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Monday, August 26, 2013

मेरे हमदम, मेरे दोस्त...एक कहानी: मिस यू साले.. नेतवा! कोत्ता मनई!!

अपने दोस्त की बहुत भयंकर तरीके से याद आ रही है। डिम्पू हां! डिम्पू ही है उसका नाम। या इज्जत से कहें तो मेरे सबसे अच्छे दोस्त का नाम. सभी लोग नेताजी कहते हैं, लेकिन असली नाम शैलेन्द्र है। एक ऐसा इंसान, जिसे हर कोई अपना दोस्त-अपना हमदम बनाना चाहेगा। मस्त-मौला, झक्की, सनकी कुछ भी कह लो। लेकिन दिल का एकदम प्योर इंसान। लड़कियां ऐसे लोगों को बकलोल कहा करती हैं, जिन्हें दुनिया के तिकडमों और लौंडियाबाज़ी से कोई मतलब नहीं होता। बस! खुद में उलझा हुआ, लेकिन औरों के लिए बेहद औम्य और सुलझा हुआ आदमी।

सच कहूं तो मुझे खुद भी समझ नहीं आ रहा कि यह जों ऊपर के कलमझंडू टाइप के उपनाम मैंने चेम्प दिए हैं, वह उन्हें पसंद भी करेगा या नहीं। नहीं भी पसंद करेगा तो चूतियापे सरीखा कोई बहाना बना दूंगा, साला फट से मान जाएगा कि हां यही सही है। दरअसल उसकी क्वालिटी ही यही है कि वह कुछ भी बुरा नहीं मानता। लेकिन खबरदार, अगर मेरे अलावा किसी ने उसे चूतिया समझने या बोलने की भूल की। वह जैसा भी है, मेरा दोस्त है..और दोस्त के लिए तो सुना ही होगा? कोई बुराई नहीं करेगा सालों, वरना पिछवाड़े पे दो लात खाओगे। खैर, यह तो शुरूआती बात रही या यूं कहें कि परिचय रहा, हमारे नेताजी उर्फ़ डिम्पू का। जो आपको अपने करीब लगे।

यूं तो बचपन से हम साथ साथ पढ़े हैं.. यह सही तो है लेकिन भद्र भाषा में कहें अगर अभद्रता के साथ तो यह ... कि हम दोनों ने तख्ती पर दुद्धी(लोकल चाक) और बोरे को टाट बनाकर बैठना एक ही दिन शुरू किया। हम दोनों का जब पहली क्लास में एडमिसन कराया गया तो हर दोनों गदहिया की क्लास में चुतियापा पेल रहे थे। चुतियापा भी ऐसा की लोग कहें कि साला बचपन से ही चूतिया है। 1995-96 में जुलाई का समय रहा होगा या ऐसा ही कोई समय..ठीक ठाक याद नहीं. हम दोनों गदहिया क्लास वाले लुका-छिपी खेल के अपनी कक्षा जोकि पेड़ के नीचे ही लगती थी में आकर बैठे थे। उस समय दोनों के पैर लहू-लुहान थे.. वजह यह थी कि छुपने के चक्कर में हम दोनों झरबैला(जंगली बेर) के पेड़ के नीचे घुस गए और वहां पैरों में खूब सारे कांटे अपनी जगह बना चुके थे। हम दोनों क्लास में बैठकर एक दूसरे का पैर पकडे..भगवान जाने कि कौन गिरा पड़ा था और कौन लेटा था.लेकिन दोनों एक दूसरे के पैर से वही काँटा निकालने की कोशिश कर रहे थे, एक और बड़े कांटे की सहायता से। हां! अच्छी तरह याद है कि मेरे पिताजी और उसके बड़े भाई साहब दोनों उसी समय कक्षा में आकार हमारा कान उमेठे थे। और हम दोनों दर्द की वजह से बिलबिला पड़े थे।

