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Friday, October 11, 2013

वो सचिन का “असर” था...ये सचिन का “असर” है !

आगे बढ़ने से पहले..
मनीष शर्मा
(स्पोर्ट्स हेड: महुआ न्यूज)
बात 1995-96 की है| मैं उत्तर प्रदेश स्पोर्ट्स कॉलेज (लखनऊ) में था| दीपावली की छुट्टियों पर घर आया हुआ था| रिश्तेदारों, मुहल्ले और आस-पास के इलाकों में नाम हो चला था| मेरी माता, जिनकी पृष्ठभूमि पूरी तरह से ग्रामीण है, और जिनके लिए क्रिकेट का मतलब काला अक्षर भैंस बराबर था, का इसी वजह से खेल में इंट्रेस्ट पैदा हुआ| भारत का कोई मैच चल रहा था और सचिन आउट हो गए| मेरे मुंह से निकला: 

“ओह शिट, सचिन आउट हो गया....”

मम्मी ने खाना बनात-बनाते कहा;

“कोई बात नहीं सचिन आउट हो गया..तेंदुलकर तो बाकी है न, वो मैच जिता देगा”

ये वो बात है, जिसे लेकर आज भी मम्मी की खिंचाई करते हैं...

बहरहाल, ये वो दौर था, जब सचिन कमोबेश हर दिन हिंदुस्तान के घर-घर (गांव के दूर दराज के एरिया में भी) में चर्चा का विषय बन चुके थे...उनकी आभा एक नया मुकाम गढ़ने की ओर बढ़ रही थी...वो मां-बाप भी अपने बच्चों में सचिन को ढूंढने लगे थे, जिन्हें न क्रिकेट समझ में आती थी, न ही जिनकी खेल में तनिक भी रुचि थी| लेकिन सचिन ने ऐसे ही न जाने कितने लाखों-करोड़ों लोगों का क्रिकेट से परिचय ही नहीं कराया, बल्कि खेल का और अपना मुरीद भी बना दिया....इसमें उन घरेलू महिलाओं की संख्या भी बहुत बड़ी तादाद में थी, जिनकी दुनिया टीवी सीरियलों या रसोईघर तक ही सीमित थी....ये सचिन का असर था...

भारत तेजी से (उस दौर में) में आर्थिक तरक्की की ओर अग्रसर था और उदारीकरण के बाद अगर बाजार, या विदेशी कंपनियां और ज्यादा क्रिकेट पर मेहरबान होना शुरू हो गए, तो उसमें सचिन का असर सबसे बड़ा था...धोनी आज भले ही भारतीय बाजार और ब्रांड्स (विज्ञापनों) के बादशाह बने हुए हैं, लेकिन सच ये है कि इसकी नींव करीब डेढ़ दशक पहले सचिन ने ही रखी थी।

सचिन का पहली बार जब साल 1995 में वर्ल्ड टेल से करोड़ों का करार हुआ, तो वो मां-बाप जिनकी जुबां पर एक ही मुहावरा रहता था- “पढ़ोगे लिखोगे, बनोगे नवाब’, खेलोगे कूदोगे बनोगे खराब, बच्चों को खुद मैदान पर लेकर पहुंचने लगे....बेटे के सचिन बनने की उम्मीदों के साथ..ये सचिन का असर था.

वो भी समय आया, जब भारतीय टीम की जीत और सचिन और एक-दूसरे के पूरक बन गए...वो भी समय था, जब सचिन का चलना टीम की जीत होता था...सचिन का जल्द आउट होने का मतलब था टीम की हार....ऐसे भी करोड़ों क्रिकेटप्रेमी थे, जो सचिन के आउट होते ही टीवी का स्विच ऑफ यकर देते थे...ये दौर लंबे समय तक चला...और ये वो दौर (अच्छा खासा) था, जब सचिन वास्तव में खेल से बड़े हो गए!!


शायद मैं गलत हो सकता हूं कि लेकिन सचिन ने अपनी सर्वश्रेष्ठ क्रिकेट (चरम परफॉर्मेंस, कंसिस्टेंसी) 95 से 2000 तक खेली...कई प्रथम श्रेणी (रणजी, दलीप ट्रॉफी) क्रिकेटरों को मैंने सचिन की तकनीक की नकल करने पर घंटों पसीने बहाते देखा...कई क्रिकेटरों का करियर सचिन की नकल करते-करते खत्म हो गया...ये कहते कहते- “देख, सचिन की तरह ही खेला न ये शॉट”...ये सचिन का असर था, लाख कोशिशों के बावजूद इक्का दुक्का क्रिकेटर सचिन की तकनीक के आस-पास पहुंच पाने में कामयाब रहे..मसलन वीरेंद्र सहवाग। ये सचिन का असर था.....करोड़ों बच्चे मैदान पर सचिन बनने पहुंचने...कभी नहीं ही बन सकते थे...लेकिन टीम इंडिया को सहवाग मिल गए.. विराट कोहली मिल गए...ये सचिन का ही असर है...अब सचिन क्रिकेट से जा रहे हैं....ड्रेसिंग रूम में, भारतीय क्रिकेट में इससे बहुत ही बड़ा शून्य पैदा हो जाएगा??...क्या ये कभी भर पाएगा???...क्या हमारे मरने तक???.....क्या अगले सौ-डेढ़ सालों तक??........ये सचिन का असर है....और ये असर हमेशा रहेगा!!...ब्रह्मांड में क्रिकेट के अस्तित्व तक जब भी बड़े परिप्रेक्ष्य में क्रिकेट पर गंभीर चर्चा होगी, तो सचिन के इस असर की चर्चा अनिवार्य रूप से होगी ही होगी और करनी पड़ेगी...क्योंकि बिना इस चर्चा के क्रिकेट की हर बाइबल, महाभारत और क्रिकेट का हर ग्रंथ अधूरा रहेगा...धन्यवाद सचिन बहुत बहुत धन्यवाद...इतना ढेर सारा आनंद और गौरव देने के लिए...!

