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Monday, October 12, 2015

Be Alert to Protect Yourself Against World

जिंदगी एक जंग है। ऊपर वाले ने हमें एक वॉर जोन में फेंक दिया है। बी एलर्ट! प्रोटेक्ट योरसेल्फ....।

जिंदगी में एक मंजिल चुनना जरुरी है। जुनून के साथ दौड़ो। पढ़ना है तो जुनून के साथ पढ़ो, गाना है, तो जुनून के साथ गाओ। बिना मकसद के जिंदगी, मुर्दों से बदतर है। उसके मरने-जीने से दुनिया को कोई फर्क नहीं पड़ता।

याद रख लो, खुद से बढ़कर यहां कोई तुर्रम खान नहीं। जो अच्छा लगे वो करो। किसी की बात मत सुनो। इंसानियत की बात तो बिल्कुल नहीं।

अगर तुम्हारा टारगेट है 10 मील जाने की, तो 11 मील दौड़ो। ऐसा हाथ मारो कि दिमाग घूम जाए। समझा? अब से किसी से कुछ नहीं बोलना। न समाजवाद, न साम्यवाद, न पूंजीवाद। सिर्फ अपन का वाद... बाकी सब भाग साले....

Friday, October 3, 2014

लड़ाइयां ...Fights

श्रवण शुक्ल
बचपन में लड़ाइयां तो खेल का हिस्सा थी
स्कूल में गए तो सहपाठियों से लड़ाई
घर आये तो भाई से लड़ाई
पड़ोस में गए तो पडोसी से लड़ाई
गांव में गए तो गांववालों से लड़ाई
बाजार गए तो लड़ाई
मेले में गए तो लड़ाई
लेकिन उन लड़ाइयों में भी प्यार था
कभी भाई के लिए लड़ाई
तो कभी दोस्त के लिए लड़ाई
कभी मम्मी की कसम पे लड़ाई तो कभी गुरुजी को लेकर लड़ाई
कभी जिसे अपना मान लिया उसके लिए लड़ाई
तो कभी दुश्मन के लिए भी लड़ाई
कि कैसे मेरे दुश्मन को किसी और ने मार दिया।
वो भी क्या दिन थे..
जब मोहब्बत हर मोड़ पर हो जाया करती थी
और सच्ची दोस्ती भी
आज भी सब मिलते हैं
लेकिन अब वो प्यार कहाँ
दोस्तों में गर्मजोशी कहां
अब तो मोहब्बत भी अच्छे-बुरे का तोल- मोल करती है
इसीलिए सुन लो दुनियावालों
अकेले रहता हूँ.. इसी में खुश हूं..
पता है क्यों?
खुशियों से नफरत जो हो गई है
और बचपन की आदत है..दुश्मन को करीब रखने की
ऐसा ही हूँ मैं।

Wednesday, November 13, 2013

कविता कैसे...

Shayak Alok
कविता सीखो !
________________

कई युवा फेसबुक मित्रों के मैसेज आये इन दिनों कि शायक हमें भी लिखना बताइये .. हम भी लिखना चाहते हैं आपकी तरह .. तो इस पोस्ट से एक साझा संवाद दे देता हूँ ..

[१] सबसे पहले समझिये कि आजकल की कविता क्या है .. आज की कविता है वाक्य विन्यास की कलात्मकता .. उसके अन्दर विचार को पिरोना .. और बिम्ब .. अब एक उदाहरण लीजिये .. जैसे मैंने यह पंक्ति चुनी - '' एक लड़की कोने वाले घर की खिड़की पर खड़ी '' .. अब इसे वाक्य विन्यास की कलात्मकता से आप सजायें तो अलग अलग पंक्तियाँ बनेंगी .. जैसे [अ] एक कोने वाला घर / एक लड़की खिड़की पर खड़ी [ब] खिड़की पर खडी लड़की और वह कोने वाला घर [स] लड़की खड़ी खिड़की पर कोने में खड़ा घर [द] खड़ी खिड़की लड़की खड़ी कोने में खड़ा घर .. कुछ भी .. जितना बेतरतीब कर सकेंगे आप उतना चमत्कृत कर सकेंगे ..

[२] विचार को पिरोना ... कैसी लड़की .. कैसी खिड़की ..कैसा घर .. अपनी कल्पना लाइए .. एक लड़की जो फिर नहीं सोई .. या एक लड़की जो तारे देखती रहती है .. एक लड़की जो इन्तजार में है .. [ प्रेमपरक कविता ] .. लड़की जो भाग जाना चाहती है .. लड़की जो कूद जाना चाहती है [स्त्री विमर्श ] .. खिड़की जो कभी बंद नहीं होती .. खिड़की जो आज पहली बार खुली .. खिड़की जो दरवाजा है उस लड़की के मन का .. कुछ भी ... ऐसे ही घर .. घर जिसमें दीवारें नहीं है .. घर जो गली में कोने पर है .. कैसे भी उसके होने को जस्टिफाय कीजिये बस ..

[3] बिम्ब .. यह सबसे पिटा हुआ फार्मूला है जो युग बदले पर जिसका उपयोग नहीं बदला .. बादल जो प्रेमदूत है .. लड़की जो नीर भरी दुःख की बदली है .. 'तुम्हारे माथे को चूमना तुम्हारी आत्मा को चूमना है' .. 'फफूंद हैं चुपचाप के पेड़' .. 'मैंने मेरी हथेली में लगा दी छलांग' .. कुछ भी कल्पना कीजिये .. लड़की खड़ी है खिड़की पर कोने वाले घर में जैसे गुलदाउदी का फूल कोई अभी सूरज की ओर मुड़ा है ..