दर्द भी इतना भयानक था कि मैंने आव-देखा न ताव! अपने बाप के ही अंदाज़ में गालिया देनी शुरू कर दी। कौन अहै बे हरामी साले.. हमार कंवा कौन नोचत अहय! इतने में पिताजी और भाई साहब हम दोनों को पकडके ले गए और पहली कक्षा में भर्ती करा दिए। गजबे का रौब था भाई। हम गदहिया वालों से पहली कक्षा वाले बन गए थे।

इसके बाद हम पांच साल उसी स्कूल में पढ़े। छठवी कक्षा से हमारे रास्ते अलग हो गए। छठवी से आठवीं तक हमारी सिर्फ इतनी मुलाक़ात थी कि वह हमारा पडोसी था और हम उसके। बीच में कभी बात भी हो जाया करती थी। जब हम नौवीं में गए तो फिर से एक स्कूल।
इस बीच, मेरी लाइफ में फिर से एक मोड आ गया था। अहम मोड! पिताजी से झगडे और उनके व्यवहार से दुखी होकर मैंने हर-बार छोड़ दिया। इस निर्णय में मेरी माँ ने काफी सहायता की। खैर यह दुखीआत्माओं वाली बातें फिर कभी. अभी डिम्पू पर ही रहते हैं। दसवी के एक्साम्स में हम दोनों एक ही कमरे में पड़े और पास भी हो गए। उसके बाद मौसम आया हमारी शहंशाही का।

11वीं में हम दोनों फिर से एक ही क्लास में हो लिए। व्यावसायिक विषय की पढाई यूं भी कोई हौवा नहीं थी। हमारे लिए पढाई की जगह कालेज का मैदान होता, और प्रैक्टिकल की जगह लड़ाई। मैं कभी अपने लिए नहीं लड़ा। और न ही डिम्पू मेरे लिए। क्योंकि हमारी लड़ाइया किसी से हुई ही नहीं. पता है क्यों? दरअसल डिम्पू यानि नेताजी ने नाम का इतना ही भौकाल काफी है कि साले, अभी चलकर बताते हैं. यूं तो हम दोनों में हरामियत बहुत भरी पड़ी थी..फिर भी कुछ और भी वजहों से हम दोनों को लोग काफी पसंद करते। मेरी अपनी तो पता नहीं, लेकिन नेताजी को सभी पसंद करते।

एकबार की बात है। हमारी हमारे मास्टरों से किसी बात पर अनबन हो गई। नेताजी  तो भईया नेताजी ही ठहरे। झुकना तो सीखा नहीं था और न ही मैंने उन्हें कभी झुकने के लिए प्रेरित ही किया। कहते हैं कि अगर दोस्त काहे कि हथियार डाल डो बेटा, बाद में देख लेंगे, तो वह वाला हिसाब हम दोनों ने ही नहीं सीखा था। बस, फिर क्या था? मास्टरों की आंखो की किरकिरी हम दोनों ही हो लिए। लेकिन उनकी मजाल क्या जों वो हमें आकार कुछ बोल दें? ऐसे ही एकदिन हम दोनों मैदान में ही अपनी महफ़िल जमाए बैठे थे. गीत-संगीत का कार्यक्रम चल रहा था। तिवारी नाम का एक ब्राह्मण टाइप लड़का था. टाइप इसलिए कि साला बड़ा हरामी और मादर..... टाइप का बंदा था। फिर भी नेताजी ने उसपर तरस खाकर कईयों से पिटने से बचाया था तो वह हमारी ही टोली में आकार रहने लगा था. तो इस गाने-बजाने के प्रोग्राम में काफी भीड़ जुट गई. हमारे विपक्षी गुटों के साथ मास्टरों में भी मिर्ची लग गई कि साला अभी उस तिवरिया को बुलाए तो हमारे लिए नहीं गया और उन लौंडो को लिए गा रहा है। फिर क्या हुआ? मास्टरों ने गुट में शामिल हुए कुछ और पंडित टाइप चूतियां लडको को बुलाया और हडकाया.. कि सालों! वह दोनों तो वैसे भी हरामी किस्म के इंसान हैं, जों हमारी भी नहीं सुनते, तो उनके पास बैठते काहे हो बे? इस बात की तस्दीक जब हमें हुई तो हमने मास्टरों की ले ली.

