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Sunday, February 3, 2013

मीडिया मजदूर कहो.!

कार्यकर्त्ता नहीं मीडिया मजदूर कहो.!



कार्यकर्ता तो स्वयंसेवक की तरह होते हैं, जिन्हें कुछ नहीं मिलता! हम तो मीडिया में मजदूर हैं, जिन्हें दिहाडी से मतलब है.... आगे पीछे घूमकर! मज़बूर हैं. बॉस को आंख भी नहीं दिखा सकते.. कार्यकर्ता तो भिड जाते हैं, लेकिन हम?

Saturday, January 26, 2013

Love is five star!


Afzaal Ahmad Zeeshan
Rabwah, Punjab(Pakistan)
Guest Writer

My Life. She's got a name too!

I love my girl. She means everything to me! :*


Love is five star! Everyone should be thankfull to what they have today. Because maybe tomorrow they won't be able to see all that is in their hands today!

I just wanna say that, I really do love her. Maybe she will never ever understand. Or maybe I will never be able to tell her how much I do love her. Or maybe I will always keeps all stuff hidden from her. But I do love her.

Thats all that I can express to her! Because I have never learnt how to express my feelings. She is making me feel NO-MORE-LONELY but still. Sometime I do feel lonely. When she sends me a kiss. Or when ever she says that she loves me. Or many other moments. Yes, I love her more than anything.

Friday, January 18, 2013

ऐ ज़िंदगी, तुझे क्या दूं?


ऐ ज़िंदगी,
तुझे क्या दूं?
मौत का तोहफ़ा
या ज़िंदगी का गम?
चुनना तुझे ही है,
मै तो बस तेरा साया हूं!!

तू ऐसे ही
तड़पाती रह मुझे,
खुशी देकर
रुलाती रह हमें,
तुझे समझना है
अपना हूं या पराया हूं!!

जिनकी कभी
आदत भी नहीं,
उन्ही को
जोड़ दिया हमसे,
कभी सोचा?
तेरे पास क्यों आया हूं!

गलतियां
इतनी हसीं करती है,
रुलाकर फिर
हंसाने की सोचती है?
क्यों ऐसा?
जैसे
तू ही मुझमें समाया है!

ऐ ज़िंदगी
तुझे क्या दूं?
मौत का
या जिंदादिली का नाम?
स्वीकारना
तुझे ही है
तू लाई है
मुझे?
या
मैं खुद तेरे लिए आया हूं?
:स्वरचित(श्रवण शुक्ल"बालमन")
यह पोस्ट आप मेरे ब्लॉग पर भी पढ़ सकते हैं

Saturday, January 12, 2013

धर्म परिवर्तन की जगह बेहतर इंसान बनाने का प्रयास करना होगा


मनोज पाठक
स्वामी विवेकानंद के अम्रीका प्रवाश के दौरान एक अमरीकी प्रोफ़ेसर उनसे मिलने पंहुचा और स्वामी जी को प्रणाम कर कहा, ‘स्वामी जी, आप मुझे अपने हिंदू धर्म में दीक्षित करने की कृपा करें।’
इसपर स्वामी जी ने उसे कहा , ‘मैं यहां धर्म प्रचार के लिए आया हूं न कि धर्म परिवर्तन के लिए। मैं अमेरिकी धर्म-प्रचारकों को यह संदेश देने आया हूं कि वे धर्म परिवर्तन के अभियान को बंद कर प्रत्येक धर्म के लोगों को बेहतर इंसान बनाने का प्रयास करें। यही धर्म की सार्थकता है। यही सभी धर्मों का मकसद भी है। हिंदू संस्कृति विश्व बंधुत्व का संदेश देती है, मानवता को सबसे बड़ा धर्म मानती है।’ वह प्रोफेसर उनकी बातों से अभिभूत हो गए और बोले, ‘स्वामी जी, कृपया इस बारे में और विस्तार से कहिए।’

प्रोफेसर की यह बात सुनकर स्वामी जी ने कहा, ‘महाशय, इस पृथ्वी पर सबसे पहले मानव का आगमन हुआ था। उस समय कहीं कोई धर्म, जाति या भाषा न थी। मानव ने अपनी सुविधानुसार अपनी-अपनी भाषाओं, धर्म तथा जाति का निर्माण किया और अपने मुख्य उद्देश्य से भटक गया। यही कारण है कि समाज में तरह-तरह की विसंगतियां आ गई हैं। लोग आपस में विभाजित नजर आते हैं। इसलिए मैं तुम्हें यह कहना चाहता हूं कि तुम अपना धर्म पालन करते हुए अच्छे ईसाई बनो। हर धर्म का सार मानवता के गुणों को विकसित करने में है इसलिए तुम भारत के ऋषियों-मुनियों के शाश्वत संदेशों का लाभ उठाओ और उन्हें अपने जीवन में उतारो।’

Saturday, November 17, 2012

जागरण की वेबसाइट पर गलतियों का पिटारा, न्यूज देने की जल्दी या फिर कुछ और?