Sunday, July 14, 2013

गोधराकांड और गुजरात दंगों में 'मोदी सरकार' की कार्यशैली पर बड़ा खुलासा by AAJTAK

श्रवण शुक्ल
2002 के दंगों को लेकर न्यूज चैनल 'आजतक' ने जबरदस्त खुलासा करते हुए एसआईटी और गुजरात सरकार को जबरदस्त चुनौती पेश की है. हालांकि यह रिपोर्ट अब इतने समय के बाद 'आजतक' ने क्यों जाहिर की इसपर बहस की जा सकती है. कुछ दिन पहले तक यही आजतक मोदी की अगवानी और अपने कार्यक्रमों में मुख्य वक्ता के तौर पर उन्हें प्रतिष्ठापित करने में व्यस्त था. इस बात पर एक और शंका सामने आती है कि कहीं कांग्रेस द्वारा अगले चुनावों के लिए जारी किए गए 500 करोड़ के बजट से करोडो रूपए आजतक के हिस्से में मोदी को बदनाम करने के लिए तो नहीं दी गए, ताकि नरेद्र मोदी को गुजरात दंगों के सच को सामने लाकर फिर से रोका जा सके.. मामला चाहे जो कुछ भी हो, लेकिन रिपोर्ट महत्वपूर्ण है. हम सच्चाई को सामने लाने के लिए 'आजतक' का शुक्रिया अदा करना चाहते हैं, लेकिन यदि यह पैसे  के दम पर मोदी को बदनाम करने के लिए है तो इसकी भर्त्सना भी करते हैं, कि आखिर पूरी 11 साल बाद आजतक के पार यह दस्तावेज कहाँ से आए? पढ़िए पूरी खबर.. 
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श्रवण शुक्ल
9871283999