[४] नकल करना कविता सीखने का खूब अच्छा तरीका है .. नरेश सक्सेना की नक़ल करना आसान है .. कुंवर नारायण की भी .. कुंवर नारायण लिखते हैं 'ट्यूनीसिया का कुआं ' .. आप उसे बना दीजिये 'साईकिल का पहिया' .. 'ट्यूनीसिया में एक कुआं है/ कहते हैं उसका पानी / धरती के अन्दर ही अन्दर / उस पवित्र कुएं से जुड़ा है / जो मक्का में है ' ... आप लिखिए - ' मेरे घर एक साईकिल का पुराना पहिया है / कहते हैं मेरे दादा के पिता के पास थी साईकिल / साईकिल घुमती पहुँच गई / बनिया साहूकार के घर / सूद मूल चुकाकर / पहिया शेष रह गया ' .. समीक्षक का बाप नहीं पकड़ेगा आपको और हाथ चूमेगा आपके ..

[५] पढ़ना बहुत जरुरी है .. बढ़िया लोगों को पढ़िए .. मैं एक साल पहले कुछ और लिखता था .. अब कुछ और लिखता हूँ .. क्यों .. क्योंकि मैं अपने हमउम्रों को भी पढता हूँ .. कई बार उनकी बेहतरीन कविता में जो जादू दस फीसद होता है उसी जादू की मात्रा पचास फीसद कर मैं मेरी कविता क्रियेट करता हूँ और आप कह पड़ते हैं वाह !

[६] एक बात हमेशा याद रखिये कि लिखे जाने तक हर कविता झूठ होती है .. रोते हुए कभी नहीं लिखता कोई कवि अपनी कविता .. अभिप्राय यह कि अपने लिखे जाने की प्रक्रिया में कविता संवेदना विचार आदि की मांग नहीं रखती .. कवि शब्दबाजी करता है बस लिखते समय .. तो फिर यह संवेदना विचार आते कहाँ से हैं .. ? ये आते हैं रोजमर्रा की जिंदगी में साक्षी बने रहने से .. महसूसना जगाये रखने से .. दामिनी मरती है तो मैं अभी उद्वेलित होऊंगा कविता नहीं लिख सकूँगा .. दामिनी के प्रति मेरी संवेदना मेरे दिमाग की नसों में जम जायेगी .. और जब बाद में कभी लिख रहा होऊंगा मैं तो नसों में जमी संवेदना खुद पिघल पिघल आएगी उस रचना में .. मुझे प्रयास नहीं करना होगा ..

[७] अब .. कैसे लिखें एक आधुनिक कविता इसे सीधे रचना प्रक्रिया से समझा देता हूँ आपको .. कविता के किसी एक किरदार की कल्पना कीजिये .. जैसे आजकल चींटी और ईश्वर बहुत हिट हैं .. कविता में कविता खुद भी एक किरदार या एक परिदृश्य के रूप में खूब छाई है आजकल बाजार में .. कैक्टस एक बढ़िया किरदार है .. प्रेयसी .. चिड़िया .. फफूंद .. ये सब भी .. तो मैं ले आता हूँ एक किरदार .. उम्म्म .. लीजिये मैंने चुना अमीबा को .. अब अमीबा के कुछ बेसिक फीचर लाइए जेहन में .. टेढ़ी मेढ़ी परिधि उसकी .. अमीबा को उसके न्यूक्लियस के साथ काट दो तो दो अमीबा ..दोनों जिंदा .. तो अब कविता लिखते हैं ..

'' जब तुम कर रही होती हो प्रेम की बातें
तब मैं एक अमीबा के बारे में सोच रहा होता हूँ

मैंने बचपन में अमीबा बनाना पहले सीखा
प्रेम किया बाद में
और जब किया प्रेम
पिछले पृष्ठों पर बनाए हर अमीबा के केंद्र में
प्रेयसी के नाम का पहला अक्षर लिख दिया

मेरे अतीत अनुभवों का अमीबापन
ब्लाह ब्लाह ब्लाह .. '' ...

[८] उस युवा महाकवि महासमीक्षक की तरह लिखना हो तो फिर ऊपर के सब पॉइंट्स भूल जाइए और सीधे निबंध लिख दीजिये .. '' मैं एक मोटा आदमी हूँ .. मैं धंस कर बैठा हूँ मेरे सोफे में .. मेरे हाथ में पित्ज़ा है और देख रहा हूँ टीवी .. एक हेलिकोप्टर अभी उड़ कर गया है आकाश में .. अभी आया था एलिट नवोदित कवयित्री का फोन .. उसकी कविता को साबित करना है सत्ता प्रतिरोध की कविता .. ओह मुझे कितना काम है .. चलो फ़ोन उस लकड़सूंघे कवि को .. उसे होना है खड़ा बेचने को किताब '' ..

अंट शंट कुछ भी .. उसे कविता साबित करने की जिम्मेवारी मुझपर छोड़ दीजिये ..

आज बस इतना ही .. बाकी का बाकी !
_______________
शायक

Saturday, November 9, 2013

राजेंद्र यादव को बागी लेखिका का प्रणाम


राजेंद्र यादव के साथ तसलीमा नसरीन व अन्य

राजेंद्र यादव नहीं रहे. सोचकर हैरानी होती है कि वे अब नहीं हैं. दो-चार दिन पहले तक वह इंसान हमारे बीच था. कुछ ही दिन पहले वह मेरे घर पर चंद दोस्तों के साथ अड्डा जमाकर गए थे. एक मैरून रंग का कुर्ता और झीनी सफेद धोती पहनकर आए थे. उम्र बढऩे पर लोग अकसर रंगीन कपड़े पहनना छोड़ देते हैं, पर राजेंद्र जी ने ऐसे संस्कार कभी नहीं माने. वे हमेशा चटख हरे, लाल, नीले या बैंगनी रंग के कपड़े पहनते थे. उस दिन मेरे घर पर उन्होंने शराब पी, खाना खाया, गप्पें लड़ाईं.

