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Sunday, September 8, 2013

जेल भिजवाने वाले कापड़ी को यशवंत का सलाम!

Yashwant Singh : जेल से लौटे एक साल पूरे हो गए. विनोद कापड़ी और साक्षी जोशी को याद कर लेना चाहता हूं कि इन माननीयों के सौजन्य से जीवन के अनुभवों में कुछ बेहद संवेदनशील और सीखने लायक पल, अनुभव जुड़े. पिछले एक सालों के दौरान एक चीज महसूस किया कि विनोद कापड़ी में काफी बदलाव आ चुका है.
विनोद कापड़ी सवाल उठाए जाने पर अब अपने किए को महसूस करता है और अपने फेसबुक वॉल पर लिखकर क्षमा भी मांग लेता है, भले ही वह पेड न्यूज का मसला हो...
वह पत्रकारों की एकमुश्त छंटनी का न सिर्फ विरोध करता है बल्कि अपनी जी न्यूज वाली कहानी बताकर लिखकर एक तरह से छंटनी की अनुमति देने वाले और छंटनी पर चुप रहने वाले संपादकों की बुजदिली को कोसता है और बाकी पत्रकारों को यह सीख देता है कि अगर गलत हो तो खुल कर विरोध करो, नतीजा जो भी निकले...
वह किसी पत्रकार साथी के निधन पर कोष जुटाने का भी काम शुरू कर देता है.... और यह करके वह बाकी संपादकों को अघोषित संदेश देता है कि हमें अपने जूनियरों, अधीनस्थों के दुखों में शरीक होना चाहिए, उनके परिजनों की पीड़ा को महसूस करना चाहिए...
यह सब बताता है कि अब वह सिर्फ और सिर्फ अपने लिए नहीं जीता... उसने अपने दायरे को विस्तृत कर दिया है... इस बदलाव का स्वागत किया जाना चाहिए... किसी को बुरा बनने या बताने में वक्त नहीं लगता, लेकिन किसी बुरे को अच्छा बनने और अच्छे के रूप में पहचाने जाने में वक्त तो लगता है... लेकिन मैंने वक्त से पहले न सिर्फ पहचान लिया बल्कि इसे प्रचारित भी कर रहा हूं... :)
एक और बात, दुनिया में कोई चीज स्थायी नहीं होती. न क्रोध, न प्यार, न दोस्ती, न दुश्मनी... समझ, चेतना, ज्ञान, अनुभव के बढ़ने, के उदात्त होने के साथ-साथ हर तरह के पाजिटिव निगेटिव भाव अपनी अपनी जगह से आगे बढ़ते हुए एक बड़े तटस्थ मोड में पहुंच जाते हैं जहां कुछ भी न बुरा होता है और न अच्छा.. ऐसी स्थितियां कम लोगों के साथ आती हैं.. इस अवस्था में कम ही लोग पहुंच पाते हैं... कई तो पूरी जिंदगी कुत्ते की तरह भों भों करते हुए एक दिन भों भों मोड में ही मर जाते हैं... ऐसे कई संपादक आपको दिख जाएंगे... पर संवेदनशील आदमी अपने कुत्तापना को न सिर्फ महसूस करता है बल्कि उससे सबक लेकर उसे पूरी तरह बूझ जाने के बाद उससे मुक्त होने, उससे आगे जाने की यात्रा शुरू कर देता है...
दिक्कत जड़ता से होती है... जैसे, देश और समाज का सिस्टम जड़ ज्यादा है, उदात्त और अपग्रेड होने के मोड में कम रहता है.. पर यह संभव है कि आप एक जड़ सिस्टम में अपने ज्ञान, समझ, चेतना, अनुभव, यात्राओं के बल पर बेहद गतिमान, बेहद उदात्त बन जाएं और मुक्त हो जाएं... किसी ने मुझसे कहा कि फलां आदमी आपके दुश्मन हैं... मैंने उससे कहा कि मैं किसी को दुश्मन नहीं मानता... फलां आदमी मुझे दुश्मन मानता होगा क्योंकि यह उसकी दिक्कत है... यह उसकी प्राब्लम है...
मुझे तो किसी में दुश्मनी मानने, लेने जैसी कोई चीज दिखती नहीं... दुश्मनी अगर किसी से है तो मुझे खुद से है.. मेरे अंदर की नकारात्मकता से है... और, यह आंतरिक युद्ध हर कोई लड़ता है... कई लोग इस आंतरिक युद्ध को समझ नहीं पाते इसलिए अपने फ्रस्ट्रेशन, अपनी कुंठाएं, अपनी ताकत अपने अधीनस्थों, अपने जूनियरों, अपने जानने-चाहने वालों पर निकालने लगते हैं और उनसे दुश्मनी मोल ले बैठते हैं, उन्हें दुश्मन मानने लगते हैं... पर दरअसल दुश्मन तो खुद हमारे अंदर, हमारी सोच में, हमारी स्टाइल में, हमारी कार्यशैली में बैठा हुआ है...

