। इस दौरान मामा या किसी कि सलाह पर दूल्हा जैसे ही खिचड़ी खाएगा, कन्यापक्ष के लोग फिर से हसी उड़ाने पर आ जाएँगे। इन गानों के साथ खिसियाय गएन, दूल्हे राजा, खिसियाय के खिचड़ी खाय लिएन टाइप। काफी समय हो गया तो अब गाने याद नहीं रहे। फिर काफी देर तक मैं भी सालियों से चुहलबाजी करूंगा, पता है क्यों? क्योंकि भईयाजी की सालियां यानि भाभीजी की बहने और उनकी सहेलियां हमारे भईया को रिश्वतस्वरुप गिफ्ट देती रहेंगी। इसी दौरान खूब हंसी मजाक भी होगी। दोस्त होने के नाते और छोटा जीजाजी होने हक के चलते हम भी वहां टूट पड़ेंगे, सालियों से मजाक करने। खैर यह तो देखा जाएगा, मजाक किया जाए या नहीं। क्योंकि यह बात सालियों पर निर्भर करेगी। आजकल गोलियाँ भी चलने लगी हैं। खैर, जों भी होगा, हम तो फुल मस्ती के मूड में रहेंगे।
खिचड़ी खाने के बाद या साथ ही हम बारातियों को भी दक्षिणा के साथ विदा किया जाएगा। उसके बाद हम घर आ जाएंगे। घर आने के बाद कुछ देर तक चहलपहल होगी, फिर रिश्तेदार और दूर के दोस्त वापस जाने लगेंगे तो माहौल थोड़ा बदलेगा। लेकिन विमल की शादी के बाद, शाम तक माहौल हम फिर से पहले वाला कर देंगे। पता है कैसे? अरे यार। हम क्रिकेटरों की मस्ती पर कुछ भारी पड़ सकता है क्या? हां! हम इसी ताक में रहेंगे कि खिसकने का मौका कब मिले, और हम निकाल जाएं। बागों में खेलने के लिए।
वैसे, सुनने में आ रहा है कि गांव में आम की पैदावार जबरदस्त है। अगर ऐसा है तो रामकुबेर पाण्डेय जी खैर मनाएं। गांव के सारे पुराने बदमाश इकट्ठे हो रहे हैं। उसकी आम के बाग से इस बार भी खूब आम टूटेंगे। वैसे इस बार अपनी भी बगिया में आम काफी अच्छे लगे हैं। यह देखा जाएगा। फ़िलहाल सुबह हो चली है। मेरे लैपटॉप और रीबोक की घडी के साथ स्पाइस का मोबाइल भी समय4.16 AM दिखा रहा है।
अब विमल से बात करनी है, ताकि मैं सो सकूं, और दोपहर या कल, आप सबको अपनी यह कहानी पढ़ा सकूं। फ़िलहाल तो विमल की शादी को लेकर यहां मैं खोया हुआ हूं, सोच रहा हूं। अगर इतना ज्यादा खुश मैं हूं तो विमल की क्या हालत होगी? यह तो विमल ही जानता होगा। उस बेचारे को तो पता भी नहीं, कि वह आज अपने बरीक्षा में लगा होगा, और हम यहां कहानी लिख भी चुके हैं। वैसे इस कहानी में डांस का तडका थोड़ा कम रहा, पता है क्यों? क्योंकि मैं अपनी सारी ताकत और जोश विमल की शादी में डांस के लिए बचाकर रख रहा हूं। अभी फ़िलहाल चलता हूं। शादी के कुछ दिन बाद 15-16 मई तक वापस आ जाऊंगा। फिर शादी में की गई मस्तियों के बारे में बताऊंगा। अभी तो बस मुझे मज़े लेने तो, आप अगर मजे ले रहे हों तो लें, लेकिन यह न सोचिएगा, ‘बेगानों की शादी में अब्दुल्ला...................., लेकिन यहां मामला उल्टा है !!!

Thursday, April 11, 2013

यकीन दिला दूंगा कि मैं बुरा था, मगर इतना भी नहीं


श्रवण शुक्ल: बस जो दिल को छू जाए...
लाइफ है बॉस..झटके खाने के लिए..



यादों में कितने दफा
तुम्हारी गली, तुम्हारा दर्द पुकारता रहा
मगर क्या करूं? मुझसे ही आया न गया
एक गम जो मैंने दिया था तुम्हे
मुझसे भुलाया न गया
उस रोज मैं यहां से गया था, यह सोचकर, कि लौट आऊंगा
एक वादा जो किया था तुमसे, वो निभा जाऊंगा
मगर शायद उस वक्त ज़िन्दगी को यह मंजूर नहीं था
वरना मैं इस कदर भी मजबूर नहीं था
अभी भी वक्त है .. हां वक्त है अभी
लेकिन यह वादा है खुद दे
कि एक दिन तुम्हारे सामने आऊंगा
तुमने जो किया था, वह हर शिकवा मिटा जाऊंगा
यकीन दिला दूंगा कि मैं बुरा था, मगर इतना भी नहीं
वरना तुम्हारा हर इलज़ाम अपने सर उठा लूंगा
जो कर पाया अगर इतना भी नहीं

तेरे बिन, तेरे बिन डर सहा
लम्हा –लम्हा कैसे कटा
साथ चले पर राह में पिछड़े
मैं कहा तू कहा आ आ आ आ
तेरे बिन तेरे बिना तेरे लिए
तेरे बिन तेरे बिन ऐसे जिए
गम और ख़ुशी, लेके कभी
जी लिए, मर लिए
देरे न, देरे न देरे न....