खैर वक्त गुजरता रहा और मास्टरों की हमसे फटती गई. एकबारगी तो यह हुआ कि यह दोनों हमेशा देरी से पहुँचते हैं तो देरी से आने वालों को गेट के अंदर दाखिल ही होने दिया जाए। और जों लेट आये वह वापस चले जाए। हमें तो पता ही था कि वास्तव में क्या हो रहा है. एक बात और! जों अबतक बताया नहीं कि हम दोनों कभी समय से कालेज पहुंचे ही नहीं। हम दोनों का नहाने का समय एक ही होता था.. जब घडी में 10 बजते थे तो हम दोनों लोटा-बाल्टी लेकर अपने अपने नल पर नहाने आते और पूरे दिन का प्रोग्राम वही दूर से चिल्ला-चिल्ला कर सेट कर लेते.. तो ऐसे में हम अक्सर 11.30 बजे ही कालेज पहुंचते।

अब चूंकि कालेज में हमारे बैंड बजाने का पोग्राम फिक्स हो गया था तो होना भी अलग था। हर रोज की तरह उस रोज भी हम देरी से पहुंचे। गेट बंद मिला। हम दोनों गेट कूदकर दाखिल हो गए। कालेज प्रिंसिपल के सामने हमारी पेशी लगाईं गई। हमने सफाई में कह दिया कि अमां यार... लेट हो गए तो कूद आए। आगे से ऐसा नहीं होगा। हमारे सख्त लेकिन पुचकारने वाले लहजे को देखकर उनकी भी फट गई। चलो आगे से ऐसा न हो... यह कहते हुए कालेज प्रिंसिपल ने हमें मुक्त कर दिया। उस दिन कई मास्टरों के चेहरे पर संतोष के भाव साफ़ दिख रहे थे।

अब बारी हमारी थी। दूसरे दिन फिर से नहाने के समय पर मीटिंग हुई, लेकिन इस बार हम एक घंटे पहले पहुंच गए। मास्टर लोग भी सुनियोजित षणयंत्र का मजा लेने गेट पर ही इकट्ठे खड़े थे। उस दिन नेताजी के रौब का अंदाज़ एकदम अलग था। गेट कूब सकते नहीं थे, और पीछे हटने की कभी सोचे नहीं थे। रास्ते में गरियाते हुए और आये कि कोई मास्टर अगर रोका तो आज भारी महफ़िल में उसे पेल देंगे। तो गेट पर नेताजी ने एक चपरासी को हडकाते हुए कहा.. अबे साले चमरा(वो जाति का हरिजन था)..! अब गेटवा का तोहार बाप खोले? चल गेट खोल। इतना कहना था कि सारे मास्टर लोग तमतमा कर खड़े हो गए। फिर भी उस चपरासी ने हिम्मत से काम लिया और मास्टरों को समझकर बिठाते हुए, गेट के पास आकार हमसे मिन्नतें करने लगा, चपरासी हीरा ने हमें समझाते हुए कहा, पंडित जी! आज मास्टर लोग पूरा प्लान बनाए हैं, अभी चले जाओ, थोड़ी देर में आना.. 10 ही मिनट की बात है, पहला घंटा(पीरियड) खत्म होते ही गेट खोल दिया जाएगा।