लोग कहते थे कि वे बहुत बीमार चल रहे हैं पर मैंने उन्हें कभी बीमार नहीं देखा. उन्हें डायबिटीज था. हजारों लोगों को होता है पर उनकी शुगर अनियंत्रित नहीं थी. जैसे आम तौर पर लोग शराब या खाना देखकर उस पर टूट पड़ते हैं, वे इस तरह कभी नहीं खाते-पीते थे. उनमें असाधारण संयम था. जहां भी रहें, बाहर या घर पर, कितना पीना है, कितना खाना है, कब इन्सुलिन लेना है, सिगरेट के कितने कश लगाने हैं, कब सोना है, सब बिल्कुल घड़ी के कांटे की तरह तय था.

देखकर बड़ी हैरानी होती थी. इतना नियम मानकर चलना बहुत कम लोगों से ही हो पाता है. एक सिगरेट के दो टुकड़े करने के बाद वे आधा टुकड़ा पीते थे. कई बार उनसे पूरी सिगरेट पीने के लिए कहा. ये कहकर कि कोई बड़ा नुकसान नहीं होगा, पर उन्होंने आधे टुकड़े से ज्यादा कभी नहीं पी. उनके फेफड़ों को लेकर सब जितनी दुश्चिंता करते थे, क्या उनके फेफड़े सचमुच उतने खराब हो चुके थे? जब भी उनसे पूछती थी, ‘‘तबीयत कैसी है?’’ वे कहते, ‘‘बहुत बढिय़ा.’’ तबीयत खराब है या फलां रोग से परेशान हैं, ऐसी बातें वे कभी अपने मुंह पर नहीं लाते थे.

एक बार उनके मयूर विहार के घर उन्हें देखने गई थी. पता चला हर्निया हुआ है, लेटे हुए हैं. वे लेटे-लेटे ही बातें करते रहे, जिंदगी के किस्से सुनाते रहे. बीमारी को लेकर हाय-हाय करना, अवसाद में घिरे रहना, यह सब राजेंद्र जी में बिल्कुल नहीं था. हमेशा हंसते रहते थे. जिंदा रहने में उन्होंने कोई कोताही नहीं की. उनकी उम्र 84 साल थी. अभी और जिंदा रह सकते थे पर मैसिव हार्ट अटैक होने पर और क्या किया जा सकता है! कोई भी चला जाता है. सबसे अच्छी बात जो हुई, वह यह कि राजेंद्र जी को ज्यादा भुगतना नहीं पड़ा. दिनोदिन, सालो-साल बिस्तर पर पड़े-पड़े कराहना नहीं पड़ा. शुक्र है, वैसा दुरूसह जीवन राजेंद्र जी को नहीं मिला.

जिस रात उनका देहांत हुआ, उस रात साढ़े तीन बजे मैं उनके घर पहुंची. मैंने देखा कि बाहर ड्राइंग रूम में जहां सोफा रखा रहता था, वहां एक अद्भुत से इस्पात के डिब्बे में वे लेटे हुए हैं. उनकी बेटी रचना पास ही कुर्सी पर बैठी रो रही थी. मैं बड़ी देर स्तब्ध खड़ी उनकी निस्पंद देह को देखती रही. राजेंद्र जी को कभी सोते हुए नहीं देखा था. लग रहा था कि वे सो रहे हैं. फिर लगा कि जैसे उनकी सांस चल रही हो. लगातार बहुत देर तक देखती रही. अगर जरा भी उनके सांस लेने का आभास मिल जाए तो!

इतनी यथार्थवादी होने के बावजूद भी मैं आज भी मौत को मान नहीं पाती हूं. मेरी मां मेरे सामने गुजरी थीं. पिताजी की मृत्यु के समय मैं वहां नहीं थी. मेरे देश की सरकार ने पिताजी के आखिरी समय में उन्हें एक बार देखने के लिए भी मुझे नहीं जाने दिया. राजेंद्र जी जिस तरह लेटे हुए थे, हो सकता है मेरे पिताजी भी वैसे ही लेटे हुए हों. लग रहा था कि शायद वे सो रहे हैं. जैसे अचानक शोर-शराबे से वे जाग जाएंगे.

लेकिन मेरे पिताजी नींद से नहीं जगे. राजेंद्र जी भी नींद से नहीं जगे. हम लोग जो जिंदा हैं, जो अभी राजेंद्र जी के लिए शोकग्रस्त हैं, एक दिन इसी तरह हम सब भी मर जाएंगे. पर हममें से कितने लोग जी पाएंगे, राजेंद्र जी जैसा विविध जीवन.

वे हमेशा अपने घर पर बौद्धिक लोगों की महफिल जमाते थे. उस महफिल में हर उम्र की महिला व पुरुष होते. वे प्रतिभावान नौजवान और नवयुवतियों के साथ समय गुजारते थे. जिनके साथ वे विचारों का आदान-प्रदान करते, उन्हें लिखने का उत्साह देते थे. वे औरतों के जीवन के अनुभवों को, उनके प्रतिवादों को, उनके नजरिए और उनकी भाषा को ज्यादा महत्व देते थे. वे अंधेरों को टटोलकर हीरों के छोटे-छोटे टुकड़े बीन लाते थे.