Roman hindi.. I just luv this track
Yaado me Kitni dafa
Tumhari Gali Tumhara Dard Pukarta Raha
Magar Kya karoo Mujhse hi aaya na gaya
Ek gum jo maine diya tha tumhe
Mujhse bhulaya na gaya
Us roz main yaha se gaya tha ye sochkar ki laut aaunga
Ek wada jo kiya tha tumse wo nibha jaunga
Magar shayad us waqt zindagi ko ye manzoor nahi tha
Warna main is kadar bhi majboor nahi tha
Abhi bhi waqt hai... haa waqt hai abhi
Lekin ye wada hai khud se
Ki ek din tumhare saamne aaunga
Tumne jo kiya tha wo her shikwa mita jaaunga
Yakeen dila dunga ki main bura tha magar itna bhi nahi
Warna tumhara her ilzaam apne sir utha lunga
Jo kar paya aagar itna bhi nahi.
Tere Bin tere bin dard saha
Lamha lamha kaise kata
Saath chale per raah me bichre
Main kaha tu kaha aa aa aaa
Tere bin tere bin tere liye
Tere bin tere bin aise jiye
Gum or khushi leke kabhi
Ji liye mar liye
Dere na dere naa aa

Monday, April 8, 2013

अखबार के मालिक और मेरी भिड़ंत: अरुणेश सी. दवे


अख़बारों के नजरिए में पाठक, बोले तो-रै बेवकूफ़ भारतीय आम आदमी..आगे पढ़ें....

शाम के वक्त एक साहित्य प्रेमी अमीर मित्र का फ़ोन आया। उनके फ़ार्म हाउस में वाईन एंड डाईन का न्योता था।  मुफ़्त में पैग लगाने की खुशी में हम दनदनाते पहुंच गये। वहां एक सज्जन और विराजमान थे। मित्र ने मेरा उनसे परिचय करवाया। वे मध्य भारत के सबसे बड़े अखबार के मालिक और संपादक थे। उन्होने ससम्मान मुझसे हाथ मिलाया। मित्र ने मेरा परिचय दिया- "भाईसाहब बड़े अच्छे व्यंग्य कार हैं।" यह सुनते ही सज्जन के चेहरे पर तिरस्कार के भाव उभरे। मन ही मन उन्होने अनुमान लगाया कि जरूर इस लेखक की चाल होगी। पार्टी के बहाने अपने लेख पढ़वायेगा। पर टेबल पर रखी शीवाज रीगल की बोतल देख, उनकी नाराजगी कुछ कम हो गयी। मन मार कर बोले- "चलिये इसी बहाने आपसे मुलाकात हो गयी।"
मैने भी मन ही मन सोचा, भाड़ में जाये मुझे इनसे क्या लेना देना। अपन तो पैग लगाओ। यहां वहां की चर्चा होती रही। और अखबार के  मालिक साहब इंतजार करते रहे कि कब मै अपनी रचना उन्हे दिखाउंगा । दो राऊंड होने के बाद भी जब लेख प्रकाशित करने की कोई चर्चा न हुई। तो मालिक साहब का माथा ठनका। पांच राउंड होने के बाद तो सब गहरे मित्र बन जाते हैं। ऐसे में बात टालते न बनेगी।  मालिक साहब ने बात मेरे लेखन पर मोड़ी बोले- "भाई साहब, कोई रचना साथ लाये हैं क्या। मैने पूछा- "किस लिये श्रीमान।" हकबकाये मालिक साहब ने कहा- " अखबार में छपवाने के लिये और क्यों।"  मैने पूछा- "किस अखबार में छपवाने के लिये ?" वे बोले- अरे भाई, मैं छापूंगा तो अपने अखबार मे ही ना। लगता है आप मेरी बात कुछ समझे नही।" मैने कहा- "आप तो कोई अखबार निकालते ही नहीं हैं श्रीमान।"  मालिक साहब ने असहाय भाव से मित्र की ओर देखा। मानो कह रहें हो कैसे आदमी के साथ बैठा दिया दो पैग में ही लग गयी है।