न्यूज चैनल ‘आज तक’ की खबर के अनुसार.....  
27 फरवरी, 2002 को सुबह 7:43 बजे पर अयोध्या से लौट रहे तीर्थयात्री साबरमती एक्सप्रेस गोधरा स्टेशन पर पहुंचे, जैसे ही ट्रेन चलने लगी, कुछ यात्रियों ने चैन खींचकर इमरजेंसी ब्रेक लगा दिया, क्योंकि ट्रेन के कोच नंबर एस-6 और एस-7 में आग लग गई थी। इस हत्याकांड में 59 लोगों की जलने के कारण मौत हो गई थी। यह कांड ‘गोधरा कांड’ के नाम से काले इतिहास में अंकित हो गया और इसके गुजरात भयानक दंगे ने 1 हजार 44 लोगों की जान ले ली।
गुजरात में भाजपा के बहुत से नेताओं का दावा है कि दंगे तो गोधरा कांड की स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी। मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने 5 मार्च को एक इंटरव्यू में कहा कि गोधरा की स्वाभाविक प्रतिक्रिया में दंगे हुए। हम गोधरा और उसके बाद जो कुछ हुआ, उसकी संयुक्त जांच कराएंगे।
मार्च, 2002 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) की ऑल इंडिया जनरल काउंसिल की बैठक में एक प्रस्ताव पास हुआ। उस प्रस्ताव में गोधरा के बाद फैली हिंसा कोसाबरमती एक्सप्रेस में लगी आग का स्वाभाविक और सहज प्रतिक्रिया बताया गया, लेकिन वह दंगा लोगों के गुस्से का तत्काल नतीजा नहीं था। दंगा भड़कने से काफी पहले ही विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) के नेता भीड़ को भड़का रहे थे और पुलिस भी उस खतरनाक साजिश से वाकिफ थी, जो उस वक्त रची गई थी।
न्यूज चैनल ‘आज तक’ को पुलिस कंट्रोल रूम के संदेश और प्रदेश के इंटेलिजेंस ब्यूरो की रिपोर्ट मिली हैं, जिन्हें गोधरा कांड के तुरंत बाद तैयार किया गया था। अप्रैल, 2011 में पुलिस कमिश्नर पी.सी. पांडे ने इन रिपोर्टों को स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम के समक्ष पेश किया। पांडे वर्ष 2002 के दंगों के समय अहमदाबाद के पुलिस कमिश्नर थे। सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल 7 फरवरी को गुजरात सरकार को ये निर्देश दिया कि वह सभी पीसीआर रिकॉर्ड्स और खुफिया रिपोर्ट जाकिया जाफरी को सौंप दे, ताकि वे उस स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम के खिलाफ विरोध याचिका दायर कर सकें, जिसने गुजरात सरकार को क्लीन चिट दे दी थी।
28 फरवरी, 2002 को जाकिया जाफरी के पति और कांग्रेस सांसद एहसान जाफरी को 69 और लोगों के साथ गुलबर्ग सोसायटी में जिंदा जला दिया गया था। बाद में अपनी शिकायत में जाकिया ने दंगा बढ़ाने और भड़काने के लिए नरेंद्र मोदी और 57 दूसरे लोगों के खिलाफ मुकदमा चलाने की मांग की। फिर भी गुजरात सरकार की भूमिका की जांच करने वाली एसआईटी ने मार्च, 2012 में क्लोजर रिपोर्ट पेश कर दी। इस रिपोर्ट में दंगे को रोकने में नाकामी के लिए गुजरात सरकार की खिंचाई की गई थी, लेकिन एसआईटी को मोदी और दूसरे आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चलाने लायक सबूत नहीं मिल। इसी दौरान जाकिया जाफरी ने एसआईटी से नरेंद्र मोदी को मिली क्लीन चिट के खिलाफ एक विरोध याचिका दायर की।
इस मामले में पीसीआर रिकॉर्ड्स और स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो रिपोर्ट, जो ‘आज तक’ के पास हैं, वे सारे जाकिया जाफरी की ओर से दायर याचिका में शामिल हैं। एसआईटी के समक्ष गुजरात पुलिस ने ऑन रिकॉर्ड यह दावा किया है कि इन पुलिस वायरलैस मैसेजेज को हासिल नहीं किया जा सकता क्योंकि इन्हें नष्ट कर दिए जाने की आशंका है, लेकिन ये सच नहीं है।
वर्ष 2002 में अहमदाबाद में दो सेंट्रलाइज्ड पुलिस कंट्रोल रूम बनाए गए थे। शहर के बीचों-बीच स्थित शाहीबाग में अहमदाबाद पुलिस कंट्रोल रूम बनाया गया। 28 फरवरी को जिस नरोडा और गुलबर्ग सोसायटी में करीब डेढ़ सौ लोग जलकर मर गए, वे दोनों इलाके पुलिस कंट्रोल रूम के 6 किलोमीटर के दायरे में आते है। दूसरा, स्टेट पुलिस कंट्रोल रूम गांधीनगर के पुलिस भवन में स्थित है।
अहमदाबाद पुलिस कंट्रोल रूम को अहमदाबाद शहर में लोगों के जमावड़े का पूरा संदेश मिल रहा था, वही स्टेट कंट्रोल रूम को राज्य के अलग-अलग जिलों से संदेश प्राप्त हो रहे थे।
फरवरी, 2012 में एसआईटी ने अहमदाबाद कोर्ट में एक लिफाफाबंद रिपोर्ट पेश की, जिसमें सिर्फ अहमदाबाद सिटी पीसीआर के मैसेजेज हैं। उस रिपोर्ट की एक कॉपी ‘आज तक’ के पास है।
एक तीसरा कंट्रोल रूम भी था, वह गांधीनगर के पुलिस भवन के अंदर स्थित स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो के हैडक्वार्टर में था। यह वही बिल्डिंग है, जहां राज्य के डीजीपी बैठते हैं। इस एसआईबी कंट्रोल रूम में राज्यभर में फैली इसके खुफिया यूनिट्स की तरफ से भेजी गई इंटेलिजेंस रिपोर्ट्स आ रही थीं। इनमें अहमदाबाद और गांधीनगर की भी रिपोर्ट्स थीं.। ये एसआईबी रिपोर्ट्स भी एसआईटी की तरफ से कोर्ट में पेश हो चुकी हैं। इनकी भी एक कॉपी ‘आज तक’ के पास है।
