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Saturday, December 21, 2013

दिल्ली के लोगों ने सरकार बनाने का आदेश दिया-केजरीवाल

श्रवण शुक्ल

पेट्रोल पंप पर केजरीवाल ने कहा कि दिल्ली के लोगों ने सरकार बनाने का आदेश दिया है... आखिरी फैसला सोमवार को ही लेंगे.. 




Monday, December 16, 2013

अन्य पार्टियों से अलग क्यों खड़ी हो जाती है SP ?



समाजवादी पार्टी आखिर उन मुद्दों पर अन्य पार्टियों से अलग क्यों खड़ी हो जाती है जिस पर पूरे देश की लगभग सारी पार्टियाँ सहमत रहती हैं?फिलहाल तीन ऐसे मुद्दे हैं जिन पर सपा बाकी पार्टियों से अलग खड़ी है।पहला मुद्दा है लोकपाल का-पूरे देश में किंतु-परंतु के साथ लोकपाल की अवधारणा पर सहमति है लेकिन सपा इस अवधारणा को ही खारिज करती है।दूसरा मुद्दा है प्रोन्नति में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण का-इस मुद्दे पर भी लगभग सभी पार्टियाँ सहमत हैं लेकिन सपा इसका उग्र विरोध करती है।तीसरा मुद्दा है राज्यों के विभाजन का-छोटे राज्यों की अवधारणा पर भी लगभग सभी पार्टियों की सहमति है,भले ही हर मामले में अपना नफा-नुकसान देखकर ये पार्टियाँ अपना रुख तय करती हैं परंतु सपा सीधे छोटे राज्यों की अवधारणा को ही नकार देती है।

अब प्रश्न उठता है कि ऐसा क्यों है?देश की सबसे बड़ी और पुरानी पार्टी होने के नाते कांग्रेस पर भ्रष्टाचार के सर्वाधिक आरोप हैं लेकिन उसने भी मजबूरी में ही सही लोकपाल के गठन की बात मान लिया है,अन्य पार्टियाँ(भ्रष्ट तो लगभग सभी हैं) भी लोकपाल के गठन को तैयार हैं परंतु सपा बिना किसी ठोस तर्क के इसके विरोध में है।आखिर ऐसा क्यों है?क्या सपा को ऐसा लगता है कि लोकपाल/लोकायुक्त कि नियुक्ति से उसके चरने-खाने में बाधा आएगी?

प्रोन्नति में दलितों के लिए आरक्षण का विरोध कर सपा क्या दर्शाना चाहती है?उत्तर प्रदेश में पिछड़ों और दलितों के बीच प्रतिद्वद्विंता जग जाहिर है।ये दोनो वर्ग जितने स्वाभाविक साथी हो सकते हैं व्यवहार में आपस में उतने ही परस्पर विरोधी हैं।ऐसे में स्वाभाविक है कि सपा दलितों के सशक्तीकरण में यथासंभव अड़चन डाले।वैसे सपा के इस रुख से सवर्ण स्वाभाविक रूप से खुश हैं।

जहाँ तक छोटे राज्यों के विरोध की बात है तो ये आसानी से समझा जा सकता है कि सपा का विरोध छोटे राज्य के निर्माण से नहीं है बल्कि उसका डर उत्तर प्रदेश के संभावित विभाजन(फिलहाल नहीं) को लेकर है,क्योंकि मुलायम सिंह के विशाल कुनबे को चरने-खाने के लिए उत्तर प्रदेश का चौथाई हिस्सा बहुत कम होगा।अपने विशाल कुनबे के भरण-पोषण के लिए यूपी जैसा विशाल प्रदेश मुलायम सिंह के लिए जरूरी है।

यहाँ ये भी कहने की इच्छा होती है कि देश की लगभग सभी पार्टियाँ अंदर से सपा के इस रुख की समर्थक हैं परंतु विवशताएं उन्हें इन मुद्दों का समर्थक बनाती हैं।चूँकि मुलायम सिंह की राजनीतिक विवशताएं सीमित हैं लिहाजा वे इन मुद्दों का खुलकर विरोध कर सकते हैं।