मालिक साहब ने याद दिलाया- "अरे भाई मै  फ़लां अखबार का मालिक संपादक हूं, भूल गये क्या आप।" मैने पलट कर जवाब दिया- "वो तो अखबार है नही, सत्तारूढ़ पार्टी का मुखपत्र है। भाट और चारण जैसे चाटूकारिता करने वाला। अंतर यही है कि सरकार की छोटी मोटी गलतिया छाप दी जाती है । हां कभी कभी उसमे मंहगाई का जिक्र जरूर कर दिया जाता है।" मालिक साहब बैकफ़ुट पर थे- "आप गलत समझ रहे हैं। हमारा अखबार दूसरो से अलग है। हम किसी के दबाव में नही आते।" मैने कहा- "आम जनता को टोपी पहनाईगा मालिक साह्ब, हमे नही। सरकार के हर विभाग में खुला कमीशन बट रहा है। घपले हो रहे हैं। और आपके पत्रकार भी भीख मांगते वहीं पाये जाते हैं। कभी छापा आपने ?  क्या छापते हैं आप-  "अन्ना हजारे ने अपने भांजे को कांग्रेस में भरती किया" "बाबा रामदेव खुद को राम कह रहे हैं।" शांती भूषण नजर आ रहा है आपको। भ्रष्टाचार का प्रदूषण नही।  सलवा जुड़ूम के नाम पर हो रहा अत्याचार तो खैर आपको मालूम ही न होगा। नक्सलवाद की चक्की पर पिस रहे आदिवासियो के बारे में क्या किया आपने ? कुछ नही। छापते क्या हैं आप- "चमत्कारी अंगूठी", "फ़र्जी बाबाओ के विज्ञापन"। और तो और  वो लिंगवर्धक यंत्र का कभी उपयोग किया है आपने क्या मालिक साहब जो दूसरो को बतलाते हो 

बात बिगड़ती देख, मालिक साहब ने समझौते का प्रयास किया- "आप इतने जोशीले आदमी हैं। लेख भी जानदार लिखते होंगे।" मैने कहा- "लिखता तो हूं, पर छापने की हिम्मत आपमे न होगी।  छाप पायेंगे उन कंपनियो की काली करतूत। जिनके शेयर आपने सस्ते दामो में ले रखे हैं। जिनके करोड़ो रूपये के एड आपके मुखपत्र को मिलते हैं। आप तो छापिये दलित लड़की से बलात्कार, सड़क हादसे, ब्लागरो से चुराये हुये लेख।" फ़िर हमने हाथ होड़ कर कहा- " हे फ़्री प्रेस के चाचा, फ़्री मे ब्लागरो के लेख पाओ और जनता को दिखाने के लिये बड़े नाम की तारे और मच्छर पर घटिया तुकबंदी छपवाओ। पर अपने को अखबार बस मत कहो।" आज भारत का चौथा स्तंभ न  बिकता, तो मजाल है भारत में ये भ्रष्टासुर पैदा हो जाता।"

अब तक चार राउंड हो चुके थे। मालिक साहब भी क्रोध में आ चुके थे । वे  जोर से चिल्लाये- "रै बेवकूफ़ भारतीय आम आदमी। इसके जिम्मेदार खुद तुम लोग हो। तुमको हर चीज फ़ोकट में चाहिये पैसा जेब से एक न निकलेगा। बस दुनिया मुफ़्त में तुम्हारी रक्षा करे। दो रूपये किलो वाला सस्ता चावल जैसे २ रूपये में सस्ता अखबार चाहिये। तो कनकी ही मिलेगा बासमती नही। बीस रूपया महिना खर्चा कर एक पत्रिका तो खरीदना नही है। कहां से रूकेगा भ्रष्टाचार। कागज का दाम मालूम है ? अखबार के खर्चे कैसे पूरे होते होंगे कभी सोचा है? तुम खुद पैसा कमाओ तो ठीक और हम लोग तुम्हारे लिये भूखा मरें। बात ध्यान से सुन - "हम लोग तुझको अखबार बेचते नहीं है। सस्ते दाम में तुझे अखबार देकर तुझको खरीद लेते हैं।"  फ़िर हम तुझे बेचते हैं उन कंपनियो को। जो हमे तुम्हारा सही दाम देती हैं। उन नेताओ को जो तुम्हारे पैसे मे ऐश करते हैं और हमे भी करवाते हैं । पैसा देकर तुम्हारी तरह फ़ोकट नही। और सुन तुझे और लोग भी खरीदते हैं सी आई ए से लेकर तमाम विदेशी। ताकि वे अपने हिसाब का लेख छपवा कर भारत में मन माफ़िक जनमत तैयार करवाएं और अपना माल खपाएं। किसी पेपर में पढ़ता है क्या कि अमेरिकी विमान रूस के समान विमान से डेढ़ गुनी कीमत के पड़ते हैं। या परमाणू रियेक्टर की कीमतो का तुलनात्मक अध्ययन। नही न क्यों क्योंकि तुम लोग पैसा नही देते उन लोग देते हैं।" फ़िर मालिक साहब ने हमारी ही तर्ज पर हमे हाथ जोड़ कहा- तो हे फ़ोकट चंद भिनभिनाना बंद कर और चैन से मुझे पैग लगाने दे।"

