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Thursday, January 2, 2014

राहत कैम्पों में रह रहे हिंसा पीड़ितों पर फर्जी मामले

शामली में हिंसा की घटना के बाद से राहत शिविर में रह रहे लोगों पर अवैध रूप से वन विभाग की जमीन कब्ज़ाने के आरोपों में प्रशासन की तरफ से मामले दर्ज कराए गए है.. आखिर चाहती क्या है यूपी सरकार ?.... पहले हिंसा में अपनों को खोया.. फिर घर खोया...और अब सरकार उनपर झूठें मामले लाद उन्हे राहत शिविरों से भी भगाने की तैयारी में है...

शामली के थाना झिझाना के मंसूरा में बनाए गए अस्थाई राहत शिविरों से लोगों को भगाने के लिए सूबे की सरकार कमर कस चुकी है...उसने तय कर लिया है कि बेघर लोग..जो हिंसा की घटनाओं में अपना सबकुछ खो चुके हैं... उनसे कड़ाके की सर्दी में सर छिपाने की जगह भी छीन ली जाए... ताकि प्रशासन के आंकड़ों में न तो कोई राहत शिविर में रहने का रिकॉर्ड हो...और न ही कोई पीड़ित...सूबे की सरकार ऐसा ही कुछ करने का प्लान बनाकर लोगों को प्रताड़ित कर रही है...वो उन्हें कभी धमकाती है तो कभी पुचकारती है... और फिर भी जब बात नहीं बनी तो सरकार उनपर फर्जी मुकदमे दायर कर प्रताड़ित कर रही है...
पहले घर से भागना पड़ा
अब राहत कैम्पों से भगाए जाने की तैयारी
हिंसा पीड़ितों पर ही लटकी गिरफ्तारी की तलवार
राहत शिविरों में रह रहे लोगों पर मामले दर्ज   

सूबे की सपा सरकार हिंसा पीड़ितों के बारे में दुनिया को सबकुछ सही दिखाना चाहती है.. लेकिन सबकुछ सही करने में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं...तभी तो... पीड़ितों को राहत पहुंचाने की जगह सूबे की सरकार पीड़ितों का नाम ही मिटा देना चाहती है... वो चाहती है कि लोग अपने घरों में जाएं..और रहें... जो अब उजड़ चुके हैं... उन घरों में रहे ये पीड़ित... जो इन्होंने अपना सबकुछ लगाकर बनाया था... लेकिन अब उनके घर भूतों के डेरे में तब्दील हो चुके हैं... इस समय सैकड़ो परिवार राहत शिविरों में रह रहे हैं...लेकिन प्रशासन लगातार इन शरणार्थियों पर अपने गांव जाने का दबाव बना रही है...

उधर...  पुलिस का कहना है कि झिझाना थाना क्षेत्र के मसुरा गाव में कुछ शरणाथियों पर राजस्व विभाग की जमीन पर कब्ज़ा करने के मामले में तहसीलदार की शिकायत पर मामला दर्ज किया गया है... लेकिन पुलिस अधिकारी के बयान को सुनिए...पुलिस ने तो उन्हें पीड़ित मानने से ही इंकार कर दिया.... सुनिए क्या कहते हैं एसपी साहेब.... एसपी साहेब का बयान है कि ये लोग पीड़ित नहीं हैं..क्योंकि इलाके में हिंसा हुई ही नहीं...ये यूपी की नौकरशाही की एक और जीती जागती मिशाल है कि वो किस कदर संवेदनहीन हो चुकी है...
फिलहाल तो हिंसा पीड़ितों को कुछ दिनों की मोहलत मिली हुई है... लेकिन बड़ा सवाल ये है कि आखिर हिंसा पीड़ित इलाकों में हालात सामान्य कब होंगें? कब आम लोग अपनी आम जिंदगी फिर से शुरु कर पाएंगे ..जो हिंसा पीड़ितों का टैग लेकर दर-दर भटकने को मजबूर हैं....

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