बंगाल से खदेड़ दिए जाने के बाद जबसे मैंने स्थायी तौर पर दिल्ली में रहना शुरू किया, जब बांग्ला पत्र-पत्रिकाओं ने डर के मारे अपने आपको सिमटाकर संकुचित कर लिया. सिवा मेरे सबको छपने का अधिकार था, यहां तक कि जनसत्ता ने भी जब मेरे लेखों को बहुत पैना कहकर खारिज कर दिया, तब राजेंद्र जी ने मुझे अपनी पत्रिका हंस के लिए नियमित रूप से लिखने के लिए कहा. उन्होंने मुझे दूसरे संपादकों की तरह कभी नहीं कहा कि धर्म की निंदा करना, सरकार को बुरा-भला कहना, भारतीय परंपराओं को हेय बताना या धर्म व्यवसायी बाबाओं के बारे में कटु बातें कहना नहीं चलेगा. किसी भी विषय में, कुछ भी लिखने की स्वतंत्रता दी थी राजेंद्र जी ने मुझे. दूसरी पत्रिकाओं के संपादक अरे-रे-रे कहकर भाग जाते हैं. धर्म की किसी भी तरह की आलोचना कोई नहीं बर्दाश्त करता है. लेख काट देते हैं, नहीं तो सेंसर की कैंची चलाकर सत्यानाश कर देते हैं. राजेंद्र जी ने मेरे किसी भी लेख को अप्रिय सत्य रहने के अपराध में खारिज नहीं किया. उस पर कैंची नहीं चलाई. वे ठीक मेरी तरह बोलने की आजादी पर 100 फीसदी विश्वास करते थे. राजेंद्र जी की काफी उम्र हो चुकी थी. पर उससे क्या? वे बहुत ही आधुनिक इंसान थे. उनको घेरे रहने वाले जवान लड़के-लड़कियों से भी कहीं ज्यादा  मॉडर्न और सबसे ज्यादा  मुक्त मन के इंसान.

कुछ समय पहले उन्होंने हंस पत्रिका के वार्षिक उत्सव में गालिब ऑडीटोरियम में ‘‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’’ को लेकर एक बड़े कार्यक्रम का आयोजन किया था. तय हुआ कि मैं वहां बोलूंगी पर सुरक्षा कारणों से मैं अंततः वहां जा नहीं पाई. कार्यक्रम के बीच से उन्होंने कई बार मुझे फोन किया. बहुत अनुरोध किया. इस बात पर वे बिल्कुल विश्वास नहीं करते थे कि मुझे मारने के लिए चारों तरफ मुसलमान कट्टरपंथी तैयार बैठे हैं. मैं भी नहीं करती हूं. अब अभी भी लोगों की भीड़ देखते ही, यादों का एक वीभत्स झुंड मुझे जकड़ लेता है. किसी भी समय, कोई भी कट्टरपंथी कुछ भी अनिष्ट कर देगा. और यह धक्का न संभाल पाने पर अगर सरकार बोल बैठे कि देश छोड़ो. मैंने बंगाल को खोया है. भारत को खोने का दर्द मैं नहीं सह पाऊंगी.

इधर सुरक्षाकर्मियों ने मुझे फिर से सावधान किया है कि भीड़ के बीच, किसी भी मंच पर मैं न जाऊं. राजेंद्र जी ने मुझे कार्यक्रम में जाने का आमंत्रण दिया था. मैंने वादा भी किया था कि मैं जाऊंगी. पर मैं उनकी बात रख न सकी. उन्हें बहुत दुख पहुंचा. कार्यक्रम के निमंत्रण पत्र पर वे मेरा नाम देना चाहते थे. मैंने नाम न देने का अनुरोध किया था. कहा था कि अचानक ही आ जाऊंगी. उन्होंने मेरी बात रखी और निमंत्रण-पत्र पर मेरे नाम का उल्लेख नहीं किया. उन्हें विश्वास था कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर मेरा वक्तव्य मूल्यवान होगा. लिखने की वजह से ही पूर्व और पश्चिम बंगाल से मेरा निर्वासन हुआ. बांग्ला पत्र-पत्रिकाओं में मैं एक निषिद्ध नाम हूं. कई किताबें प्रतिबंधित हुई हैं. मेरी किताबों पर प्रतिबंध लगाने और मुझे मृत्युदंड देने के लिए शहर में लाखों लोगों का जुलूस निकला था. उसी निषिद्ध इंसान को अपने जीवन के अंतिम कार्यक्रम में राजेंद्र जी सम्मान देना चाहते थे. निषिद्ध लेखक को देखकर, दूसरे लेखकों को, बुद्धिजीवियों को, डर से दूर जाते देखा है, पर राजेंद्र जी फूलों की माला हाथों में लेकर आगे आए थे. राजेंद्र जी निश्चित रूप से सबसे अलग थे.

राजेंद्र जी को लेकर आखिरी दिनों में मैंने तरह-तरह की बातें सुनी थीं. बिहार से आई ज्योति कुमारी नाम की लड़की को उन्होंने नौकरी दी, लिखने का अवसर और सुविधाएं दीं. उसकी किताब प्रकाशित करवाने में मदद की  और लाड-दुलार में उसे सिर पर चढ़ा लिया था. इस बीच कुछ ऐसी घटनाएं हुईं कि तरह-तरह के विवाद खड़े होने लगे. ज्योति कुमारी और राजेंद्र जी को लेकर लोग तरह-तरह की अशोभनीय बातें कहने लगे.

उधर दूसरे दल के लोग कहते फिर रहे थे कि लड़की अच्छी नहीं है. इस पुरुषतांत्रिक देश में लड़कियों के बारे में बुरी बातें बोलने वाले लोगों की कमी नहीं है. राजेंद्र जी जैसे जिंदादिल इंसान को मैं बाहर के लोगों की बातें सुनकर दोष नहीं दे सकी, या फिर लोगों की बातें सुनकर उस लड़की को भी ‘‘वह अच्छी लड़की नहीं है,’’ नहीं कह सकी. राजेंद्र जी ने बहुत-सी लड़कियों से स्नेह किया है. बहुतों को प्यार भी किया है, पर किसी लड़की की अनुमति के बगैर उस पर कोई दबाव डाला हो या उसका स्पर्श भी किया हो, ऐसा उनके शत्रुओं ने भी नहीं कहा है.