मैने फ़जीहत से बचने के लिये अपने मित्र की ओर देखा। पर वह तो चैन से मजा ले रहा था। अब मुझे समझ में आया। ये सारा युद्ध प्रायोजित था  मै और मालिक साहब रोमन ग्लेडिएटर की तरह उसके मजे के लिये लड़ रहे थे। मैने प्रतिरोध किया-" मालिक साहब देशभक्ती भी कोई चीज है कि नहीं। मालिक साहब बोले- "है क्यो नही दवे जी। हम लोग दाल में नमक की तरह उसको भी इस्तेमाल करते हैं। तभी तो ये देश आज बचा हुआ है। राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले मे हम कोई समझौता नही करते। अरे भाई अगर देश ही नही रहेगा तो फ़िर तो हम ऐश कैसे करेंगे। पर भाई लोगो को जब इंडिया टीवी मे भूत प्रेत देखने में मजा आ रहा है तो कोई क्यो खोजी पत्रकारिता कर अपना जीवन बरबाद करे।"

 अब तक पांच राउंड हो चुके थे और हम और मालिक साहब  गहरे मित्र भी बन चुके थे। मालिक साहब बोले- यार वैसे तू बंदा बड़ा जोशीला है। तुझे व्यस्त न किया गया और सरकारी माल न दिया गया तो  नक्सली नेता बन जायेगा और फ़ोकट में मारा जायेगा। एक काम कर भाई  कल से मेरे आफ़िस आजा। दिन भर यहां वहां से सामग्री चुराना और जरा जोश भर के उसमे हेर फ़ेर कर देना। तू भी खुश रहेगा और मुझे भी चैन से पीने और जीने देगा।"

 मालिक साहब के विदा होने के बाद मैने दोस्त को धिक्कारा- " धुर कमीना है तू। अपने ही दोस्तो को इनवाईट कर आपस में लड़ा कर मजा लेता है।  मित्र भी दार्शनिक बन गया- " मालिक साहब की बात भूल गया। कोई भी चीज फ़ोकट में नही मिलती बेटा।  दारू का खर्चा मैने किया था तो मजे लेने के लिये ही न।"

अरुणेश जी के ब्लॉग से साभार: ब्लॉग पर जाने के लिए यहां क्लिक करें.

Monday, March 25, 2013

अंग्रेजों का वहशीपन और 'शहादत में ही हमारी जीत है: भगत सिंह'


मुंबई। 23 मार्च 1931 को शाम 7.30 बजे भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को लाहौर जेल में फांसी दे दी गई थी। भगत सिंह की उम्र वक्‍त महज 23 साल थी, लेकिन इतनी सी उम्र में उन्‍हें पता था कि बिखरे हुए भारत को कैसे एकसाथ खड़ा किया जा सकता है। वो हमेशा कहा करते थे,‘हमारी शहादत में ही हमारी जीत है।’ भारत की आजादी के लिए जो वह सोचते थे उस पर उन्‍हें पूरा भरोसा था और उन्‍होंने बिना हिचक अपनी जिंदगी दांव पर लगा दी। ऐसा नहीं था कि उन्‍होंने जोश में ये कदम उठाया था बल्कि वह जानते थे कि उनकी शहादत से ही देश के लिए आजादी का रास्‍ता खुलेगा। भगत सिंह ने महात्‍मा गांधी का सम्‍मान किया, लेकिन कई मामलों पर उनके मतभेद थे ये बात सभी जानते हैं, लेकिन 23 साल के भगत सिंह उस समय अंग्रेजों के लिए महात्‍मा गांधी से भी बड़ी चुनौती बन गये थे। भगत सिंह ने बिना कोई पद यात्रा किए, बिना हजारों लोगों को जुटाए सिर्फ अपने और चंद साथियों के दम अंग्रेजों को लोहे के चने चबाने को मजबूर कर दिया था। शायद यही कारण रहा कि अंग्रेजों ने न केवल उन्‍हें फांसी पर चढ़ाया बल्कि उनके शवों को भी क्षत-विक्षत किया और टुकड़ों में शवों को काटकर अधजली हालत में सतलुज नदी में बहाया गया। आइये जानते हैं 23 मार्च 1931 के दिन आखिर क्‍या हुआ था?      