27 फरवरी के दोपहर तक गुजरात सरकार के गृह विभाग के पास हर जगह की पुलिस से लगातार ये मैसेज आने लगे कि विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) और बजरंग दल के कैडर लामबंद हो रहे हैं। पूरे राज्य में दंगाई बैठकें करने लगे हैं। ये संगठन भड़काऊ भाषण देकर भीड़ को उकसाने लगे हैं। पुलिस ने स्टेट इंजेलिजेंस ब्यूरो को सैकड़ों वायरलेस मैसेजेज भेजे, जो सभी दस्तावेज में रिकॉर्ड हैं। जिन दस्तावेज को आपने पहले कभी नहीं देखा, वे भी ‘आज तक’ के पास हैं।
गोधरा त्रासदी के चंद घंटों के भीतर ही गुजरात वीएचपी के तीन वरिष्ठ नेता-जयदीप पटेल, दिलीप त्रिवेदी और कौशिक पटेल ने राज्यव्यापी बंद के लिए एक बयान जारी किया। 27 फरवर, 2002 को रात 8:38 बजे एक अधिकारी ने इस बयान को एसआईबी के हैडक्वार्टर में फैक्स किया था।
तारीख :27 फरवरी, 2002समय : रात 8:38 बजेस्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो : मैसेज नंबर/ पेज नंबर : 188 (एनेक्सचर:III, फाइल : XVIII)वीएचपी के महासचिव दिलीप त्रिवेदी और संयुक्त सचिव जयदीप पटेल और कौशिक मेहता ने बयान दिया। वीएचपी ने बंद का ऐलान किया। गुजरात बंद कार सेवकों के मारे जाने के विरोध में है। बयान में कहा गया है कि गोधरा हमले के लिए मुसलमानों ने पहले से तैयारी कर रखी थी। इसके तहत निशाना बनाकर महिलाओं से छेड़छाड़ की गई और बोगियों में आग लगा दी गई, साथ ही रामसेवकों को जिंदा जला दिया। 27 फरवरी को पूरे दिन एसआईबी कंट्रोल रूम को वे मैसेजेज मिलते रहे, जिनमें वीएचपी की भड़काऊ नारेबाजी और लोगों को लामबंद करने की बात थी।
तारीख : 27 फरवरी 2002स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो : मैसेज नंबर/पेज नंबर : 345ऑर्डर नंबर : 24 (एनेक्स्चर : III फाइल : XIX)भेजने वाला : डीओ, अहमदाबादपाने वाला : इंटेलिजेंस ऑफिस, विरनगाम (अहमदाबाद)विरनगाम टाउन चाली और गोलवाड़ा इलाके में वीएचपी और बजरंग दल के 75 सदस्य एकत्र हुए। इलाके में हालात बेहद तनावपूर्ण।
तारीख : 27 फरवरी, 2002, समय : शाम 6:10 बजेस्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो मैसेज नंबर : 531पेज नंबर : 19 (एनेक्स्चर : III, फाइल : XVIII (डी-160)
गोधरा से आने वाली साबरमती एक्सप्रेस अहमदाबाद स्टेशन पर शाम साढ़े चार बजे पहुंची। रॉड और लाठी से लैस कारसेवकों की नारेबाजी- ‘खून का बदला खून’समय : रात : 10:12 बजेभावनगर सीआईडी, इंटेलिजेंस के पुलिस इंस्पेक्टर ने गांधीनगर में गुजरात स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो के इंस्पेक्टर जनरल को एक फैक्स भेजा। इसमें कहा गया कि साधु समाज के अध्यक्ष गोपाल नंद और स्थानीय वीएचपी नेताओं ने जूनागढ़ में भीड़ को बदला लेने के लिए उकसाया। मैसेज में कहा गया कि वीएचपी नेताओं ने नफरत फैलाने वाले भाषण दिए और लोगों को एकजुट होने के लिए कहा।
तारीख :27 फरवरी, 2002, समय : रात 10:12 बजेस्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो फैक्स मैसेज: 311/02पेज नंबर : डी-1/ एचए/जहर सभा/जूनागढ़भेजने वाला : सीआईडी, भावनगरपाने वाला : आईजी, गुजरात और इंटेलिजेंस ब्यूरो, गांधीनगर
साधु समाज के अध्यक्ष गोपाल नंद ने जूनागढ़ कदवा चौक पर शाम साढ़े सात बजे से रात 9:00 बजे के बीच भड़काऊ भाषण दिया। गोपाल नंद ने ट्रेन में आग लगने के 12 घंटे बाद भी हिंदुओं की ओर से जवाब नहीं दिए जाने पर सवाल उठाया। गोपाल नंद ने भारत के प्रति खास वर्गों की देशभक्ति पर सवाल खड़ा किया और भीड़ को हमला करने के लिए उकसाया। 27 तारीख की दोपहर तक दंगे भड़क गए।
तारीख : 27 फरवरी 2002, समय : शाम 5:45 बजेस्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो : फैक्स मैसेज : 273फाइल : -XIX एनेक्सचर : IIIभेजने वाला : बी.एम. मोहित आनंद सेंटर
साबरमती एक्सप्रेस दोपहर 3:00 आणंद रेलवे स्टेशन पर पहुंची। कारसेवकों ने स्टेशन पर मौजूद एक खास वर्ग के चार लोगों को छूरा घोंप दिया। आनंद के एक 65 वर्षीय निवासी अब्दुल राशिद की मौत। बाकी सभी आणंद सरकारी अस्पताल में भर्ती।पूरे राज्य से कारसेवकों की ओर से हिंसक हमलों की रिपोर्ट आने लगी। हिंसा का एक दूसरा केंद्र बन रहा मोदासा के वडाग्राम में वीएचपी के कार्यकर्ताओं की भीड़ जमा होने लगी। अतिरिक्त सुरक्षा के लिए आपातकालीन संदेश लगातार आने लगे। पूरी भीड़ रातभर क्रोध की चरम सीमा पर थी। आक्रोषित लोग घरों और गाड़ियों में आग लगा रहे थे।
तारीख : 27 फरवरी 2002, समय : रात 11: 59 बजेस्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो फैक्स मैसेज : Com/HM/550/ Out No. 398भेजने वाला : एसीपी, गांधीनगर रीजनपाने वाला : आईजी, गुजरात और इंटेलिजेंस ब्यूरो, गांधीनगर