जिस दिन मेरे घर पर उनसे मेरी आखिरी मुलाकात हुई थी, उस दिन अचानक उन्होंने मुझसे पूछा, ‘‘लेखक सुनील गंगोपाध्याय के विरुद्ध मेरे अभियोग की क्या वजह थी?’’ मैंने कहा, ‘‘सुनील का मैं बहुत सम्मान करती थी पर एक दिन अचानक उन्होंने मेरी अनुमति के बिना मेरे शरीर को छुआ था. विरोध करना उचित था, इसीलिए विरोध किया. दूसरी लड़कियों के जीवन में यौन शोषण होने पर विरोध करती हूं तो अपने जीवन में घटने पर मुंह बंद करके क्यों रहती?’’ राजेंद्र जी मुझसे सहमत थे. उन्होंने एक बार भी नहीं कहा कि सुनील के खिलाफ मेरा शिकायत करना उचित नहीं था.

जवान युवक-युवतियां राजेंद्र जी को हमेशा घेरे रहते. वे बहुत श्रद्धा से उन्हें याद करते थे. मैंने उन लोगों को कहते सुना है कि हमने पिता खो दिया है. राजेंद्र जी द्वारा स्नेहधन्य कवि और लेखक, राजेंद्र जी की तरह आजाद विचारों के विश्वासी हों. किसी भी अप्रिय सत्य को बोलने में उन्हें कोई हिचकिचाहट न हो. क्या बनेगा कोई ऐसा?

जैसे मैंने अपनी आत्मकथा लिखते समय कुछ भी नहीं छुपाया, हाल ही में उनकी लिखी हुई, स्वस्थ व्यक्ति के बीमार विचार किताब में राजेंद्र जी ने भी अपने बारे में कुछ भी नहीं छुपाया है. उन्होंने अपनी जिंदगी के बारे में लिखा, अपने सारे संबंधों के बारे में लिखा. उन्होंने, समाज की नजरों में जो वैध है, अवैध है, वह सबकुछ लिख डाला. लोग क्या कहेंगे इसके बारे में नहीं सोचा. क्या, कभी, कोई हो सकेगा उनके जैसा निष्कपट? क्या जिन्हें वे छोड़ गए हैं, वे सब उन्हीं की तरह अपने विचारों को खुलकर कहने की आजादी पर विश्वास करते हैं? :तसलीमा नसरीन
Tribute to Rajendra Yadaw by Taslima Nasrin
सौजन्य से: आजतक/इंडिया टुडे
यह लेख आप यहां भी पढ़ सकते हैं...

Saturday, October 5, 2013

निंदिया

निंदिया की तलाश में मुसाफिर: श्रवण शुक्ल
जमाने बाद आधी रात को भी
भागी रही निंदिया
आई भी तो चली गई
पौने तीन बजे सुबह ही आंख
ऐसे खुली कि खुली ही रह गई 

मचलते रहें, बिस्तर पर
न मिला कोई ठौर निंदिया का
पलटते रहे, मचलते रहे
फिर नहीं चला दौर निंदिया का

उठे, कपडे पहने
और निकल दिए, घर से
भोर-अर्द्ध-रात्रि टहलन के विचार से
सोचा कि थक जाऊं
फिर शायद मिल जाऊं
अपने से दूर भागी निंदिया से

चला सुबह दिशा दक्षिण
वह सड़क गई है मथुरा को
चलते चलते कुछ न मिला
बस...मिला खोखा चहिया का

चहिया* के खोखे पे रुके 
वहां मिला न मुकम्मल कुछ
चहिया भी थी बन रही
निकल रहा था ब्रेड पकौड़ा

आधी सुबह और आधी रात
दबाए दो ब्रेड पकौड़ा
फिर रास्ता नापे घर का
पकडे एक सिगरेट.. 

तभी, रुकना पड़ा
चहिया थी बन गई
उठाए चहिया, लौट लिए
उम्मीद लिए फिर निंदिया की

रास्ते में जब पहुंचे
पकौड़ा पहुंच चुका था पेट में
तब समझ में आया.. कि
दूर क्यों भागी थी हमारी निंदिया

भाई.. था पेट खाली
तो कैसे आती निंदिया?
जब समझ में आया, पहुंचे घर
चाहत लिए फिर निंदिया की

बिस्तर पर लेटे,
उससे पहले ही गलती कर गए
समय हुआ था साढ़े चार
पानी पी लिए, फिर से बिछड़ गए निंदिया से

यह तो रही निंदिया की काया
खूब फिर लिए,
बिछड़ गई हमसे, हमारी ही छाया
बत्ती बुझाए तो फिर अकेले हो गए
लेकिन.........

यह सब तो थी माया निंदिया की
बहाने थे जागने की,
और निकल गई थी साया निदिया की
पटलते रहे-पलटते रहे

उलझते रहे-निपटते रहे
न तो फिर से आई निंदिया
न चैन मिला न आराम मिला
तब समझ में आया

क्यों सताती है सबको निंदिया
सब हैं परेशान 
सब हैं हैरान
कोई दवा ले कोई दारु

है सबको छकाती यह निंदिया
है सबको जलाती यह निंदिया
हुए शिकार तो जग दुःख जाना
क्यों सबको रुलाती है यह निंदिया

यह सब लिख दिया
फिर भी न आई निंदिया
सोच के गया छत पे
हो मुलाक़ात और मिल जाए निंदिया

हाय..मुझे सताए यह निंदिया
मुझे रुलाए यह कमबख्त निंदिया
पास न आए यह निंदिया
इन्तजार कराए और न आए निंदिया

भावार्थ:
निंदिया= नींद, निद्रा।
चहिया=चाय, सुबह का पेय, निंदिया भगाने का पेय(दिन में)।

Monday, April 8, 2013

अखबार के मालिक और मेरी भिड़ंत: अरुणेश सी. दवे


अख़बारों के नजरिए में पाठक, बोले तो-रै बेवकूफ़ भारतीय आम आदमी..आगे पढ़ें....