अब प्रश्न उठता है कि ऐसा क्यों है?देश की सबसे बड़ी और पुरानी पार्टी होने के नाते कांग्रेस पर भ्रष्टाचार के सर्वाधिक आरोप हैं लेकिन उसने भी मजबूरी में ही सही लोकपाल के गठन की बात मान लिया है,अन्य पार्टियाँ(भ्रष्ट तो लगभग सभी हैं) भी लोकपाल के गठन को तैयार हैं परंतु सपा बिना किसी ठोस तर्क के इसके विरोध में है।आखिर ऐसा क्यों है?क्या सपा को ऐसा लगता है कि लोकपाल/लोकायुक्त कि नियुक्ति से उसके चरने-खाने में बाधा आएगी?
प्रोन्नति में दलितों के लिए आरक्षण का विरोध कर सपा क्या दर्शाना चाहती है?उत्तर प्रदेश में पिछड़ों और दलितों के बीच प्रतिद्वद्विंता जग जाहिर है।ये दोनो वर्ग जितने स्वाभाविक साथी हो सकते हैं व्यवहार में आपस में उतने ही परस्पर विरोधी हैं।ऐसे में स्वाभाविक है कि सपा दलितों के सशक्तीकरण में यथासंभव अड़चन डाले।वैसे सपा के इस रुख से सवर्ण स्वाभाविक रूप से खुश हैं। 
जहाँ तक छोटे राज्यों के विरोध की बात है तो ये आसानी से समझा जा सकता है कि सपा का विरोध छोटे राज्य के निर्माण से नहीं है बल्कि उसका डर उत्तर प्रदेश के संभावित विभाजन(फिलहाल नहीं) को लेकर है,क्योंकि मुलायम सिंह के विशाल कुनबे को चरने-खाने के लिए उत्तर प्रदेश का चौथाई हिस्सा बहुत कम होगा।अपने विशाल कुनबे के भरण-पोषण के लिए यूपी जैसा विशाल प्रदेश मुलायम सिंह के लिए जरूरी है।
यहाँ ये भी कहने की इच्छा होती है कि देश की लगभग सभी पार्टियाँ अंदर से सपा के इस रुख की समर्थक हैं परंतु विवशताएं उन्हें इन मुद्दों का समर्थक बनाती हैं।चूँकि मुलायम सिंह की राजनीतिक विवशताएं सीमित हैं लिहाजा वे इन मुद्दों का खुलकर विरोध कर सकते हैं।


Narendra Tomar समाजवादी पार्टी का अर्थ मुलायम सिंह यादव खानदान है जो देश में शायद सवसे बडा राजनीतिक खानदान है। लोकपाल कितना भी कमजोर क्‍यों न बने सपा खानदान के लिए परेशानी का सबब ही रहेगा। उसका विरोध्‍ इसी के चलते है। 
और वोटों के अपने मूलाधार को बचाए रखने के लिए आरक्षण का अर्थात दलितों का विरोध उयकी मजबूरी है।
और वोटों के अपने मूलाधार को बचाए रखने के लिए आरक्षण का अर्थात दलितों का विरोध उयकी मजबूरी है।


Rajneesh Kumar Chaturvedi जी के वाल से साभार..



Saturday, November 16, 2013

सचिन को भारत रत्न, सरकार से पूछने की हिम्मत है आप में???

सचिन अपना सम्मान क्यों स्थगित करें, सरकार से पूछने की हिम्मत है आप में???
नदीम अख्तर
प्रोफेसर-आईआईएमसी
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जो लोग ये कह रहे हैं कि अगर सचिन दादा ध्यानचंद के बाद भारत रत्न सम्मान लेने का फैसला करते हैं तो उनका कद और बढ़ जाएगा, वे किसे बेवकूफ बना रहे हैं. आप सरकार से नहीं पूछेंगे कि उसने दादा ध्यानचंद से पहले सचिन को ये पुरस्कार क्यों दे दिया, सचिन से ये उम्मीद रखेंगे कि वह बड़प्पन दिखाते हुए पुरस्कार लेने से इनकार कर दें. वाह!! क्या कहने. बलिहारी जाऊं आपकी इस अदा पर.