जेल से बाहर आने के एक साल के मौकै पर मैं सदा की तरह पिता विनोद कापड़ी और माताजी साक्षी जोशी को माफ करूंगा, ये जानते हुए भी कि वो नहीं जानते उन्होंने क्या किया ... और ये भी कि मेरे माफ करने के बावजूद दुनिया के हर हिस्से में हर रूप में मौजूद गाड पार्टकिल उनकी अंदर की नकारात्मकता, अहंकार का हिसाब किसी न किसी फार्मेट में लेगा, स्वयंमेव लेगा... इसी को प्राकृतिक न्याय भी कहते हैं... अगर उन्होंने नकारात्मकता और अहंकार त्याग दिया हो तो बड़ी  अच्छी बात है... वो अहंकार चाहें मैनेजिंग एडिटर होने के भाव का हो, सत्ता-सिस्टम से बेहद नजदीकी करीबी रखने वाली सोच की हो या सब सिखाकर ठीक करने की मानसिकता का हो...
जो इसी को समझ लेता है फिर वह किसी से दुश्मनी नहीं मानता और किसी को सबक सिखाने के चक्कर में नहीं पड़ता क्योंकि हर एक्शन रिएक्शन का प्रति उत्तर में प्राकृतिक व स्वाभाविक रिएक्शन एक्शन होता है.. बिना किसी के हस्तक्षेप, बिना किसी के कहे, बिना किसी के किए... हां, इतना मैं जानता हूं कि मेरे बहुत एहसान विनोद कापड़ी पर होंगे... जैसे कि जब विनोद साक्षी की प्रेम लीला की तस्वीरें व चैट व पत्र लीक किए गए थे तो मेरे पास भी छापने के लिए भेजे गए पर हमेशा की तरह मैंने भावना, दुश्मनी की जगह एथिक्स का साथ दिया और किसी के परसनल लाइफ की चीजों को प्रकाशित करने से मना कर दिया...
मुझे याद है तब विनोद कापड़ी और साक्षी ने उसे भड़ास पर न छपने देने के लिए जाने कितने तरह से प्रयास किए थे और न छपने पर इसका आभार भी माना था... जब मैं दैनिक जागरण में था और एक रात कापड़ी से नौकरी के लिए फोन किया तो उसकी बोलने के लहजे से दुखी होकर उसी के लहजे में जवाब दे दिया और फिर जो द्विपक्षीय गाली गलौज शुरू हुई उसे विनोद कापड़ी ने चोरों की तरह चुपके से रिकार्ड कर लिया और दैनिक जागरण के मालिक संजय गुप्ता को भेज दिया.. फिर वही होना था, नौकरी मिलने की जगह जागरण में चल रही नौकरी भी चली गई... ऐसे कई वाकये हैं..
ये भी सच है कि मैंने दारू के नशे में कापड़ी को कई बार गरियाया है... पर पूरा हिसाब लगाया जाए तो कापड़ी ने सदा मुझे आगे बढ़ाया है... जिसके लिए मैं उनका आभारी रहूंगा... मतलब ये कि उन्हीं के कदमों से बने हालात के कारण भड़ास4मीडिया का जन्म हुआ... उन्हीं के कदमों से बने हालात के कारण 'जानेमन जेल' ने जन्म लिया..  ये दो बड़ी उपलब्धि अपन के खाते में है और इसके कारक हैं विनोद कापड़ी. कभी कभी मुझे लगता है कि मैं आप सभी को बता दूं कि असल में विनोद और मेरी फिक्सिंग है, एक दूसरे को टीआरपी दिलाते रहने के लिए... :) 
विनोद कापड़ी और साक्षी जोशी द्वारा मेरे खिलाफ फर्जी मुकदमे लिखाने और जेल भिजवाने की 'पहल' के बाद दैनिक जागरण को भड़ास पर हमला करने का मौका मिला और घर-आफिसों पर छापेमारी कराने के साथ-साथ भड़ास के तत्कालीन कंटेंट एडिटर अनिल सिंह को भी जेल में डलवा दिया गया... हालांकि अंत में दैनिक जागरण ने अपनी औकात देख ली कि वह चाहकर भी कुछ नहीं उखाड़ सका हम लोगों का.. बल्कि उल्टे हम लोग उसका काफी कुछ उखाड़ चुके हैं.. और उखाड़ते रहेंगे क्योंकि जो गलत है, जो घटिया है, जो जनविरोधी है, उसका पर्दाफाश हम तथ्यों, घटनाओं  के सामने आने पर करते रहेंगे...
पता नहीं आजकल निशिकांत ठाकुर किधर है.. पता नहीं आजकल आलोक मेहता किधर है... पता नहीं आजकल संजय गुप्ता के क्या हाल हैं.. पता नहीं आजकल शशिशेखर क्या कर रहा है... मुलायम-अखिलेश का हाल चाल तो आप सबको पता ही है... ये दोनों पिता पुत्र बेचारे लोकसभा की लड़ाई में आगे रहने के लिए इन दिनों खून की होली खेल-खिलवा रहे हैं... देखना, इनका दांव न सिर्फ उल्टा पड़ेगा बल्कि इन्हें समझ में भी आ जाएगा कि पिछले 66 सालों से जो तरीका ये लोग राजनीति करने का अपनाए हुए हैं, वह अब नहीं चलने वाला क्योंकि जो नई पीढ़ी  है, वह सब हरामीपने को जानती है...
ये सब के सब मेरी नजर में बेहद कमजोर और दया के पात्र  वाले लोग हैं जिन्हें असल में पता ही नहीं है कि उनका जन्म हुआ क्यों  है... ये खुद को बड़ा बना सकते थे पर नाली का कीड़ा बनकर जीने का शौक है तो भला कौन किसे रोक सकता है... जान लेना भाइयों... ये रुपये, बंगले, कुर्सी, कार अपने साथ बांध कर नहीं ले जाओगे.... और तुम लोग सौ साल से ज्यादा भी नहीं जिओगे... तो फिर काहे का हाय हाय दोस्त... कम से कम तुम पढ़े लिखे मीडिया वालों से ये उम्मीद नहीं कि इतना गर्हित सोच, घटिया जीवनशैली अपनाओगे... सुधर जाओ यारों, अभी वक्त है... विनोद कापड़ी ने खुद को बहुत बदला है... उम्मीद है तुम लोग भी बदल रहे होगे... अगर ऐसा है तो बड़ी अच्छी बात है... जय हो...
भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