जागरण की वेबसाइट पर गलतियों का पिटारा, न्यूज देने की जल्दी या फिर कुछ और? पढ़िए ..
नई दिल्ली में शनिवार को छतरपुर स्थित फार्म हाउस में पॉन्टी चढ्डा के भाई हरदीप की गोली मारकर हत्या कर दी गई, जबकि पॉन्टी घायल हो गए। उन्हें अस्पताल ले जाया गया है। बताया जाता है कि पॉन्टी को भी मौत हो गई है। 


 News Edit fir bhi galtiyan ; tathya dekhiye . नई दिल्ली। नई दिल्ली में शनिवार अपरान्ह छतरपुर स्थित फार्म हाउस में आपसी गोलीबारी में पॉन्टी चड्ढा और उसके भाई हरदीप की मौत हो गई। बताया जाता है कि जमीन विवाद को लेकर दोनों के बीच हुए विवाद में पॉन्टी को 12 गोली लगी हैं। फायरिंग में एक गार्ड भी घायल हुआ है। पुलिस ने फार्म हाउस की घेराबंदी कर मामले की जांच-पड़ताल शुरू कर दी है।
मुरादाबाद के चड्ढा परिवार और शराब के बहुत बड़े कारोबारी पॉन्टी चड्ढा के भाई हरदीप चड्ढा की छतरपुर स्थित फार्म हाउस पर हत्या की गई। पिछले कुछ दिन पहले मुरादाबाद में उनके घर पर भी फायरिंग हुई थी।


 News Edit fir bhi galtiyan ; tathya dekhiye . नई दिल्ली। नई दिल्ली में शनिवार अपरान्ह छतरपुर स्थित फार्म हाउस में आपसी गोलीबारी में पॉन्टी चड्ढा और उसके भाई हरदीप की मौत हो गई। बताया जाता है कि जमीन विवाद को लेकर दोनों के बीच हुए विवाद में पॉन्टी को 12 गोली लगी हैं। फायरिंग में एक गार्ड भी घायल हुआ है। पुलिस ने फार्म हाउस की घेराबंदी कर मामले की जांच-पड़ताल शुरू कर दी है।

Friday, November 16, 2012

ओशो : नायक या खलनायक?


भारत में कई ऐसे संत तथा विचारक हुए हैं, जिनका समाज ने अनुसरण किया। यद्यपि वे काफी विवादास्पद भी रहे, लेकिन फिर भी लोगों ने उनका सम्मान करना तथा उनकी शिक्षा का पालन करना नहीं छोड़ा। ओशो भी ऐसे ही व्यक्तित्वों में से एक थे। उन्होंने समाज में सेक्स को अध्यात्म से जोड़ते हुए लोगों को सेक्स के प्रति आकर्षित किया। कामुकता की दिशा में उनका रवैया बेहद मुखर था। अब आप स्वयं ओशो के बारे में जानकर बताएं कि ओशो नायक थे या खलनायक? जारी......

ओशो का जन्म 11 दिसंबर 1931 को मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के कच्छवाडा नामक गांव में हुआ था। इनके माता-पिता जैन धर्म के अनुयायी थे। माता-पिता ने इनका नाम चन्द्र मोहन जैन रखा था। 1960 के दशक के बाद से यह आचार्य रजनीश के नाम से जाने जाने लगे। 1970 के बाद से उन्होंने अपना नाम बदल कर ओशो रख लिया था।

ओशो को उनके माता-पिता ने 7 वर्ष की उम्र तक ननिहाल में रखा। ओशो के अनुसार उनके विकास में इस बात का विशेष योगदान रहा क्योंकि उनकी नानी के द्वारा उन्हें उन्मुक्तता तथा रुढ़िवादी शिक्षाओ और परंपराओं से दूर रखा गया। भारतीय रहस्यवादी गुरूओं और अन्तर्राष्ट्रीय आध्यात्मिक शिक्षकों में इनका नाम प्रमुखता से लिया जाता है।

दर्शन के प्रोफेसर और एक सार्वजनिक वक्ता के रूप में 1960 में उन्होंने पूरे भारत की यात्रा की। समाजवाद और धर्मों के प्रति उनकी मुखर आलोचना तथा महात्मा गांधी के प्रति उनके विचारों ने उन्हें विवादास्पद बना दिया। उनका कामुकता की दिशा में एक वकालत भरा द्रष्टिकोण था तथा सेक्स के प्रति वे काफी मुखर थे। 1970 में ओशो कुछ समय के लिए मुंबई में रूके और उन्हों अपने शिष्यों को 'नव सन्यास' में दीक्षित किया। फिर वे लोगों के लिए एक आध्यात्मिक मार्गदर्शक के रूप में कार्य करने लगे।

1974 में पूना आने के बाद उन्होंने अपने आश्रम की स्थापना की जिसमें भारतवासियों के साथ-साथ विदेशियों की संख्या भी बढ़ने लगी। 1980 में ओशो अमेरिका चले गए और वहां सन्यासियों के साथ 'रजनीशपुरम' की स्थापना की। ओशो ने समाज के हर पाखंड पर आघात किया। उन्होंने सैकड़ों पुस्तकें लिखीं। उनके प्रवचन ऑडियो तथा वीडियो कैसेट्स के रूप में उपलब्ध हैं।