अरे भाई, पहले ये बताइए कि क्या आपने या आपके चैनल के किसी पत्रकार ने उस कांग्रेसी मंत्री से ये सवाल किया जो सुबह से सारे टीवी चैनलों पर उछल-उछल कर सचिन को भारत रत्न दिए जाने की घोषणा की पैरोकारी कर रहा है??!!! उस मंत्री से क्यों नहीं पूछा कि दादा ध्यानचंद से पहले सचिन को भारत रत्न क्यों??? अगर दादा ध्यानचंद के इतने ही बड़े प्रशंसक-हिमायती हैं तो सरकार को क्यों नहीं कटघरे में खड़ा किया आप लोगों ने कि उनसे पहले सचिन को भारत रत्न क्यों और कैसे???!! आधे घंटे का एक शो इस विषय पर क्यों नहीं चलाया टीवी पर??!!

लेकिन नहीं, ये सब आप नहीं करेंगे. हां, सचिन से ये अपेक्षा करेंगे कि वह सम्मान लेना फिलहाल के लिए स्थगित कर दे. क्यों भाई. क्या सचिन ने जाकर हाथ-पैर जोड़कर भारत सरकार से ये सम्मान मांगा था?? जब सरकार ने अपनी मर्जी से दिया है तो वही स्पष्ट करे कि दादा ध्यानचंद से पहले सचिन को ये पुरस्कार किस आधार पर दिया गया. या सरकार ये कहे कि मौजूदा हालात में सचिन तेंडुलकर का कद दादा ध्यानचंद से बड़ा हो गया है. और अगर सरकार ऐसा कहती है तो फिर उसे ध्यानचंद के नाम से खेल के क्षेत्र में दिया जाने वाला Lifetime achievement award भी बंद कर देना चाहिए.

बात सिम्पल है. आप grey area में नहीं रह सकते. या तो आप दादा ध्यानचंद से पहले सचिन को सम्मान दिए जाने को सही मानते हैं या फिर गलत. ये हां-ना टाइप की चीज मत बोला करिए. गोलमोल बात मत करिए. 'सचिन अभी ये एवार्ड ना लें तो अच्छा हो' जैसी बातें कहने का कोई मतलब नहीं.

मेरा स्पष्ट मानना है कि हॉकी के जादूगर दादा ध्यानचंद से पहले सचिन को यह सम्मान देकर भारत सरकार ने एक गलत परम्परा की शुरुआत की है. (सचिन के प्रशंसकों से विनम्र माफी के साथ). आप राजशाही में नहीं हैं कि बादशाह सलामत की दिल जिस पर आ जाए, उसे जागीर-रियासत सौंप देंगे. आप लोकतंत्र में हैं और ये तंत्र जनता चलाती है. देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान को दिए जाने की एक प्रक्रिया और प्रतिष्ठा होती है. एक मर्यादा होती है, मानक होता है. उसे आप पैरों तले रौद कर धूलधूसरित नहीं कर सकते. आपको जवाब तो देना ही पड़ेगा सरकार जी. ये ठीक है कि अभी सचिनमेनिया में ये सवाल शायद दब जाए या दबा दिया जाए लेकिन इतिहास तो ये प्रश्न उठाएगा ही. उसने किसी को नहीं बख्शा है. और पत्रकार बंधुओं से अनुरोध है कि वे सचिन पर इतना बड़ा बोझ ना डालें कि खुद ही भारत रत्न सम्मान को स्थगित करने की घोषणा कर दें. ये उनके साथ नाइंसाफी होगी.

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वैसे उम्मीद तो नहीं है लेकिन फिर भी सोचता हूं कि क्या आज न्यूज चैनलों-अखबारों की न्यूज मीटिंग में किसी पत्रकार-प्रोड्यूसर-रिपोर्टर ने संपादक के सामने ये बात रखी होगी कि आखिर सचिन को दादा ध्यानचंद से पहले भारत रत्न कैसे?? इस पर सवाल उठाते हुए क्या एक स्टोरी करनी चाहिए??