शाम के वक्त एक साहित्य प्रेमी अमीर मित्र का फ़ोन आया। उनके फ़ार्म हाउस में वाईन एंड डाईन का न्योता था।  मुफ़्त में पैग लगाने की खुशी में हम दनदनाते पहुंच गये। वहां एक सज्जन और विराजमान थे। मित्र ने मेरा उनसे परिचय करवाया। वे मध्य भारत के सबसे बड़े अखबार के मालिक और संपादक थे। उन्होने ससम्मान मुझसे हाथ मिलाया। मित्र ने मेरा परिचय दिया- "भाईसाहब बड़े अच्छे व्यंग्य कार हैं।" यह सुनते ही सज्जन के चेहरे पर तिरस्कार के भाव उभरे। मन ही मन उन्होने अनुमान लगाया कि जरूर इस लेखक की चाल होगी। पार्टी के बहाने अपने लेख पढ़वायेगा। पर टेबल पर रखी शीवाज रीगल की बोतल देख, उनकी नाराजगी कुछ कम हो गयी। मन मार कर बोले- "चलिये इसी बहाने आपसे मुलाकात हो गयी।"
मैने भी मन ही मन सोचा, भाड़ में जाये मुझे इनसे क्या लेना देना। अपन तो पैग लगाओ। यहां वहां की चर्चा होती रही। और अखबार के  मालिक साहब इंतजार करते रहे कि कब मै अपनी रचना उन्हे दिखाउंगा । दो राऊंड होने के बाद भी जब लेख प्रकाशित करने की कोई चर्चा न हुई। तो मालिक साहब का माथा ठनका। पांच राउंड होने के बाद तो सब गहरे मित्र बन जाते हैं। ऐसे में बात टालते न बनेगी।  मालिक साहब ने बात मेरे लेखन पर मोड़ी बोले- "भाई साहब, कोई रचना साथ लाये हैं क्या। मैने पूछा- "किस लिये श्रीमान।" हकबकाये मालिक साहब ने कहा- " अखबार में छपवाने के लिये और क्यों।"  मैने पूछा- "किस अखबार में छपवाने के लिये ?" वे बोले- अरे भाई, मैं छापूंगा तो अपने अखबार मे ही ना। लगता है आप मेरी बात कुछ समझे नही।" मैने कहा- "आप तो कोई अखबार निकालते ही नहीं हैं श्रीमान।"  मालिक साहब ने असहाय भाव से मित्र की ओर देखा। मानो कह रहें हो ’कैसे आदमी के साथ बैठा दिया दो पैग में ही लग गयी है।’

मालिक साहब ने याद दिलाया- "अरे भाई मै  फ़लां अखबार का मालिक संपादक हूं, भूल गये क्या आप।" मैने पलट कर जवाब दिया- "वो तो अखबार है नही, सत्तारूढ़ पार्टी का मुखपत्र है। भाट और चारण जैसे चाटूकारिता करने वाला। अंतर यही है कि सरकार की छोटी मोटी गलतिया छाप दी जाती है । हां कभी कभी उसमे मंहगाई का जिक्र जरूर कर दिया जाता है।" मालिक साहब बैकफ़ुट पर थे- "आप गलत समझ रहे हैं। हमारा अखबार दूसरो से अलग है। हम किसी के दबाव में नही आते।" मैने कहा- "आम जनता को टोपी पहनाईगा मालिक साह्ब, हमे नही। सरकार के हर विभाग में खुला कमीशन बट रहा है। घपले हो रहे हैं। और आपके पत्रकार भी भीख मांगते वहीं पाये जाते हैं। कभी छापा आपने ?  क्या छापते हैं आप-  "अन्ना हजारे ने अपने भांजे को कांग्रेस में भरती किया" "बाबा रामदेव खुद को राम कह रहे हैं।" शांती भूषण नजर आ रहा है आपको। भ्रष्टाचार का प्रदूषण नही।  सलवा जुड़ूम के नाम पर हो रहा अत्याचार तो खैर आपको मालूम ही न होगा। नक्सलवाद की चक्की पर पिस रहे आदिवासियो के बारे में क्या किया आपने ? कुछ नही। छापते क्या हैं आप- "चमत्कारी अंगूठी", "फ़र्जी बाबाओ के विज्ञापन"। और तो और  वो लिंगवर्धक यंत्र का कभी उपयोग किया है आपने क्या मालिक साहब जो दूसरो को बतलाते हो ।

बात बिगड़ती देख, मालिक साहब ने समझौते का प्रयास किया- "आप इतने जोशीले आदमी हैं। लेख भी जानदार लिखते होंगे।" मैने कहा- "लिखता तो हूं, पर छापने की हिम्मत आपमे न होगी।  छाप पायेंगे उन कंपनियो की काली करतूत। जिनके शेयर आपने सस्ते दामो में ले रखे हैं। जिनके करोड़ो रूपये के एड आपके मुखपत्र को मिलते हैं। आप तो छापिये दलित लड़की से बलात्कार, सड़क हादसे, ब्लागरो से चुराये हुये लेख।" फ़िर हमने हाथ होड़ कर कहा- " हे फ़्री प्रेस के चाचा, फ़्री मे ब्लागरो के लेख पाओ और जनता को दिखाने के लिये बड़े नाम की तारे और मच्छर पर घटिया तुकबंदी छपवाओ। पर अपने को अखबार बस मत कहो।" आज भारत का चौथा स्तंभ न  बिकता, तो मजाल है भारत में ये भ्रष्टासुर पैदा हो जाता।"