अहमदाबाद से 50 कार सेवक स्पेशल बस में सवार होकर शाम 6:30 बजे मोदासा के वड़ाग्राम में पहुंचे। 500 लोगों की भीड़ ने कारसेवकों की अगवानी की। कारसेवकों ने भीड़ को साबरमती एक्सप्रेस कांड के बारे में अटैक के बारे में बताया। रात 9:30 बजे तक भीड़ में शामिल लोगों की संख्या हजारों तक पहुंच गई। हालात पर काबू पाने में वहां मौजूद पुलिस नाकाफी थी. एक खास वर्ग की दस दुकानें और कई गाड़ियों में भीड़ ने आग लगा दी।
इन तमाम चेतावनी के बावजूद गुजरात सरकार की तरफ वीएचपी नेताओं और उनकी लामबंदी को रोकने की कोई पहल नहीं हुई और न ही वीएचपी और बजरंग दल के सदस्यों को हिरासत में लिया गया। स्पेशल इन्वेट्सिटगेशन टीम ने अपनी रिपोर्ट में कबूल किया कि वीएचपी के बंद को मोदी सरकार का समर्थन हासिल था। एसआईटी की क्लोजर रिपोर्ट के पेज नंबर 134 में लिखा है कि गृह विभाग के अंडर सेक्रेट्री विजय बढ़ेका ने एसआईटी के सामने कहा कि 28 फरवरी, 2002 का गुजरात बंद और 1 मार्च, 2002 का भारत बंद-दोनों को ही बीजेपी का समर्थन था।
बंद ने वीएचपी को मनमानी की खुली छूट दे दी, बावजूद इसके कि एसआईबी दंगे शुरू होने के संकेत दे रहा था और इन्हें रोकने के लिए जरूरी कदम उठाने की मांग कर रहा था।
तारीख : 28 फरवरी 2002, समय: सुबह 9:00 से 10:00 बजे के बीचस्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो : मैसेज नंबर: 73/02पेज नंबर : 365 ((Anne & ure III File XXI (D-166)भेजने वाला : एसीपी (इंटेलिजेंस), सूरतवीएचपी और बीजेपी नेताओं ने वापी शहर के सरदार चौक पर भड़काऊ भाषण दिए। वीएचपी के दिनेश बेहरी, बजरंग दल के आचार्य ब्रह्मभट्ट, बीजेपी के जवाहर देसाई और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के विनोद चौधरी भी मौजूद थे। भड़काऊ भाषण देने वाले भीड़ को गोधरा का बदला लेने के लिए उकसा रहे थे।
तारीख : 28 फरवरी 2002, समय: सुबह 9:24 बजेस्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरोपेज नंबर : 37 (Anne & ure III, File XVIII, D-160)पाने वाला : एसीपी, इंटेलिजेंस, अहमदाबाद रीजनबजरंग दल और वीएचपी के सदस्य अल्पसंख्यकों पर हमले के लिए मोटरसाइकिलों पर घूम रहे हैं। वीएचपी और बजरंग दल के सदस्य धारदार हथियारों से लैस हैं।तारीख : 28 फरवरी 2002, समय- सुबह 10:53 बजेस्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरोपेज नंबर :12 (Anne & ure III, File XVIII, D-160)पाने वाला : एडीजीपी, गांधीनगर
भाजपा नेता मनोज भाई, वीएचपी नेता शैलेश केला और बजरंग दल नेता धर्मेंद्र खत्री भीड़ की अगुवाई कर रहे हैं। ये नेता हिंसा में लिप्त हैं, जबरन बंद करा रहे हैं। जब अहमदाबाद पुलिस कमिश्नर पी.सी.पांडे और राज्य के डीजीपी के चक्रवर्ती से एसआईटी ने पूछताछ की, वे लोग इन एसआईबी रिपोर्ट्स का मुकम्मल जवाब नहीं दे पाए। 24 मार्च, 2010 को एसआईटी के समक्ष दिए अपने बयान के पेज नंबर 7 पर पांडे ने कहा है कि 27 फरवरी, 2002 या 28 फरवरी, 2002 को ऐसी परिस्थिति नहीं थी कि कर्फ्यू लगाया जाए और जल्दबाजी में उठाया गया कोई भी कदम शहर में तनाव बढ़ाता। दूसरी तरफ सीमित बल के साथ कर्फ्यू लागू करने से शहर में गंभीर समस्या खड़ी होती और लोग बार-बार कर्फ्यू का उल्लंघन करते।
राज्य सरकार ने एसआईटी के समक्ष कहा कि वर्ष 2002 का गुजरात दंगा गोधरा त्रासदी की त्वरित प्रतिक्रिया थी, लेकिन दस्तावेजी सबूत कुछ अलग कहानी ही बयां करते हैं। पीसीआर और एसआईबी संदेश ये बता रहे हैं कि राज्य प्रशासन को लगातार खुफिया चेतावनी आ रही थी, जिसमें व्यवस्थित तरीके से दंगा शुरुरू होने के संकेत मिल रहे थे, लेकिन इस पर कार्रवाई करने में सरकारी तंत्र नाकाम रहा।
राज्य का खुफिया ब्यूरो लगातार खतरे की घंटी बजाता रहा। गृह विभाग को दंगा भड़कने की आशंका को लेकर संकट भरा संदेश भेजता रहा। कारसेवकों के शव को लेकर प्रदर्शन शुरू हो गया, लेकिन रिकॉर्ड बताते हैं कि वीएचपी और उसके कार्यकर्ता भीड़ का उन्माद बढ़ाने में जुटे रहे।
28 फरवरी, 2002 को रात के करीब 12:30 बजे राज्य खुफिया ब्यूरो को एक फैक्स मिला, जिसमें अहमदाबाद में शव लाए जाने की हालत में दंगा भड़कने की आशंका को लेकर चेतावनी दी गई। उस वक्त वीएचपी की राज्य इकाई के अध्यक्ष जयदीप पटेल 54 कारसेवकों के शवों को लेकर गोधरा से अहमदाबाद के रास्ते में थे।
तारीख : 28 फरवरी 2002, समय : रात के 12:30 बजेस्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो का फैक्स नंबर- 525शवों को अहमदाबाद के कालूपुर रेलवे स्टेशन लाया जाएगा। शवों का अंतिम संस्कार किया जाएगा। वीएचपी ने बंद बुलाया है। अहमदाबाद में दंगा भड़कने की जबरदस्त आशंका है। रोकथाम के लिए कार्रवाई की जाए।