Tuesday, August 6, 2013

वीरेन डंगवाल के बहाने वरिष्ठ साहित्यकार केदारनाथ सिंह जी का सानिध्य

सोमवार 5 अगस्त 2013 को वरिष्ठ कवि वीरेन डंगवाल जी के जन्मदिवस के बहाने 'हिंदी भवन' में हिंदी साहित्य पर आधारित कार्यक्रम का आयोजन हुआ। मेरे लिए यह कार्यक्रम अभूतपूर्व रहा। अबतक जिस हिंदी साहित्य में हमेशा जीने का सपना देखा, उसे बेहद करीब से जानने समझने का मौका मिला। इस कार्यक्रम के दौरान बहुत सारे वरिष्ठ कवियों और कवियों(पत्रकार-कवियों) के अनुभवों को जानने समझने के दौरान काफी हद तक उस अतीत को समझा, जिसके बारे में अबतक सिर्फ पढ़ा था।
खैर, इन सबके बीच मुझे 'विशेष' तौर पर प्रसिद्ध साहित्यकार केदारनाथ सिंह जी का सानिध्य मिला। उन्हें उनके आवास से कार्यक्रम स्थल और फिर उन्हें आवास तक छोड़ने की बेहद महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मुझ जैसे युवा को मिली थी, जो मेरा सौभाग्य है। इस दौरान मैं 4-5 घंटे तक केदारनाथ जी के सानिध्य में रहा और उनके 'अतीत' में जीने के साथ इस समय के घटनाक्रम(राजनीतिक-साहित्यिक) पर लम्बी(थोड़ी-बहुत, जो मेरे लिए विशेष रही) चर्चा हुई। इस 4-5 घंटे के दौरान एक बेहद महत्वपूर्ण बात जो मैंने महसूस की, वह यह है कि इस उम्र में भी वह बेहद तरो-ताजा और जोश से भरे हुए थे। दरअसल, इस बात को पूरी तरह से मैं तभी समझ पाया, जब 'हिंदी भवन' की मंजिल पर हो रहे कार्यक्रम में जाने के दौरान 'सीढ़ियों' पर चढ़ते समय मैंने उन्हें सहारा देने की कोशिश की तो उन्होंने कहा, 'अरे यार, मैं इतना भी बूढा नहीं हुआ हूं, कि सीढ़ियां भी न चढ़ सकूं'।
Shravan Shukla with Kedarnath Singh 
कुल मिलाकर कल का दिन मेरे मिले विशेष रहा। इस दौरान मैंने 'हिन्दयुग्म प्रकाशन' के संपादक शैलेश भारतवासी जी से निवेदन किया कि वो मेरी एक फ़ोटो केदारनाथ जी के साथ खींचे, ताकि मैं उसे अपने जीवन की अमूल्य निधि के तौर पर संजोह कर रख सकूं। शैलेश जी ने मेरे निवेदन को स्वीकार करते हुए श्री केदारनाथ सिंह जी के साथ मेरी दो फ़ोटो खींची, जिसे मैं यहां पर शेयर कर रहा हूं।
इस फ़ोटो में एक मैं हूं, जिसे आप सब पहचानते हैं। दूसरे श्री केदारनाथ सिंह जी हैं, जिन्हें हिंदी साहित्य की दुनिया में शायद ही कोई न पहचानता हो। केदारनाथ सिंह जी के बारे में आज की पीढ़ी को बताने के लिए इतना ही काफी है कि उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार (1989), मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार, कुमार आशान पुरस्कार (केरल), दिनकर पुरस्कार, जीवनभारती सम्मान (उड़ीसा) और व्यास सम्मान सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। उन्होंने पूरे जीवन हिंदी साहित्य की सेवा की। आपकी अनेक कृतियां हैं, जिनमें से कुछ एक का उल्लेख करना उनकी अन्य कृतियों का अपमान होगा, फिर भी उनकी कुछ बेहद चर्चित रचनाओं के रूप में अभी बिल्कुल अभी, ज़मीन पक रही है, यहाँ से देखो, अकाल में सारस, उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ, बाघ, तालस्ताय और साइकिल प्रमुख हैं। इनकी कविताओं के अनुवाद लगभग सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेज़ी, स्पेनिश, रूसी, जर्मन और हंगेरियन आदि विदेशी भाषाओं में भी हुए हैं।
इस कार्यक्रम को आयोजित कराने के लिए bhadas4media.com के संस्थापक-संचालक श्री यशवंत सिंह और वरिष्ठ पत्रकार श्री मुकेश कुमार जी को हार्दिक धन्यवाद। जिनकी वजह से हम जैसे युवाओं को श्री केदारनाथ सिंह, श्री वीरेन डंगवाल, श्री नीलाभ अश्क जैसे हिंदी की विभूतियों से मिलने और उन्हें बेहद करीब से जानने का सौभाग्य मिला।

