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Wednesday, April 22, 2015

जंतर-मंतर LIVE: महज गजेंद्र नहीं, ये तो समूचे परिवार की हत्या है!

नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी की रैली के दौरान एक गजेंद्र सिंह ने हजारो लोगों के सामने आत्महत्या कर ली। गजेंद्र ने दिल्ली के सीएम, डिप्टी सीएम, कैबिनेट मंत्रियों समेत हजारो लोगों के सामने अपनी जान दे दी, और मीडिया समेत(उसमें मैं खुद) सभी लोग तमाशा देखते रहे। गजेंद्र के लटकने के समय और बाद भी भाषणबाजी चलती रही, भीड़ के चलते कोई हिल भी नहीं पा रहा था, लेकिन गजेंद्र संभवत: उसी समय अपनी आखिरी यात्रा पर निकल चुके थे।

जब परिवार के मुखिया की मौत होती है, तो सिर्फ वही नहीं मरता। गजेंद्र के साथ मर गया उसका परिवार। गजेंद्र के साथ ही मर गया उसका बूढ़ा बाप। गजेंद्र के साथ ही मर गई उसकी पत्नी। गजेंद्र के साथ ही मर गए उसके 3 बच्चे। गजेंद्र के साथ ही मर गई, उन सभी की इंसानियत, तो उसकी मौत पर तमाशा देखते रहे। गजेंद्र के साथ ही मर गई, वो उम्मीद। जिस उम्मीद में वो और उसका परिवार जी रहा था। गजेंद्र के साथ ही मर गए उसके परिवार के वो सपने, जो उन्होंने फसल सही होने या खराब होने पर भी पाल रखे थे। गजेंद्र के साथ ही मर गया वो संघर्ष, जो गजेंद्र जीते जी अपने परिवार को पालने के लिए करता। क्योंकि अब कुछ बचा नहीं।

आम आदमी पार्टी की रैली में जो कुछ भी हुआ, वो दुख:द है। आप वाले इतनी मोटी चमड़ी के निकलेंगे, उम्मीद नहीं थी। गजेंद्र सबके सामने पेड़ पर बैठा रहा। लेकिन जब विश्वास ने कहा कि उसे पुलिस वाले उतारे। जल्दी उतारे, पेड़ पर कैसे चढ़ गया किसान, जैसे शब्दों के वाणों से दिल्ली पुलिस को वेधना शुरू किया, तो किसान ने घबराहट में आकर अपने ही गमछे को गले और पेड़ से बांधकर कूद गया। जिसकी वजह से लटकते ही उसकी गर्दन टूट गई, और जीभ निकल आई। जबतक 4-5 लोगों ने उसे उतारा, तभी शायद वो दम तोड़ चुका था।

किसान गजेंद्र को पेड़ से उतारने वाला व्यक्ति वहीं, पेड़ पर ही घबराकर होशो-हवास खो बैठा। हालांकि उसके साथियों ने उसे पकड़ा और बचाया। लेकिन इस दौरान आम आदमी पार्टी की रैली होती रही। विश्वास बोलते रहे, मनीष बोलते रहे, केजरीवाल बोलते रहे। दिल्ली पुलिस को ललकारते रहे, शिक्षकों को ललकारते रहे, केंद्र सरकार को ललकारते रहे। रैली के बाद उसकी मौत पर रोकर क्या होगा सरकार?

अब तमाम नेता घड़ियाली आंसू रोयेंगे। छाती पीटेंगे। हाय हाय करेंगे। राहुल गांधी गजेंद्र की मौत के बाद आरएमएल अस्पताल पहुंचे, तो कांग्रेसी नारे लगा रहे थे, राहुल तुम संघर्ष करो। हम तुम्हारे साथ हैं। ऐसे ही अन्य दलों के कार्यकर्ता अब नारे लगाएंगे। लेकिन जो अबतक संघर्ष कर रहा था, उसका संघर्ष तो दम तोड़ चुका है। वो तो दुनिया से ही कूच कर चुका है। क्या कागज के चंद टुकड़े उसकी जिंदगी वापस ला पाएगी? कमी जितनी राजस्थान के स्थानीय प्रशासन की है, उतनी ही शायद केंद्र सरकार की भी हो। लेकिन जो संवेदनहीनता जंतर मंतर पर हम सबने बरती, वो कभी फिर न बरती जाए। बस यही उम्मीद करता हूं। जिस तरह उसे पेड़ पर चढ़े घंटे भर बीत चुके थे, और उसकी धमकी को लोगों ने हल्के में ले लिया था, वैसे ही किसी परेशान की आवाज को हल्के में न लिया जाए। वर्ना लोग मरते रहेंगे। उनके साथ ही मरता रहेगा, उनका सपना। उनके परिवार का सपना। उनके यतीमों का सपना। और दागदार होती रहेगी जिंदगी।

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