तारीख : 28 फरवरी, 2002राज्य खुफिया ब्यूरो ने गृह सचिव और सभी पुलिस कमिश्नर, सभी एसपी को रिपोर्ट भेजी। वीएचपी ने गुजरात बंद बुलाया, जरूरी निगरानी रखी जाए।कार सेवकों के शवों को लेकर वाहनों का काफिला सुबह के 3:34 मिनट पर आखिरकार अहमदाबाद के सोला सिविल अस्पताल पहुंच गया। सोला अस्पताल के बाहर वीएचपी और आरएसएस कार्यकर्ताओं की भीड़ पहले से ही एकत्र थी। सोला सिविल अस्पताल के बाहर तैनात पीसीआर वैन ने शहर के पुलिस कंट्रोल रूम को संदेश भेजा। अस्पताल और पुलिस कंट्रोल रूम के बीच की दूरी 11 किलोमीटर थी।
तारीख : 28 फरवरी 2002, समय: तड़के 4:00 बजेपृष्ठ संख्या : 5790 (एनेक्चर : IV, फाइल : XIV)आरएसएस के 3000 सदस्यों की भीड़ सोला अस्पताल के इर्द-गिर्द जमा हो गई।
तारीख : 28 फरवरी 2002, समय : सुबह 7:14 बजेपीसीआर वायरलैस संदेश (सोला अस्पताल)पृष्ठ संख्या : 5796 (एनेक्चर : IV, फाइल : XIV)सोला अस्पताल के करीब भीड़ जमा होने लगी। भीड़ बेकाबू होती जा रही थी और कभी भी हिंसा भड़कने का पूरा अंदेशा था।
तारीख : 28 फरवरी, 2002, समय : सुबह 7:17 बजेपीसीआर वायरलैस संदेश : (सोला अस्पताल)पृष्ठ संख्या : 5797 (एनेक्चर : IV, फाइल : XIV)500 लोगों की भीड़ ने ट्रैफिक रोक दिया।सुबह : 8:10 बजे कंट्रोल रूम से संदेश आया कि तीन एसआरपी कंपनियां सोला अस्पताल के लिए रवाना कर दी गईं।
तारीख : 28 फरवरी 2002, समय : सुबह 11:55 बजेपीसीआर वायरलैस संदेशपृष्ठ संख्या : 5894 (एनेक्चर : IV, फाइल : XIV)भीड़ ने गाड़ियों में आग लगा दी, हाईवे पर आगजनी ।
तारीख : 28 फरवरी, 2002, समय : सुबह 11:55 बजेपीसीआर मैसेज : स्टेट खुफिया ब्यूरोपेज नंबर : 6162 (एनेक्चर : IV, फाइल : XIV)सोला अस्पताल और हाईकोर्ट के करीब दंगा शुरू हो गया, जहां कारसेवकों के शव ले जाए गए।
तारीख : 28 फरवरी 2002, समय : उल्लेख नहींपीसीआर मैसेज (सोला अस्पताल)स्टेट खुफिया ब्यूरो : पेज नंबर : 6172सोला अस्पताल के कर्मचारियों को 500 लोगों की भीड़ ने घेर लिया। अस्पताल पर सुरक्षा के तुरंत इंतजाम करें। ये खुलासे बताते हैं कि कैसे भीड़ को अस्पताल के बाहर जमा होने दिया गया और हिंसा शुरू होने के बावजूद कर्फ्यू नहीं लगाया गया। जब पांडे एसआईटी के समक्ष पेश हुए तो उनसे यह नहीं पूछा गया कि पुलिस बल की मौजूदगी के बावजूद क्यों नहीं भीड़ को तीतर-बितर किया गया। पांडे ने एसआईटी के सामने अपने बयान में यह दावा किया कि उन्होंने सुबह के 10:00 बजे अस्पताल का दौरा किया और सबकुछ सामान्य पाया गया। पांडे ने एसआईटी के सामने यह भी दावा किया कि वहां गोधरा में मारे गए लोगों के लिए कोई अंतिम यात्रा नहीं निकाली गई, लेकिन पीसीआर से मिले संदेश साफ बताते हैं कि वहां न केवल अंतिम यात्रा निकाली गई, बल्कि अस्पताल के आस पास दंगा भी भड़का।
तारीख : 28 फरवरी 2002, समय : सुबह 11:58 बजेपीसीआर संदेश (सोला अस्पताल) : स्टेट खुफिया ब्यूरोपेज नंबर : 5907 और 5925 (एनेक्चर : IV, फाइल : XIV)10 कारसेवकों के शवों को लेकर अंतिम यात्रा रामोल जनतानगर से लेकर हटकेश्वर श्मशान घाट तक निकाली गई। अंतिम यात्रा में 6 हजार लोग शामिल थे। अंतिम यात्रा को पूरे शहर में घुमाया गया। भीड़ अहमदाबाद के गुलबर्ग सोसायटी, नरोदा पाटिया और नरोदा गाम के करीब बेकाबू होने लगी।
तारीख : 28 फरवरी 2002, समय : उल्लेख नहींपीसीआर संदेश : (खेडब्रह्मा, साबरकांठा) Com/538स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो : पेज नंबर : 258 (एनेक्चर : III, फाइल : XIX)कारसेवकों की अंतिम यात्रा साबरकांठा जिले के खेडब्रह्मा में निकालने की इजाजत दी गई। हालात तनावपूर्ण, खेडब्रह्मा में एक खास वर्ग के 2 लोगों को चाकू मारा गया।
तारीख : 28 फरवरी 2002, समय : दर्ज नहींपीसीआर संदेश (खेडब्रह्मा, साबरकांठा)स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो: पेज नंबर : 262 (एनेक्चर : III, फाइल : XIX)खेडब्रह्मा के रास्ते में 150 बजरंग दल के कार्यकर्ता।
तारीख : 28 फरवरी, 2002, समय : शाम 3:32 बजेपीसीआर मैसेज: (खेडब्रह्मा, साबरकांठा)स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो : पेज नंबर : 254, (एनेक्चर : III, फाइल : XIX) Com/574साबरकांठा में गोधरा कांड में मारे गए बाबूभाई पटेल की अंतिम यात्रा की इजाजत।
विशेष जांच दल ने अपने क्लोजर रिपोर्ट के पेज नंबर 59 से 64 के बीच अपनी रिपोर्ट दी कि वहां कोई अंतिम यात्रा नहीं निकाली गई और इसी आधार पर गुजरात सरकार को क्लीन चिट दी गई, लेकिन पीसीआर संदेश अहमदाबाद में दंगा भड़कने से पहले गुजरात सरकार की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल खड़े करते हैं