अगर किसी बंधु ने ऐसा किया होगा तो मेरे दिल में आपके लिए आपार सम्मान है. बधाई. टीवी न्यूज चैनलों का तो आज हाल देख लिया. अब कल के अखबार देखने हैं. बड़े और सम्मानित सारे. देखना है कि सम्पादक का कोना अभी वहां कितना बाकी है. शुभ रात्रि.


अनाथ होने की सजा!

शायक आलोकपत्रकार/कवि/कहानीकार

पता नहीं यह कब की बात है जब काले सागर के आसपास के किसी बंदरगाह शहर में जाकिया नाम का एक बूढा रहता था .. अपनी ज़िन्दगी के आखिरी दिन गिनता वह अकेला बूढा प्रायः अपनी स्मृतियों में लौट जाता और फिर किसी लालच में आसमान की ओर सर उठा कहता- 'अह ! काश वह एक दिन लौट आता' ..

बूढा आँखें मूंदे मंत्र की तरह कोई माफीनामा बुदबुदाता रहता - 'मुझे माफ़ कर दो .. क्षमा क्षमा !' ..

चिलम फूंकता बूढा तो रौशनदान पर धुंए की एक सुरंग बन जाती - उस सुरंग से गुजरता बूढा अपने यौवन के दिनों में अपने गाँव अपने घर पहुँच जाता .. फिर एक बार जोर से खांसता और स्मृति फिर उसे उसकी गुजरती उम्र में उसके इस कमरे में ला पटकती ..

इसी बंदरगाह शहर में राकिया नाम का अनाथ युवक काले सागर को अपने आंसू सौंपता उससे पिता का पता पूछता..

अपने अपने हालात से उब गए जाकिया और राकिया एक बार समंदर किनारे मिले तो दोनों ने कुछ दिनों के लिए अपनी उम्र आपस में बदल लेने का फैसला किया ..

युवक हुआ जाकिया भाग कर अपने गाँव लौटा और जहाजी होने के लिए छोड़ आये अपनी गर्भवती पत्नी का पता ढूँढने लगा.. पर समय कब रुका है आखिर .. किसी ने उसके बुढ़िया होकर मर जाने की बात कही तो किसी ने उसके किसी और के साथ चले जाने की बात कही .. उम्र से हारा जाकिया उम्मीद से भी हार गया तो वापस लौट आया..

समंदर किनारे दोनों फिर अपनी उम्र बदलने ही वाले थे कि राकिया ने उम्र वापस देने से इनकार कर दिया .. राकिया ने अपनी अंतिम सांस भी तभी ली.. राकिया के हाथ में एक चिट्ठी थी - 'तुम्हारे अनाथ होने का दोष अपने पिता को देना जो जहाज के लिए हमें छोड़ गया ' .. पत्र के पृष्ठ पर राकिया के शब्द थे - ' मेरी उम्र तुम्हें सौंप मेरे अनाथ होने की सजा तुम्हें दे रहा हूँ पिता, तुम जहाज के लिए मुझे छोड़ गए' ..

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शायक

Friday, November 15, 2013

सच सिर्फ एक... Content is king

TRP नहीं कंटेंट बनाता है न्यूज चैनल की पहचान, एनडीटीवी इंडिया ने ये साबित किया
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Nadeem S Akhtar
Sr Journalist

अभी खबर आई कि गुमनामी के अंधेरे में पड़ा एक और चैनल -न्यूज नेशन- टीआरपी की रेस में प्रतिस्थापित हो गया है. मुबारक. जितने ज्यादा योद्धा, उतनी ही तीखी लड़ाई. एक से भले दो और दो से भले चार-आठ-बारह. लेकिन टीआरपी से मैं किसी चैनल के अच्छे या बुरे होने की तुलना नहीं करता, ना ही उसके बारे में कोई राय बनाता हूं. भाई साहब, जब चैनल आपको साक्षात् टीवी पर दिख रहा है तो उसके कंटेंट को देखकर अपने अनुभव से राय बनाइए ना. ये टीआरपी टैम वाले टामियों के लिए छोड़ दीजिए ताकि बाजार का गुणा-भाग चलता रहे.