उनके क्रांतिकारी विचारों के कारण लाखों लोग उनके अनुयायी बन गए। 'संभोग से समाधि की ओर' उनकी सबसे चर्चित किंतु विवादास्पद पुस्तक है। सन्यास की अवधारणा को उन्होंने भारत की विश्व को अनुपम देन बताते हुए सन्यास के नाम पर भगवा कपड़े पहनने वाले पाखंडियों को खूब लताड़ा।

ओशो के दस सिद्धांत-
1- कभी किसी की आज्ञा का पालन ना करें, जब तक की वो आपके भीतर से ना आ रही हो
2- अन्य कोई ईश्वर नहीं हैं, सिवाय स्वयं जीवन के
3- सत्य आपके अन्दर ही है, उसे बाहर ढूंढने की जरुरत नहीं है
4- प्रेम ही प्रार्थना है
5- शून्य हो जाना ही सत्य का मार्ग है। शून्य हो जाना ही स्वयं में उपलब्धि है
6- जीवन यही है, अभी है
7- जीवन होश से जियो
8- तैरो मत - बहो
9- प्रत्येक पल मरो ताकि तुम हर क्षण नवीन हो सको
10- उसे ढूंढने की जरुरत नहीं जो कि यही हैं, रुको और देखो

21 मार्च 1953 में ओशो ने कहा कि उन्हें आध्यात्मिक बोध हो गया है। यह पूर्णिमा का दिन था। ओशो ने प्रेम, कारागृह तथा मंदिर आदि के बारे में स्वयं की परिभाषाएं गढ़ीं। प्रेम के संदर्भ में ओशो कहते हैं कि प्रेम और प्रेम में फर्क होता है। यह अकारण तथा बेशर्त होना चाहिए। जब यह वासना में परिवर्तित होता है तब यह हिंसा में परिवर्तित हो जाता है। कारागृह के बारे में वे कहते हैं कि कारागृह वह है जो जिसके भीतर से आप चाह कर भी मुक्त नहीं हो सकते। कारागृह का अर्थ है जिसके ऊपर और जिससे पार जाने का उपाय न सूझे।

1985 से 1986 तक एक वर्ष तक उन्होंने विश्व के कई देशों की यात्रा की। जनवरी और फरवरी में उन्होंने नेपाल की यात्रा की। वहां वे प्रतिदिन दो बार प्रवचन देते थे। इसके बाद नेपाल सरकार ने उनके अनुयायियों के लिए वीजा देने से मना कर दिया। फिर वे नेपाल से चले गए।

फरवरी-मार्च में उनका पहला पड़ाव ग्रीस रहा जहां उन्हें 30 दिन का वीजा दिया गया था। लेकिन केवल 18 दिनों के बाद ग्रीक पुलिस ने बलपूर्वक उनके घर को तोड़ दिया और उन्हें बंदूक की नोक पर गिरफ्तार कर लिया था। ग्रीक मीडिया रिपोर्टों से संकेत मिला था कि इसके लिए सरकार पर चर्चों द्वारा दबाव बनाया गया था।

अगले दो सप्ताह तक उन्होंने यूरोप के 17 देशों की यात्रा करने की अनुमति मांगी लेकिन सभी देशों ने उनकी इस मांग को नकार दिया। मार्च-जून में 19 मार्च को वे उरुग्वे के लिए यात्रा पर निकले। 14 मई को सरकार ने एक प्रेस सम्मेलन में घोषणा की कि उन्हें उरुग्वे में स्थायी निवास दिया जाएगा।

इसके बाद उरुग्वे के राष्ट्रपति ने स्वीकार किया कि उन्हें एक रात पहले वाशिंगटन से एक टेलीफोन आया था जिसमें कहा गया कि यदि ओशो को उरुग्वे में रूकने दिया गया तो उरुग्वे को अमेरिका द्वारा दिया गया 6 बिलियन डॉलर का लोन तुरंत वापस करना होगा और आगे भी उसे कोई लोन नहीं दिया जाएगा। अत: ओशो को 18 जून को उरुग्वे छोड़ने का आदेश दे दिया गया। जून-जुलाई के अगले दो महीनों के दौरान वह जमैका और पुर्तगाल से निर्वासित किए गए। सभी 21 देशों में उनके प्रतिबंध पर रोक लगा दी गई। 29 जुलाई 1986 को वे मुंबई लौट आए।

1981 में ओशो को अमेरिका में भारत से कर चोरी के आरोपों से भागने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। ओशो ने आरोप लगाया था कि जेल में उन्हें जहर दिया गया था। और इसके चार साल बाद 19 जनवरी 1990 को उनका देहावसान हो गया था। उनकी अस्थियों को उनके अंतिम घर, पूणे के आश्रम के प्रवचन कक्ष में रखा गया है।


साभार : भास्कर(आंशिक/पूर्ण)
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