source: http://aajtak.intoday.in/story/aajtak-have-unseen-documents-gujrat-riots-1-727438.html 

Friday, March 22, 2013

‘खलनायक’ की जिंदगी वो 14 रातें, जो...


मुंबई। बात उन 14 दिनों की है, जब पहली बार संजय दत्त जेल गए थे। बॉलीवुड स्टार संजय दत्त को लगा कि जैसे जिंदगी बस खत्म हो गई है। जेल की एक छोटी सी खिड़की से बाहर वो आखिर क्या देखते थे और क्यों जेल में चाय वाले से संजय दत्त रश्क करते थे। 1981 में संजू बाबा की पहली फिल्म रॉकी जब रिलीज हुई तो रिलीज से तीन दिन पहले ही उनकी दोस्त उनकी मां नरगिस इस दुनिया को अलविदा कह गईं। अल्हड़ जिंदगी- हथियारों से लगाव-बिगड़ैलपना, लेकिन फिर भी चेहरे पर मासूमियत। जो भी हो इस फिल्मी खलनायक की जिंदगी उन 14 दिनों में बदल गई जब उसे पहली बार फिल्मी जेल नहीं असली जेल देखी-जब लाइट-कैमरा-एक्शन के बगैर उन्हें सलाखों के पीछे रात-दिन काटने पड़े। जब पहली बार संजय दत्त जेल गए।
1993 में विदेश में शूटिंग से लौटती ही वो पहले 14 दिन जैसे नर्क की तरह थे। एक इंटरव्यू में संजय दत्त ने उस नर्क को पूरी बारीकी के साथ जैसे दोबारा जिया। मुझे बेल नहीं मिलने का बेहद अफसोस था, यकीन नहीं हो रहा था, मैं टूट गया था भीतर तक। वो कुछ घंटे लगा जैसे मेरी जिंदगी खत्म हो गई थी। लगता था जैसे किसी भी तरह इन सलाखों के पीछे से निकल आऊं। संजय दत्त भले ही जिंदगी में अकेलेपन के शिकार रहे हों, और शायद इसी तन्हाई से लड़ने के लिए उन्होंने तीन शादियां कीं। लेकिन अपने पिता के साये से अलग - जेल की कोठरी में अकेले रात दिन रहना - उन्हें भीतर तक हिला गया। इसीलिए सलाखें जैसे काटने लगीं थीं। आसपास घूमते फिरते लोगों को देखकर जैसे संजय दत्त की सासें चलती थीं। मायूसी के अंधेरे में वो डूबने लगे और उसी वक्त रौशनी की किरण जेल की कोठरी में मौजूद एक छोटी सी खिड़की से आई।
संजू जैसे उस एक खिड़की की बलायें लेते हैं। एक छोटी सी खिड़की थी वहां। वहां से आते-जाते लोग दिखते थे मुझे। आती-जाती कारें, एक दुकान से दूसरी दुकान की ओर भागते लोग, खरीदारी करते लोग, उस वक्त यकीनन ये अहसास हुआ कि आजादी क्या होती है। एक ऐसा अभिनेता जो सुबह नींद से उठने से लेकर रात में सोने तक लोगों से घिरा रहता, जिसके नखरे उठाए जाते, जिसे बेतरह लाड पाने की आदत पड़ चुकी थी, उस इंसान को अब एक छोटी सी खिड़की जैसे जिंदगी दे रही थी। शायद इसीलिए संजय दत्त के करीबी उन्हें कभी पीटर पैन कहते जिसमें लड़कपन था। शोखी थी तो कभी एंग्री मैन कहते जो बिगड़ता था तो बस खुद का ही नुकसान करने पर आमादा हो जाता। लेकिन यहां जेल के भीतर न कोई पूछने वाला न कोई परखने वाला। न हर मुश्किल में दीवार की तरह साथ खड़े होने वाले पिता का ही हाथ। ऐसे में एक चाय वाला इस अभिनेता को असली कर्कश जिंदगी में उम्मीद बंधाए रखता-वो भी बिना कुछ बोले या कहे।
संजू बाबा की स्मृतियों में वो इंसान कैद हो गया। 1993 से लेकर शायद आज तक। एक इंसान जेल में रोज मुझे चाय देने के लिए आता था। मैं रोज उसे एक टक देखता और कल्पना करता कि काश मैं वो चायवाला बन जाऊं। मस्त घूमते हुए आऊं, चाय दूं और बाहर चला जाऊं, बाहर जहां आजादी थी, जिंदगी थी। यूं ही दिन बीतते गए - सुबह होती और धीरे धीरे शाम ढल जाती, ये शाम संजय दत्त पर सबसे भारी पड़ती। लोगों से घिरे रहने वाले इस अभिनेता को वो वक्त तन्हाई में गुजारना पड़ता। ये वो वक्त था जब जेल की बैरक के दरवाजों पर ताला जड़ दिया जाता। लेकिन उसी वक्त संजू बाबा के कानों में गाने की आवाजें सुनाई पड़तीं। शायद आजू बाजू के कैदियों को उनकी फिक्र थी। ये वो दौर था जब संजय दत्त की कई सुपरहिट फिल्में रिलीज हो चुकी थीं। जेल में शाम 530 बजे रात का खाना दे दिया जाता था और 6 बजते-बजते बैरक के गेट बंद हो जाते। उसके बाद बैरकों में बंद कैदी गाना गाने लगते। कई बार मेरी फिल्मों के ही गाने होते थे। उस वक्त की मेरी फिल्म सड़क के गाने उन्हें पसंद थे, अक्सर वो ही गाते थे। और मैं आंखें बंद कर लेट जाता और बस वो गीत सुनता रहता।