अब तक चार राउंड हो चुके थे। मालिक साहब भी क्रोध में आ चुके थे । वे  जोर से चिल्लाये- "रै बेवकूफ़ भारतीय आम आदमी। इसके जिम्मेदार खुद तुम लोग हो। तुमको हर चीज फ़ोकट में चाहिये पैसा जेब से एक न निकलेगा। बस दुनिया मुफ़्त में तुम्हारी रक्षा करे। दो रूपये किलो वाला सस्ता चावल जैसे २ रूपये में सस्ता अखबार चाहिये। तो कनकी ही मिलेगा बासमती नही। बीस रूपया महिना खर्चा कर एक पत्रिका तो खरीदना नही है। कहां से रूकेगा भ्रष्टाचार। कागज का दाम मालूम है ? अखबार के खर्चे कैसे पूरे होते होंगे कभी सोचा है? तुम खुद पैसा कमाओ तो ठीक और हम लोग तुम्हारे लिये भूखा मरें। बात ध्यान से सुन - "हम लोग तुझको अखबार बेचते नहीं है। सस्ते दाम में तुझे अखबार देकर तुझको खरीद लेते हैं।"  फ़िर हम तुझे बेचते हैं उन कंपनियो को। जो हमे तुम्हारा सही दाम देती हैं। उन नेताओ को जो तुम्हारे पैसे मे ऐश करते हैं और हमे भी करवाते हैं । पैसा देकर तुम्हारी तरह फ़ोकट नही। और सुन तुझे और लोग भी खरीदते हैं सी आई ए से लेकर तमाम विदेशी। ताकि वे अपने हिसाब का लेख छपवा कर भारत में मन माफ़िक जनमत तैयार करवाएं और अपना माल खपाएं। किसी पेपर में पढ़ता है क्या कि अमेरिकी विमान रूस के समान विमान से डेढ़ गुनी कीमत के पड़ते हैं। या परमाणू रियेक्टर की कीमतो का तुलनात्मक अध्ययन। नही न क्यों क्योंकि तुम लोग पैसा नही देते उन लोग देते हैं।" फ़िर मालिक साहब ने हमारी ही तर्ज पर हमे हाथ जोड़ कहा- तो हे फ़ोकट चंद भिनभिनाना बंद कर और चैन से मुझे पैग लगाने दे।"

मैने फ़जीहत से बचने के लिये अपने मित्र की ओर देखा। पर वह तो चैन से मजा ले रहा था। अब मुझे समझ में आया। ये सारा युद्ध प्रायोजित था  मै और मालिक साहब रोमन ग्लेडिएटर की तरह उसके मजे के लिये लड़ रहे थे। मैने प्रतिरोध किया-" मालिक साहब देशभक्ती भी कोई चीज है कि नहीं। मालिक साहब बोले- "है क्यो नही दवे जी। हम लोग दाल में नमक की तरह उसको भी इस्तेमाल करते हैं। तभी तो ये देश आज बचा हुआ है। राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले मे हम कोई समझौता नही करते। अरे भाई अगर देश ही नही रहेगा तो फ़िर तो हम ऐश कैसे करेंगे। पर भाई लोगो को जब इंडिया टीवी मे भूत प्रेत देखने में मजा आ रहा है तो कोई क्यो खोजी पत्रकारिता कर अपना जीवन बरबाद करे।"

 अब तक पांच राउंड हो चुके थे और हम और मालिक साहब  गहरे मित्र भी बन चुके थे। मालिक साहब बोले- यार वैसे तू बंदा बड़ा जोशीला है। तुझे व्यस्त न किया गया और सरकारी माल न दिया गया तो  नक्सली नेता बन जायेगा और फ़ोकट में मारा जायेगा। एक काम कर भाई  कल से मेरे आफ़िस आजा। दिन भर यहां वहां से सामग्री चुराना और जरा जोश भर के उसमे हेर फ़ेर कर देना। तू भी खुश रहेगा और मुझे भी चैन से पीने और जीने देगा।"

 मालिक साहब के विदा होने के बाद मैने दोस्त को धिक्कारा- " धुर कमीना है तू। अपने ही दोस्तो को इनवाईट कर आपस में लड़ा कर मजा लेता है।  मित्र भी दार्शनिक बन गया- " मालिक साहब की बात भूल गया। कोई भी चीज फ़ोकट में नही मिलती बेटा।  दारू का खर्चा मैने किया था तो मजे लेने के लिये ही न।"

अरुणेश जी के ब्लॉग से साभार: ब्लॉग पर जाने के लिए यहां क्लिक करें.

Monday, March 25, 2013

अंग्रेजों का वहशीपन और 'शहादत में ही हमारी जीत है: भगत सिंह'


मुंबई। 23 मार्च 1931 को शाम 7.30 बजे भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को लाहौर जेल में फांसी दे दी गई थी। भगत सिंह की उम्र वक्‍त महज 23 साल थी, लेकिन इतनी सी उम्र में उन्‍हें पता था कि बिखरे हुए भारत को कैसे एकसाथ खड़ा किया जा सकता है। वो हमेशा कहा करते थे,‘हमारी शहादत में ही हमारी जीत है।’ भारत की आजादी के लिए जो वह सोचते थे उस पर उन्‍हें पूरा भरोसा था और उन्‍होंने बिना हिचक अपनी जिंदगी दांव पर लगा दी। ऐसा नहीं था कि उन्‍होंने जोश में ये कदम उठाया था बल्कि वह जानते थे कि उनकी शहादत से ही देश के लिए आजादी का रास्‍ता खुलेगा। भगत सिंह ने महात्‍मा गांधी का सम्‍मान किया, लेकिन कई मामलों पर उनके मतभेद थे ये बात सभी जानते हैं, लेकिन 23 साल के भगत सिंह उस समय अंग्रेजों के लिए महात्‍मा गांधी से भी बड़ी चुनौती बन गये थे। भगत सिंह ने बिना कोई पद यात्रा किए, बिना हजारों लोगों को जुटाए सिर्फ अपने और चंद साथियों के दम अंग्रेजों को लोहे के चने चबाने को मजबूर कर दिया था। शायद यही कारण रहा कि अंग्रेजों ने न केवल उन्‍हें फांसी पर चढ़ाया बल्कि उनके शवों को भी क्षत-विक्षत किया और टुकड़ों में शवों को काटकर अधजली हालत में सतलुज नदी में बहाया गया। आइये जानते हैं 23 मार्च 1931 के दिन आखिर क्‍या हुआ था?      