11 घंटे पहले लिया गया फांसी का फैसला

अंग्रेज सरकार भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी देने का मतलब अच्‍छी तरह से जानती थी। उसे पता था कि इन तीनों नौजवानों को फांसी देने से पूरा देश उठ खड़ा होगा, लेकिन उसे ये भी पता था कि अगर ये तीनों जिंदा रहे तो जेल में बैठे-बैठे ही क क्रांति का बिगुल बजा देंगे, इसलिए भगत सिंह को फांसी देने के लिए पूरा सीक्रेट प्‍लान तैयार किया गया और 23 मार्च यानी फांसी के दिन से सिर्फ 11 घंटे पहले ये तय किया गया कि भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु को कब फांसी देनी है। अंग्रेज सरकार ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को उसी दिन फांसी की खबर दी, जिस दिन उन्‍हें फांसी पर चढ़ाया जाना था।

शाम 7.33 बजे दी गई फांसी 

23 मार्च 1931 को शाम में करीब 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फांसी दे दी गई। फांसी पर जाने से पहले वे लेनिन की नहीं बल्कि राम प्रसाद बिस्मिल की जीवनी पढ़ रहे थे। कहा जाता है कि जेल के अधिकारियों ने जब उन्हें यह सूचना दी कि उनके फांसी का वक्‍त आ गया है तो उन्होंने कहा था- ठहरिये! पहले एक क्रान्तिकारी दूसरे से मिल तो ले। फिर एक मिनट बाद किताब छत की ओर उछाल कर बोले -ठीक है अब चलो।

रात के अंधेरे में शवों के साथ वहशियाना सलूक 

अंग्रेजों ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी खबर को बहुत गुप्‍त रखा था, लेकिन फिर भी ये खबर फैल गई और लाहौर जेल के बाहर लोग जमा होने लगे। अंग्रेज सरकार को डर था कि इस समय अगर उनके शव परिवार को सौंपे गए तो क्रांति भड़क सकती है। ऐसे में उन्‍होंने रात के अंधेरे में शवों के टुकड़े किये और बोरियों में भरकर जेल से बाहर निकाला गया। शहीदों के शवों को फिरोजपुर की ओर ले जाया गया, जहां पर मिट्टी का तेल डालकर इन्‍हें जलाया गया, लेकिन शहीद के परिवार वालों और अन्‍य लोगों को इसकी भनक लगी तो वे उस तरफ दौड़े जहां आग लगी दिखाई दे रही थी। इससे घबराकर अंग्रेजों ने अधजली लाशों के टुकड़ों को उठाया और सतलुज नदी में फेंककर भाग गये। परिजन और अन्‍य लोग वहां आए और भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के शवों को टुकड़ों को नदी से निकालाकर उनका विधिवत अंतिम संस्‍कार किया।

शहादत के बाद भड़की चिंगारी 

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत की खबर को मीडिया ने काफी प्रमुखता से छापा। ये खबर पूरे देश में जंगल की आग तरह फैल गई। हजारों युवाओं ने महात्‍मा गांधी को काले झंडे दिखाए। सच पूछें तो देश की आजादी के लिए आंदोलन को यहीं से नई दिशा मिली, क्‍योंकि इससे पहले तक आजादी के कोई आंदोलन चल ही नहीं रहा था। उस वक्‍त तो महात्‍मा गांधी समेत अन्‍य नेता अधिकारों के लिए लड़ रहे थे, लेकिन भगत सिंह पूर्ण स्‍वराज की बात करते थे, जिसे बाद में गांधी जी ने भी अपनाया और हमें आजादी मिल सकी।

साभार: हिंदी.इन.कॉम

Monday, March 11, 2013

'ह्यूगो शावेज, जिसने बदल डाली दक्षिणी अमरीकी इतिहास की धारा'