जाहिर है कैद के उन 14 दिनों ने संजय दत्त को एक नया इंसान बना डाला। एक ऐसा इंसान जो शायद पहली बार उस अकेलेपन में खुद अपने आप से मिला जिसने दूसरे इंसानों, उनकी मजबूरियों, उनके जज्बातों को बेहद करीब से देखा। जो अपने परिवार से अलग-अपने ही देश में उनसे जुदा रहा, न सितारों की फौज, न कैमरा न लाइट, यहां तो अंधेरा था - असली, ठंडी सलाखें थीं और आम कैदी की जिंदगी थी। शायद इसी मजबूरी ने संजय दत्त को धर्म की ओर मोड़ दिया। मैं ईश्वर में यकीन रखता हूं, लेकिन मैं व्रत रखना या चालीसा पढ़ने वाला भक्त नहीं था। लेकिन मैंने जेल में शिव चालीसा पढ़ी, अब भी पढ़ता हूं। अब मैं हनुमान चालीसा पढ़ता ही नहीं हूं, हर सोमवार-शनिवार को व्रत भी रखता हूं। इतना ही नहीं मैं हनुमान मंदिर भी जाता हूं। मुझे अब लगता है जैसे मैं पहले से ज्यादा मजबूत हूं। लगता है जैसे कोई मेरी रक्षा कर रहा है अब। लगता है जैस अब मेरे साथ कुछ और बुरा नहीं होगा, लेकिन शायद 1993 के उस दौर में संजय दत्त को इस बात का अहसास तक नहीं था कि बुरे दौर की तो शुरुआत थी, उनकी जिंदगी हिचकोलों से भरी थी और आने वाले बीस सालों तक ये उठापटक जारी रहेगी। मगर, उस वक्त तो संजू बाबा को अपनी मां की याद आती थी - वो पहले 14 दिन जेल में काटकर निकलने के बाद दिए पहले और इकलौते इंटरव्यू में उन्होंने साफ कहा कि अगर मां जिंदा होतीं तो न जाने क्या करतीं।
मां को पता चलता तो बहुत दुख होता उन्हें, वो तो पूरी दुनिया सिर पर उठा लेतीं। उन्होंने मेरे लिए जिंदगी में सब कुछ किया था। वो सीधी-सपाट महिला थीं जो लाग-लपेट नहीं करती थीं। जो कुछ भी बोलतीं मुंह पर बोलती थीं, उन्हें जो लोग पसंद थे वो बस पसंद थे और जो नापसंद वो उनकी नजरों में कभी टिक नहीं सकते थे। कई बार तो वो लोगों को बाहर भगा देतीं थीं और हमें बड़ी शर्मिंदगी महसूस होती थी। लेकिन वो ऐसी ही थीं और मेरे पिता तो मेरी प्रेरणा रहे हमेशा। उऩ 14 दिनों में संजय दत्त शायद कई साल बड़े हो गए। वो ऐसा अनुभव था जिसने उन्हें और मजबूत बनाया और शायद और ज्यादा जिम्मेदार, जिम्मेदार अपने अपनों के प्रति, जिम्मेदार अपने परिवार और करियर के प्रति। मैं अपनी किस्मत को दोष नहीं देता हूं। ये नहीं सोचता हूं कि मैं ही क्यों। जो होना है वो तो होगा ही। अगर मुझसे पूछा जाए कि मैं खुद को किस तरह देखता हूं, तो मैं सिर्फ यही कहूंगा - मैं खुद को संजू बाबा की तरह ही देखता हूं। सिर्फ संजू बाबा। आखिर अंधेरा छंटा और 14 दिन बाद संजय दत्त को बेल मिली और वो जेल से बाहर निकले। बाहर उनकी फिल्मों ‘सड़क’ और ‘साजन’ के गीत बज रहे थे और कुछ वक्त बाद खलनायक के डॉयलॉग धूम मचा रहे थे। खलनायक रिलीज हो गई लेकिन फिल्मी पर्दे में भी इस हीरो पर खलनायक का ठप्पा लग चुका था।

इस लेख को लिखने का मकसद किसी के ज़िन्दगी के उन पहलुओं को दर्शाना था, जिसे वास्तव में सबको जानना चाहिए.! शायद यह सब जानकार उनमें कुछ परिवर्तन आ सके..पढने के लिए शुक्रिया: जीवन एक संघर्ष-'द टीम'!
साभार: आईबीएन-7
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