इस मौके पर केदारनाथ जी की लिखी दो कविताएं विशेषरूप से शेयर करना चाहता हूं, जो मुझे बेहद पसंद हैं। तो पेश है उनकी लिखी 'नदी' कविता.. जो उन्होंने 82-83 के समय में में गंगा नदी को देखते हुए लिखी थी।

अगर धीरे चलो
वह तुम्हे छू लेगी
दौड़ो तो छूट जाएगी नदी
अगर ले लो साथ
वह चलती चली जाएगी कहीं भी
यहाँ तक- कि कबाड़ी की दुकान तक भी
छोड़ दो
तो वही अंधेरे में
करोड़ों तारों की आँख बचाकर
वह चुपके से रच लेगी
एक समूची दुनिया
एक छोटे से घोंघे में

सच्चाई यह है
कि तुम कहीं भी रहो
तुम्हें वर्ष के सबसे कठिन दिनों में भी
प्यार करती है एक नदी
नदी जो इस समय नहीं है इस घर में
पर होगी ज़रूर कहीं न कहीं
किसी चटाई
या फूलदान के नीचे
चुपचाप बहती हुई

कभी सुनना
जब सारा शहर सो जाए
तो किवाड़ों पर कान लगा
धीरे-धीरे सुनना
कहीं आसपास
एक मादा घड़ियाल की कराह की तरह
सुनाई देगी नदी!

केदार नाथ जी की दूसरी कविता देश के विभाजन बाद की त्रासदी के बाद 'सन् ४७ को याद करते हुए' है, जिसे मैं बेहद पसंद करता हूं। केदारनाथ जी ने यह कविता 1982 में लिखी थी।

तुम्हें नूर मियां की याद है केदारनाथ सिंह?
गेहुँए नूर मियां
ठिगने नूर मियां
रामगढ़ बाजार से सुरमा बेच कर
सबसे आखिर मे लौटने वाले नूर मियां
क्या तुम्हें कुछ भी याद है केदारनाथ सिंह?

तुम्हें याद है मदरसा
इमली का पेड़
इमामबाड़ा
तुम्हे याद है शुरु से अखिर तक
उन्नीस का पहाड़ा
क्या तुम अपनी भूली हुई स्लेट पर
जोड़ घटा कर
यह निकाल सकते हो
कि एक दिन अचानक तुम्हारी बस्ती को छोड़कर
क्यों चले गए थे नूर मियां?
क्या तुम्हें पता है
इस समय वे कहां हैं
ढाका
या मुल्तान में?
क्या तुम बता सकते हो?
हर साल कितने पत्ते गिरते हैं पाकिस्तान में?
तुम चुप क्यों हो केदारनाथ सिंह?
क्या तुम्हारा गणित कमजोर है?

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