पहली बार मैंने नेताजी को थोड़ा पीछे हटने का इशारा किया और सबको सुनाते हुए कहा। ठीक है, अब जबतक घंटा खत्म नहीं होगा..कोई अंदर बाहर न जा सकेगा बेटा। नेताजी ने भी सहमति में सर हिलाया। इस बीच हम दोनों मौज मस्ती मारते रहे। पहले घंटे के बीतने के बाद घंटे की आवाज सुनाई दी। चपरासी हीरा ने दौड कर गेट खोला। उस दौरान पीछे रह गए 15-20 लड़के लड़कियों ने कालेज परिसर में इंट्री मारी. हम फिर भी ढीठों की तरह बाहर ही खड़े रहे।

अब गेट बंद हो चुका था। बारी हमारे पलटवार की थी। उसपार की नाव इस पार आ चुकी थी तो लेट-लपेट पहुंचे 10-15 बच्चों की भीड़ भी गेट पर जमा हो गई थी। हमें कुछ मौक नहीं मिल पा रहा था कुछ बोलने का। लेकिन तभी किस्मत ने पलती मारी और हम सिकंदर हो गए। हुआ यूं... कि दूसरा घंटा शुरू होने के 15 मिनट बाद एक मास्टर जी लेट-लपेट पहुंचे। नेताजी अपनी जगह एकदम टाईट हो चुके थे। मास्टर लोग भी गेट पर सावधानी मुद्रा में आ चुके थे। इसबीच जैसे ही चपरासी हीरा गेट खोलने के लिए आगे बढ़ा। नेताजी की शेरों वाली आवाज गूंजी, ‘हे हिरवा! तोहार हिम्मत कैसा भय साले कि हम गेट पे रही और तू गेट खोल देबा? नियम कानून अगर तोहर सबके बनवा अहे तो तोहरे पिछवाड़े में घुसेड देब अगर गेट खुला तो। वह भी दूसरा घंटा पूरा होने से पहले।

नेताजी ने बात पते की कही थी। दोनों पक्षों में मुर्दानी छा गई। एक तो मास्टर का अपमान, दूसरा हम दोनों की प्रतिष्ठा का भी सवाल। इस दौरान नेताजी और जोश में आ गए। नेताजी ने जोश में प्रिंसिपल मुराबाद का शंखनाद कर दिया और पीछे खड़ी बच्चों की भीड़ जोकि अब बढ़कर 25-30 हो गई थी.. सभी ने नेताजी की ख्वाइश को सर-आंखो पर बिठाते हुए बढचढकर नारेबाजी की। पूरा कालेज परिसर ‘प्रिंसिपल मुर्दाबाद’ और ‘नए कानून तोड़ डो.. खुद से गेल खोल लो’ जैसे नारों से गुन्जायमान हो गया। तभी दूसरा घंटा खत्म हुआ और गेट खोल दिया गया। पूए कालेज के लड़के लड़कियों का हुजूम कालेज की गेट पर उमड़ पड़ा। आखिर ऐसा क्या हो गया और किसने ऐसे जुर्रत कर दी जों अबतक किसी भी कालेज या विश्वविद्यालय में नहीं हुआ था। खैर सबको पता चला..कि आखिर बात क्या था?

हमारा प्रिंसिपल ऑफिस से बुलावा आया। मैं नेताजी को संयमित रहने की सलाह दी, वह राजी भी हो गया। लेकिन इसीबीच बात फिर से बिगड गई। हुआ यूं की प्रिंसिपल ने हमें कालेज से निकालने की धमकी दे दी. नेताजी को भी जोश आ गया। वह पूरी ताकत से चीखता हुआ बाहर आया और बोला.. ‘अगर नाम काटना है तो काट दो, धमकी पट दो.. १२वीं के पेपर में खुद बुलाकर इम्तिहान दिल्वाओगे. फ़ार्म भरा जा चुका है और जों बिगाडना है बिगाड़ लो।‘ नेताजी को उस दिन मैं बड़ी मुश्किल से काबू में ला पाया था। हम दोनों वहां से उठाकर बाहर चले गए। इसके बाद से नेताजी के किस्से हर जगह फ़ैल गए। बुरा व्यवहार करने के बाद भी लोगो को नेता में उम्मीद दिखाई देती थी. क्योंकि वह गलत बर्दास्त नहीं करता था।