गहरे शोक और दु:ख के साथ सारी दुनिया ने ह्यूगो शावेज फ्रिआस के निधन की खबर सुनी है। दो वर्ष से ज्यादा कैंसर से लड़ने के बाद अंतत: 5 मार्च को वेनेजुएला की राजधानी कराकास में इस घातक रोग ने उनके प्राण ले लिए। दुनिया भर की प्रगतिशील ताकतों ने एक ऐसा करिश्माई नेता खो दिया है जिसने पिछले दशकों में इतिहास की धारा को और खासतौर पर लातीनी अमरीका में इतिहास की धारा को बदला था। उन्होंने व्यवहार में यह दिखाया था कि खुद पूंजीवादी व्यवस्था के दायरे में भी, नवउदारवाद का और आर्थिक नीतियों की उसकी दिशा का विकल्प हो सकता है। और उन्होंने यह अमरीका के पिछवाड़े में कर दिखाया था और इस तरह वर्चस्व की उसकी मुहिम को विचारधारात्मक सतह पर भी और आर्थिक सतह पर भी, चुनौती दी थी। इस सिलसिले में उनका भावपूर्ण तरीके से समाजवाद के रास्ते पर चलना खासतौर पर महत्वपूर्ण है। उनका विश्वास था कि वह जिन जनहितकारी तथा साम्राज्यवादविरोधी नीतियों को लागू कर रहे थे, समाजवाद की ओर ले जाएंगी। अपनी अंतिम सांस तक वह क्यूबाई क्रांति और उसकी उपब्धियों से प्रेरणा ले रहे थे।
 ह्यूगो शावेज ने उदाहरण कायम करने के जरिए लातिनी अमरीका में राजनीतिक प्रक्रियाओं पर गहरा असर डाला था। इसके नतीजे में ही तमाम लातिनी अमरीकी देशों में साम्राज्यवादविरोधी जनउभार सामने आया है। बोलीविया में इवो मोरालेस की जीत ने खासतौर पर शावेज के हाथ मजबूत किए थे और क्यूबा के साथ मिलकर उन्होंने लातिनी अमरीका के मूलगामी प्रगतिशील रूपांतरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया था। इसका नतीजा लातिनी अमरीकी देशों के बहुमत में चुनावों में प्रगतिशील, अमरीकीसाम्राज्यवादविरोधी ताकतों की जीत के रूप में सामने आया है। शावेज ने विश्व मंचों, विश्व व्यापार संगठन, पर्यावरण परिवर्तन मंच आदि पर, विकसित देशों के बोलबाले के खिलाफ लड़ाई के लिए विकासशील देशों को गोलबंद करने में सक्रिय भूमिका अदा की थी और ब्रिक्स, इब्सा नाम आदि विकासशील देशों के संगठनों के स्तर पर उनसे सक्रिय रूप से सहयोग किया था। इस तरह वह दुनिया के पैमाने पर साम्राज्यवादविरोध का प्रतीक बन गए थे।
 ह्यूगो शावेज ने स्पष्ट रूप से यह पहचाना था कि वेनेजुएला में उनसे पहले एक के बाद एक जो सरकारें आयी थीं, उनकी लागू की नवउदारवादी नीतियां ही, जनता को बड़े पैमाने पर वंचित रखे जाने के लिए जिम्मेदार थीं। इन नीतियों के खिलाफ विरोध की आवाजों को जिस नृशंसता से दबाया जाता था, इसका भी उनके रुख पर गहरा असर पड़ा था। वेनेजुएला का राष्ट्रपति चुने जाने के बाद, शावेज ने करीब-करीब पहला ही काम यह किया था कि उन्होंने संविधान सभा के चुनाव के लिए कदम उठाए, ताकि देश के लिए एक नया, जनहितकारी संविधान तैयार किया जा सके। समाज के वंचित तबकों को अधिकारसंपन्न बनाने वाले इस बोलीवारीय संविधान से लैस होकर, शावेज अपने देश की जनता की जिंदगी संवारने के काम में जुट गए। इस सिलसिले में एक महत्वपूर्ण काम उन्होंने यह किया कि वेनेजुएला के तेल व गैस उत्पादन का राष्ट्रीयकरण कर दिया। शावेज ने किया यह कि उन्होंने देश की तेल उत्पादक कंपनी पीडीवीएसए से आने वाला पैसा, विभिन्न समाज कल्याण कार्यक्रमों की ओर मोड़ दिया। दूसरे शब्दों में उन्होंने राष्ट्रीय संपदा का देशवासियों के हित पूरे करने के लिए इस्तेमाल सुनिश्चित किया। और जब धनपति घरानों ने, जिनकी आर्थिक ताकत का मुख्य स्रोत ही इस तरह सूख गया था तोड़फोड़ का रास्ता अपनाया, शावेज ने सफलता के साथ सरकार के कदमों के पक्ष में मजदूरों को गोलबंद किया। पुन: जनता के बीच शावेज की लोकप्रियता का ही कमाल था, शावेज का तख्तापलट करने की साजिश रचने वालों को अपने पांव पीछे खींचने पड़े और और उन्हें विफल तख्तापलट के बाद दोबारा राष्ट्रपति बनाया गया।
 नौकरशाहीपूर्ण शासकीय तंत्र के शिकंजे को तोड़ने के लिए और भागीदारीपूर्ण जनतांत्रिक व्यवस्था के तहत जनता की हिस्सेदारी सुनिश्चित करने के लिए, शावेज ने विशेष कार्यक्रमों का विकास किया, जिन्हें 'मिशन' का नाम दिया गया। वेनेजुएला के साधारण नागरिकों की चिंता के विभिन्न क्षेत्रों को लेकर 19 से ज्यादा मिशन शुरू किए गए।
