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Saturday, November 16, 2013

सचिन को भारत रत्न, सरकार से पूछने की हिम्मत है आप में???

सचिन अपना सम्मान क्यों स्थगित करें, सरकार से पूछने की हिम्मत है आप में???
नदीम अख्तर
प्रोफेसर-आईआईएमसी
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जो लोग ये कह रहे हैं कि अगर सचिन दादा ध्यानचंद के बाद भारत रत्न सम्मान लेने का फैसला करते हैं तो उनका कद और बढ़ जाएगा, वे किसे बेवकूफ बना रहे हैं. आप सरकार से नहीं पूछेंगे कि उसने दादा ध्यानचंद से पहले सचिन को ये पुरस्कार क्यों दे दिया, सचिन से ये उम्मीद रखेंगे कि वह बड़प्पन दिखाते हुए पुरस्कार लेने से इनकार कर दें. वाह!! क्या कहने. बलिहारी जाऊं आपकी इस अदा पर.

अरे भाई, पहले ये बताइए कि क्या आपने या आपके चैनल के किसी पत्रकार ने उस कांग्रेसी मंत्री से ये सवाल किया जो सुबह से सारे टीवी चैनलों पर उछल-उछल कर सचिन को भारत रत्न दिए जाने की घोषणा की पैरोकारी कर रहा है??!!! उस मंत्री से क्यों नहीं पूछा कि दादा ध्यानचंद से पहले सचिन को भारत रत्न क्यों??? अगर दादा ध्यानचंद के इतने ही बड़े प्रशंसक-हिमायती हैं तो सरकार को क्यों नहीं कटघरे में खड़ा किया आप लोगों ने कि उनसे पहले सचिन को भारत रत्न क्यों और कैसे???!! आधे घंटे का एक शो इस विषय पर क्यों नहीं चलाया टीवी पर??!!

लेकिन नहीं, ये सब आप नहीं करेंगे. हां, सचिन से ये अपेक्षा करेंगे कि वह सम्मान लेना फिलहाल के लिए स्थगित कर दे. क्यों भाई. क्या सचिन ने जाकर हाथ-पैर जोड़कर भारत सरकार से ये सम्मान मांगा था?? जब सरकार ने अपनी मर्जी से दिया है तो वही स्पष्ट करे कि दादा ध्यानचंद से पहले सचिन को ये पुरस्कार किस आधार पर दिया गया. या सरकार ये कहे कि मौजूदा हालात में सचिन तेंडुलकर का कद दादा ध्यानचंद से बड़ा हो गया है. और अगर सरकार ऐसा कहती है तो फिर उसे ध्यानचंद के नाम से खेल के क्षेत्र में दिया जाने वाला Lifetime achievement award भी बंद कर देना चाहिए.

बात सिम्पल है. आप grey area में नहीं रह सकते. या तो आप दादा ध्यानचंद से पहले सचिन को सम्मान दिए जाने को सही मानते हैं या फिर गलत. ये हां-ना टाइप की चीज मत बोला करिए. गोलमोल बात मत करिए. 'सचिन अभी ये एवार्ड ना लें तो अच्छा हो' जैसी बातें कहने का कोई मतलब नहीं.

मेरा स्पष्ट मानना है कि हॉकी के जादूगर दादा ध्यानचंद से पहले सचिन को यह सम्मान देकर भारत सरकार ने एक गलत परम्परा की शुरुआत की है. (सचिन के प्रशंसकों से विनम्र माफी के साथ). आप राजशाही में नहीं हैं कि बादशाह सलामत की दिल जिस पर आ जाए, उसे जागीर-रियासत सौंप देंगे. आप लोकतंत्र में हैं और ये तंत्र जनता चलाती है. देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान को दिए जाने की एक प्रक्रिया और प्रतिष्ठा होती है. एक मर्यादा होती है, मानक होता है. उसे आप पैरों तले रौद कर धूलधूसरित नहीं कर सकते. आपको जवाब तो देना ही पड़ेगा सरकार जी. ये ठीक है कि अभी सचिनमेनिया में ये सवाल शायद दब जाए या दबा दिया जाए लेकिन इतिहास तो ये प्रश्न उठाएगा ही. उसने किसी को नहीं बख्शा है. और पत्रकार बंधुओं से अनुरोध है कि वे सचिन पर इतना बड़ा बोझ ना डालें कि खुद ही भारत रत्न सम्मान को स्थगित करने की घोषणा कर दें. ये उनके साथ नाइंसाफी होगी.

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वैसे उम्मीद तो नहीं है लेकिन फिर भी सोचता हूं कि क्या आज न्यूज चैनलों-अखबारों की न्यूज मीटिंग में किसी पत्रकार-प्रोड्यूसर-रिपोर्टर ने संपादक के सामने ये बात रखी होगी कि आखिर सचिन को दादा ध्यानचंद से पहले भारत रत्न कैसे?? इस पर सवाल उठाते हुए क्या एक स्टोरी करनी चाहिए??

अगर किसी बंधु ने ऐसा किया होगा तो मेरे दिल में आपके लिए आपार सम्मान है. बधाई. टीवी न्यूज चैनलों का तो आज हाल देख लिया. अब कल के अखबार देखने हैं. बड़े और सम्मानित सारे. देखना है कि सम्पादक का कोना अभी वहां कितना बाकी है. शुभ रात्रि.


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