11 घंटे पहले लिया गया फांसी का फैसला

अंग्रेज सरकार भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी देने का मतलब अच्‍छी तरह से जानती थी। उसे पता था कि इन तीनों नौजवानों को फांसी देने से पूरा देश उठ खड़ा होगा, लेकिन उसे ये भी पता था कि अगर ये तीनों जिंदा रहे तो जेल में बैठे-बैठे ही क क्रांति का बिगुल बजा देंगे, इसलिए भगत सिंह को फांसी देने के लिए पूरा सीक्रेट प्‍लान तैयार किया गया और 23 मार्च यानी फांसी के दिन से सिर्फ 11 घंटे पहले ये तय किया गया कि भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु को कब फांसी देनी है। अंग्रेज सरकार ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को उसी दिन फांसी की खबर दी, जिस दिन उन्‍हें फांसी पर चढ़ाया जाना था।

शाम 7.33 बजे दी गई फांसी 

23 मार्च 1931 को शाम में करीब 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फांसी दे दी गई। फांसी पर जाने से पहले वे लेनिन की नहीं बल्कि राम प्रसाद बिस्मिल की जीवनी पढ़ रहे थे। कहा जाता है कि जेल के अधिकारियों ने जब उन्हें यह सूचना दी कि उनके फांसी का वक्‍त आ गया है तो उन्होंने कहा था- ठहरिये! पहले एक क्रान्तिकारी दूसरे से मिल तो ले। फिर एक मिनट बाद किताब छत की ओर उछाल कर बोले -ठीक है अब चलो।

रात के अंधेरे में शवों के साथ वहशियाना सलूक 

अंग्रेजों ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी खबर को बहुत गुप्‍त रखा था, लेकिन फिर भी ये खबर फैल गई और लाहौर जेल के बाहर लोग जमा होने लगे। अंग्रेज सरकार को डर था कि इस समय अगर उनके शव परिवार को सौंपे गए तो क्रांति भड़क सकती है। ऐसे में उन्‍होंने रात के अंधेरे में शवों के टुकड़े किये और बोरियों में भरकर जेल से बाहर निकाला गया। शहीदों के शवों को फिरोजपुर की ओर ले जाया गया, जहां पर मिट्टी का तेल डालकर इन्‍हें जलाया गया, लेकिन शहीद के परिवार वालों और अन्‍य लोगों को इसकी भनक लगी तो वे उस तरफ दौड़े जहां आग लगी दिखाई दे रही थी। इससे घबराकर अंग्रेजों ने अधजली लाशों के टुकड़ों को उठाया और सतलुज नदी में फेंककर भाग गये। परिजन और अन्‍य लोग वहां आए और भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के शवों को टुकड़ों को नदी से निकालाकर उनका विधिवत अंतिम संस्‍कार किया।

शहादत के बाद भड़की चिंगारी 

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत की खबर को मीडिया ने काफी प्रमुखता से छापा। ये खबर पूरे देश में जंगल की आग तरह फैल गई। हजारों युवाओं ने महात्‍मा गांधी को काले झंडे दिखाए। सच पूछें तो देश की आजादी के लिए आंदोलन को यहीं से नई दिशा मिली, क्‍योंकि इससे पहले तक आजादी के कोई आंदोलन चल ही नहीं रहा था। उस वक्‍त तो महात्‍मा गांधी समेत अन्‍य नेता अधिकारों के लिए लड़ रहे थे, लेकिन भगत सिंह पूर्ण स्‍वराज की बात करते थे, जिसे बाद में गांधी जी ने भी अपनाया और हमें आजादी मिल सकी।

साभार: हिंदी.इन.कॉम

Thursday, February 14, 2013

O Mera Tharki India ... A must watch video.

O Mera Tharki India ... A must watch video.

Mombatiyan Jalane se kuch nahi hoga mere bhai, kuch nahi badalne yahan pe, apne dimag ki batti jalao.......

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Monday, February 4, 2013

My Dream will never Die!


My Dream will never Die

I have a Dream.
I dream Big.
I mean to me it is Big.As I always(everyone else too)see myself fallen into gutter but head held high-UP to the unbarred sky,if one thinks sky is the limit.

That clearly depicts me as
 Small and Coward Man
                ...or
 rather only Coward !
Because now-a-days 'Man' are only those creatures who are ABLE -

to courageously (seem to)burst their 'Man'-ly chest before Mass(As Weakness is tagged to the Mass with a 'man' like me inside it)..

to put their unapologetic views competitively at the front-most end.Visible.Vocable.Viable. ..

And

to place their incorrigible and stout 'Man'-ly organ into Wo-'Man' Miraculously Unguarded Vagina.
Wo-Man with Owo factor or just O(zero) factor..

                Back to the much lively and poetic audacity of Life.
                I still have Dream.
                      Had it
                      Dreamt it,
                       Cherished it,
     Not Lived it(yet)
     and
      waiting for it to be Perished.


Lastly a feeble and stupid Coward says :
But I will not stop dreaming. Its like  Mother without Child.
                                                                       Smile without Teeth.
                                                                       Politics without Corruption.
                                                                       Sex without Copulation.
                                                                       Life without Love.


यह लेख जीवन एक संघर्ष के लिए epatrakaar@gmail.com पर प्राप्त हुआ है, लेखक ने अपना नाम या पहचान सार्वजनिक न करने की अपील की है, उनकी भावनाओं को सम्मान देते हुए उनकी किसी भी प्रकार की पहचान उजागर नहीं की जा रही है! 
@ बिना अनुमति प्रकाशन अवैध. 9871283999. Powered by Blogger.

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