 इन मिशनों का स्वास्थ्य तथा शिक्षा के क्षेत्रों में खासतौर पर जबर्दस्त असर दिखाई दिया। 2006 तक वेनेजुएला से निरक्षरता पूरी से मिटाई जा चुकी थी। समाजवादी क्यूबा ही लातिनी अमरीका का ऐसा दूसरा देश है, जो इस लक्ष्य को हासिल कर पाया है। क्यूबा के डाक्टरों की मदद से शावेज ने अपने देश में सभी नागरिकों लिए बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित कीं। इसी प्रकार, इन मिशनों के माध्यम से ही उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि खाद्यान्न की बढ़ती कीमतों तथा संकट के दौर में भी, आम जनता को सस्ता खाद्यान्न हासिल हो। पिछले ही साल वेनेजुएला की सरकार ने एक सचमुच क्रांतिकारी कानून बनाया था, जिसके तहत मजदूरों को बहुत सारे अधिकार दिए गए थे। अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस 1 मई पर मजदूरों के प्रति सम्मान प्रदर्शित करते हुए हर साल न्यूनतम मजदूरी में बढ़ोतरी किए जाने की व्यवस्था लागू की गयी है, फिर भी शावेज को इसका भी एहसास था कि मजदूर वर्ग की जिंदगियों का रूपांतरण करने के लिए इसके बाद भी बहुत कुछ करने को रहता था। वेनेजुएला के देहात के मामले में भी शावेज ने भूमि सुधार को लागू कराने तथा भूमि इजारेदारियों को तोड़ने के लिए कदम उठाए थे। भूस्वामी वर्ग के भारी विरोध के बावजूद, उन्होंने भूमि सुधार कानून लागू कराया था।
 शावेज ने इस सचाई को पहचाना था कि आवास की कमी और अपराध, दो ऐसी गंभीर समस्याएं हैं जिनका वेनेजुएला को सामना करना पड़ रहा था। असहयोगपूर्ण रुख अपना रही नौकरशाही द्वारा खड़ी की जा रही मुश्किलों को वह पहचान रहे थे और नौकरशाही का भी रूपांतरण करना चाहते थे ताकि इसे मजदूर वर्ग तथा समाज के वंचित तथा दबे हुए तबकों के हितों को आगे बढ़ाने के अनुकूल ढाला जा सके।
 ह्यूगो शावेज एक पक्के साम्राज्यवादविरोधी थे। वह विकासशील देशों के हितों के पैरोकार थे। उनकी बराबर यह कोशिश रहती थी कि विकासशील देशों के बीच रिश्ते बढ़ें। वह दक्षिण-दक्षिण सहयोग को सक्रिय रूप से आगे बढ़ाने के लिए काम करते थे। अमरीका ने ''प्लान कोलंबिया'' के नाम से इसकी योजना बनायी थी कि समूचे लातीनी अमरीका पर उसके प्रभुत्व और उसके द्वारा आगे बढ़ायी जा रही नवउदारवादी नीतियों का दबदबा थोपा जाए। इसकी काट करने के लिए, क्यूबा के साथ मिलकर शावेज ने एल्बा यानी लातिनी अमरीका के लिए बोलीवारीय विकल्प को आगे बढ़ाया था। लातिनी अमरीकी देशों के इन रिश्तों को आगे बढ़ाने के लिए विकासशील दुनिया के बैंक की स्थापना करने और समूचे क्षेत्र के एक ही मुद्रा, सुक्रे को चलाने के लिए, जो शावेज का सपना था, इन देशों की बहुत सारी बैठकें अब तक हो भी चुकी हैं।
 साम्राज्यवाद व वित्तीय पूंजी की उनकी तीखी आलोचना और विकासशील देशों के संसाधनों पर नियंत्रण हथियाने के लिए उनके छेड़े लूट के युद्धों की उनकी तीव्र भर्त्सना, संयुक्त राष्ट्र संघ में उनके चर्चित भाषण में सामने आयी थी, जो उन्होंने जार्ज बुश के फौरन बाद दिया था। अपने भाषण में साम्राज्यवाद को शैतान करार देते हुए, उन्होंने इस विश्व मंच से विश्व व्यवस्था को जनतांत्रिक बनाए जाने के लिए आवाज उठायी थी और अपना वर्चस्व थोपने की साम्राज्यवाद की कोशिशों की भर्त्सना की थी।
 शावेज के निधन से ऐसा शून्य पैदा हुआ है, जिसे भरना संभव नहीं है। फिर भी उनकी विरासत एक ऐसी पूंजी है जो दुनिया भर में साम्राज्यवादविरोधी जनउभारों को प्रेरित करती रहेगी तथा उत्साहित करती रहेगी। ये बढ़ते संघर्ष ही विश्व जनगण के विशाल बहुमत के मुक्तिदाता के रूप में समाजवाद की शावेज की कल्पना का जमीन पर उतरना सुनिश्चित करेंगे। इन संघर्षों को मजबूत करना ही ह्यूगो शावेज के लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
 यही संकल्प कराकास में दिखाई दिया है, जहां ''शावेज अमर हैं, संघर्ष जारी है'' के नारों के साथ हजारों लोग सड़कों पर निकल आए और उन्होंने यह कसम ली कि वेनेजुएला का पूंजीपति वर्ग मीराफ्लोरेस पैलेस में ''दोबारा कभी नहीं लौटेगा''। शावेज के उत्तराधिकारी (चुनाव अगले महीने होने हैं) उपराष्ट्रपति निकोलस मडुरो ने कहा है: ''हम जो शावेज के प्रति वफादार हैं, अपनी जिम्मेदारियां निभाते रहेंगे, जिससे जनता का एक भी कार्यक्रम रुके नहीं। हमारी जनता को देश की पूंजीवादी लूट दोबारा कभी भी नहीं झेलनी पड़ेगी।'' मडुरो ने आगे यह भी जोड़ा : ''जनता और शावेज के साथ दगा करने से तो मर जाना बेहतर है।''