मैं तो खालिस एक दर्शक की तरह चैनल देखता हूं. अपनी पसंद का और चैनलों की इस भीड़ में अगर कोई चैनल मुझे content wise ठीक-ठाक लगता है तो वह एनडीटीवी इंडिया है. लगता है वहां पत्रकारों को अपने मन से जनहित में कंटेंट पर काम करने की आजादी अभी भी है. एक छोटा सा उदाहरण देता हूं. अभी पिछले दो दिनों से जब सारे चैनल सचिनमय हो गए थे और लग रहा था कि पूरा देश सिर्फ सचिन-शैचिन्न कर रहा है (हालांकि देश में ऐसा था नहीं, सिर्फ टीवी स्क्रीन पर ही ये भेड़चाल थी), तब एनडीटीवी इंडिया ने वह किया, जो शायद ही किसी हिन्दी चैनल पर देखने को मिले. यहां रात 9 बजे सुलझे हुए पत्रकार रवीश कुमार एक शो लेकर आते हैं- प्राइम टाइम. इस शो में किसी गर्मागरम मुद्दे पर बातचीत होती है, रवीश कुमार स्टाइल में. 

मुझे यह देखकर आशचर्य नहीं हुआ कि जब दूसरे हिन्दी चैनल सचिन गाथा में लगे हुए थे, तो परसों रवीश के प्रोग्राम में डिबेट का विषय आज के समाज की जातिवादी हकीकत बयां करता मुद्दा था. बैंगलोर में एक हाउसिंग सोसायटी फोकस में थी, जिसके लिए विज्ञापन निकाला गया था कि सिर्फ ब्राह्मण इस सोसायटी में घर ले सकते हैं. इस छोटे से विषय को लेकर रवीश ने स्क्रीन पर जादू रच दिया. उस सोसायटी का कर्ताधर्ता भी प्रोग्राम में मौजूद था, उससे जवाब देते नहीं बन रहा था और वह बार-बार सनातन संस्कृति की दुहाई देने के अलावा कुछ नहीं बोल पा रहा था. रवीश की ये बहस ऐसे समय में हो रही थी, जब दूसरे चैनल सिर्फ और सिर्फ सचिन चला रहे थे. 

बीता हुआ कल भी सचिनमय था लेकिन कल भी रवीश के प्रोग्राम में सचिन को लेकर चर्चा नहीं हुई. कम से कम कल मैं इसकी उम्मीद कर रहा था कि रवीश आज सचिन को सब्जेक्ट में रखेंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. हां, IBN 7 वाले Ashutosh Ashu ने सचिन पर एक सार्थक चर्चा की अपने प्रोग्राम में कि सचिन भगवान क्यों और कैसे बन गए. राजदीप भी थे. अच्छा ये रहा कि इसमें सचिन के महिमामंडन की बजाय उसके भगवान बनने की प्रक्रिया का पोस्टमार्टम हुआ पर जाते-जाते राजदीप सरदेसाई सचिनमेनिया से नहीं बच सके. आशुतोष Times of India के एक लेख की कॉपी दिखाते हुए बोले कि राजदीप, आज से 24-25 साल पहले जब सचिन स्टार नहीं बने थे, तब आपने इस लेख में ये लिखा था कि भारतीय क्रिकेट में आज एक नयापन टाइप की चीज महसूस हुई. क्या आपको अंदाजा हो गया था कि सचिन इतने महान खिलाड़ी बनेंगे. राजदीप गदगद हो गए और कहा हां, मुझे लग गया था कि ये बहुत आगे जाएगा. 

खैर बात एनडीटीवी इंडिया की हो रही थी. मुझे नाउम्मीदी हाथ लगी क्योंकि कल रवीश के प्रोग्राम में भी सचिन पर कोई बहस नहीं हुई. कल भी एक -जरा हट के- विषय पर बहस हुई. फोकस में थे आईएएस अफसर अशोक खेमका और उनके तबादले का विवाद. अमूमन खेमका पर बहस में Times Now पर अर्नव गोस्वामी के साथ ही देखता हूं पर एक पूरा शो खेमका विवाद को समर्पित, वह किसी हिन्दी चैनल पर, यह कल पहली बार देखा. और ये बता दूं कि इस बहस में कहने-सुनने को ज्यादा नहीं था लेकिन वह तो रवीश कु्मार जैसे एंकर थे कि बहस को खींच ले गए. शुरु में ही मेहमानों ने ये कह दिया कि तबादला एक तकनीकी मामला है, इसलिए इस पर कुछ नहीं बोलेंगे. अब रवीश क्या करते लेकिन अपनी सूझबूझ से वह बहस को बढ़ा ले गए और ईमानदारी-नौकरशाही-राजशाही के इर्द-गिर्द बुने भारतीय समाज का एक आईना दिखाने की कोशिश की. खेमका ने भी अपनी बात मजबूती से रखी.