खैर! कहां उलझा दिया आपलोगों को। दरअसल उलझाना भी जरूरी था. अगर इतना सब न बताता तो इस कहानी की शुरुआत में दिए गए उपनामों को ही नेता के साथ जोड़ने। वह सबके लिए नेताजी है लेकिन मेरे लिए डिम्पू! जिसे में खुद भी नेताजी ही बुलाना पसंद करता हूं।

वह 12वीं में फेल हो गया था। फिर भी हम दोनों एकसाथ ही रहते थे.. कही भी आना हो या जाना हो.. कही कोई बात हो। हर जगह डिम्पू मेरा साथ देता। हम दोनों ग्रेजुएशन के दौरान भी साथ साथ रहे। लाख मुश्किलों के बावजूद भी। इस दौरान हम दोनों में खूब छनती थी। हम दोनों के दोनों एडवेंचर पसंद लोग रहे। बिना पैसे के भी सुल्तानपुर से मिर्जापुर निकाल जाते जाते। वहां ‘मां विध्ववासिनी’ के दर्शन करने.. और भी अच्छे काम करते रहते। पिछली कई बार से यह महत्वपूर्ण काम पेंडिंग पड़ा है।

जब आप यह कहानी पढ़ रहे होंगे तो हम दोनों साथ में शायद फिर कभी के लिए निकाल गए होंगे. अब समय नहीं मिल पाता.. फिर भी अगर में दुनिया में किसी से बात करना पसंद है तो वह नेताजी है. मेरे लिए दोस्त कम भाई ज्यादा। कहीं भी रहूंगा, नेताजी मेरे दिल में रहेंगे।

अब नेताजी के बारे में पूरी जानकारी.. नाम..शैलेन्द्र, शिक्षा.. बी.कॉम, शगल.. खेती, आम इंसानों से उलट हरामखोरी कहीं दूर तक नहीं बसी। और क्या जानकारी दूं? इस बार उसकी फोटो आप सबसे शेयर करूंगा. फिलहाल तो मुझे सिर्फ बचपन में गाए जाने वाले शोले फिल्म का वही गाना याद आ रहा है..’यह दोस्ती हम नहीं छोडेंगे, और मरेंगे भी नहीं..साले अकेले जीने में मजा नहीं आएगा। बहुत कुछ है लिखने को! लेकिन आज की कलम से बस इतना ही।

रात के दो बज रहे हैं और मुझे अपने दोस्त की याद आ रही है. उसके पास जाने का बेहतर तरीका यही लगा कि मैं उसके बारे में कुछ लिखूं। वह लिक्खाड़-पढ़ार कभी नहीं रहा.. इसके बावजूद 5वीं कक्षा में मुझसे ज्यादा नंबर ले आया और हां.. 12वीं में भी.. दूसरा ही चांस सही। लेकिन दोस्ती में हमेशा वह खरा उतरा. कभी भी आजकल मेरे लिए किसी काम को करने में उसने दूसरा चांस नहीं मांगा। पता है क्यों? क्योंकि वह दोस्तों का दोस्त है. मेरा दोस्त है वह। एक बार और मेरी समझ में आती है.. वह 5वीं और 12वीं में मुझसे आगे क्यों निकला! इसलिए कि वह हमेशा दोस्ती निभाने में नंबर वन रहा... दूसरे कभी कभी चांस ही नहीं बना। और मैंने भी निभानी की कोशिश की है.. अपनी तरफ से! दूसरा चांस लेकर ही सही। मिस यू साले.. नेतवा! कोत्ता मनई! अवधी में कुत्ते को प्यार से कोत्ता बोलते हैं..!!

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