                                                                      सीताराम येचुरी..साभार: देशबंधु

Thursday, February 14, 2013

O Mera Tharki India ... A must watch video.

O Mera Tharki India ... A must watch video.

Mombatiyan Jalane se kuch nahi hoga mere bhai, kuch nahi badalne yahan pe, apne dimag ki batti jalao.......

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Tuesday, February 12, 2013

कुम्भ हादसे के घायल एवं मृतकों की सूची

कृपया धैर्य बनाए रखें.. कुछ गंभीर रूप से घायल लोगों की अभी पहचान नहीं हो पाई है.. 


हेल्पलाइन नंबर
नई दिल्ली 011-23342954/011-23341074
पुरानी दिल्ली 011-23967332
इलाहाबाद 0532-2408149/2408128
मुगलसराय 05412-254145
मृतकों व घायलों की सूची :-
मृतक :-

1. उर्मिला देवी (70), पत्नी छोटे लाल, रामबाग, बक्सर
2. बिपताबाई (60), पत्नी देवप्रसाद मझौली, जबलपुर
3. नत्थूलाल द्विवेदी (72), पिता दिवंगत श्रीराम द्विवेदी, आशा नगर, हरदोई
4. संध्या शुक्ला (46), पत्नी राजेश कुमार, चकेरी, कानपुर
5. कामताबाई (65), पत्नी गोपीनाथ, औरंगाबाद, महाराष्ट्र
6. रामकला श्रीवास्तव, पुत्र गंगा प्रसाद, मेहंदीनगर, प्रतापगढ़
7. रामसुती, भिंड, मध्य प्रदेश
8. शिवकुमारी, आरा, बिहार
9. आशा देवी, आरा, बिहार
10. बिपताबाई (60), पत्नी देवप्रसाद मझौली, जबलपुर, मध्य प्रदेश
11. चौटे लाल मीणा (46), पुत्र सुखराम
12. बबिता (35)
13. शिवकुमार देवी (45), पत्नी रमेशचंद्र, कृष्णगढ़, आरा, बिहार
14. राम धुली (58), पत्नी मोहर, दिल्ली
15.राम कैलाश श्रीवास्तव (35),पुत्र गया प्रसाद, प्रतापगढ़
16.राम सती देवी (35), पत्नी जितेंद्र सिंह चौहान, मध्यप्रदेश, भिंड
17.संध्या शुक्ला (46), पत्नी आर के शुक्ला, कानपुर
18.शिव कुमारी (45), पत्नी रमेश सिंह, कृष्णा नगर, आरा बिहार
19.उर्मिला देवी (70),पत्नी छोटे लाल, बक्सर, बिहार
20.विपिता बाई (60), पत्नी रेवा प्रसाद, जबलपुर, माझोली
घायल :-

1. प्रवीण (25), सोनीपत, हरियाणा
2. राम निवास (45), सोनीपत, हरियाणा
3. पार्वर्ती (45), धनबाद, झारखंड
4. शेष बहादुर (32), सोन बिहार, दिल्ली
5. सुमित्रा (60), बिगर, कर्नाटक
6. छोटे लाल यादव (60), बक्सर, बिहार
7. मुनीश देवी (40), मॉडल टाउन, दिल्ली
8. राजेश गुप्ता (22), दिल्ली
9. शगुनबाई (35), बड़गांव
10. ज्योति (18), बड़गांव
11. देवकी यादव (55), झारखंड
12. बिल्लो (35), जौनपुर, उप्र
13. कृष्णादेवी (40), बक्सर, बिहार
14. कमलेश मिश्रा (40), नवादा, बिहार
15. शकुंतला (35)
16. सत्यम भावना (30)
17. शेष बहादुर (55)
18. शाहबहादुर (45), इटावा, उप्र
19. लक्ष्मी अवस्थी (35), फतेहपुर, उप्र
20. बिट्टन (55) सतना, मध्य प्रदेश
21. प्रवीण कुमार (40), सोनीपत, हरियाणा
22. सरस्वती (30), छिंदवाड़ा, छत्तीसगढ़
23. राजीव गुप्ता (50), फरीदाबाद, हरियाणा
24. राधिका देवी (40), मेहरौली, दिल्ली
25. शाकराबाई (40)
26. सनंत कुमार, मिश्र पुत्र राजकुमार मिश्र, विध्ववासिनी अकबरपुर बांदा, उप्र
27. लक्ष्मीकांत विमल (36), पुत्र कृष्णकांत विमल, लोहना मधुबनी, बिहार
28. रंजना झा (35), पत्‍‌नी नागेंद्र झा, कटवरिया, दिल्ली
29. सविता झा (42), पत्‍‌नी मणेश्वर झा, दिल्ली
30. बिट्ट (55), पत्‍‌नी सालिगराम सिविल लाइंस, सतना, मध्य प्रदेश
31. शुकनबाई (35), पत्‍‌नी मुनीश बड़ागांव रीठी, कटनी, मध्य प्रदेश
32. ज्योति (12), पुत्री मुनीश बड़ागांव रीठी कटनी, मध्य प्रदेश
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