एक दर्शक के बतौर आपको रवीश कुमार के इस प्रोग्राम में कुछ नया नहीं लगेगा लेकिन अगर आप टीवी की दुनिया में काम कर चुके हैं तो डिबेट के लिए रवीश का चुना गया सब्जेक्ट और उसे चैनल पर दिखाया जाना अनूठा है. मैं तो कहूंगा कि मौजूदा टीआरपी की रेस और सचिनमेनिया को देखते हुए यह अकल्पनीय था कि प्राइम टाइम में चैनल का मंजा हुआ एंकर सचिन को छोड़कर भारतीय समाज की जातिवादी व्यवस्था और अशोक खेमका पर चर्चा करे. और दाद देता हूं कि यह एनडीटीवी इंडिया ही जैसा चैनल है, जिसने रवीश को इतनी आजादी दी कि वह -सचिन की आंधी- में खड़े होकर उससे अलग Real issues पर बात करें. समाज की पत्रकारिता करें, TRP की नहीं.

मुझे नहीं मालूम कि रवीश के प्रोग्राम की कितनी टीआरपी आती है लेकिन अपने अनुभव से बता सकता हूं कि अच्छी टीआरपी आती होगी. पब्लिक को मूर्ख मत समझिए. काम की चीज वह देख लेती है. आप दिखाने का माद्दा तो रखिए. और सबसे बड़ी बात चैनल की पॉलिसी में इतनी आजादी हो कि एक पत्रकार वहां experiment कर सके. एनडीटीवी इंडिया में मुझे वह आजादी दिखती है.

ठीक इसी तरह जब एबीपी न्यूज पर -प्रधानमंत्री- कार्यक्रम शुरु हुआ था तो लोग कह रहे थे कि सठिया गए हैं एबीपी वाले. सलमान के जमाने में गुजरे प्रधानमंत्रियों की कहानी दिखाएंगे-देश के हालात बताएंगे. कौन देखेगा??? और यकीन मानिए, आज टीवी की दुनिया में टीआरपी की जैसी समझ बनाई गई है, उसमें ज्यादातर लोग यही कहेंगे कि ऐसा प्रोग्राम नहीं चलने वाला. लेकिन दाद दीजिए एबीपी के मुखिया शाजी जमां का, जो ऐसा प्रोग्राम देश के सामने लेकर आए और टीआरपी की रेस में भी अपने फैसले को सही साबित किया. 

सो Content is king. ये आज भी सच है और कल भी रहेगा. देर-सबेर दर्शक उसी चैनल पर आएंगे, जिसका content rich होगा. अगड़म-बगड़म बहुत हुआ. खजाना-आसाराम-सचिन, ये सब तो बुलबुले हैं. टिकेगा वहीं, जो अपना ठोस आधार पैदा करेगा, विश्वसनीयता बनाएगा. -आज तक- चैनल अगर आज भी पॉपुलर है तो इसकी सबसे बड़ी वजह है इसकी विश्वसनीयता जो एसपी के जमाने में बनी. तब 20 मिनट के बुलेटिन में इसके तेवर, इसका कंटेंट और खबरों का प्रेजेंटेशन सरकारी दूरदर्शन के जमाने में हवा के किसी ताजा झोंके की तरह था. सो कंटेंट होगा तो टीआरपी भी आएगी. अनवरत आएगी. बिना ड्राइवर वाली कार और स्वर्ग की सीढ़ी बार-बार नहीं चलती-लगती.

Nadim S. Akhter के फेसबुक वाल से साभार

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