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Monday, June 13, 2016

खबरों का नया अड्डा www.khabrein24.com

मित्रों से सुखद खबर मिल रही है। 8 मित्रों के समूह ने एक नई न्यूज वेबसाईट का निर्माण किया है, जिसपर तमाम खबरें समय से उपलब्ध मिलेंगी। इस नए अड्ढे से मैं बेहद प्रभावित हुआ। आप भी विजिट करें।
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Saturday, December 19, 2015

निर्भया के दोषी की रिहाई पर सोमवार को होगा फैसला, सुप्रीम कोर्ट ने रिलीज पर नहीं लगाई रोक!


नई दिल्ली। दिल्ली में 14 दिसंबर 2012 को निर्भया के साथ 3 साल पहले जब दरिंदगी हुई थी, तो पूरे देश में कोहराम मच गया था। लोग सड़कों पर उतरे। निर्भया ने काफी संघर्ष के बाद दम तोड़ दिया था। मामले में कुल 6 दरिंदों को गिरफ्तार किया गया। इनमें से राम नाम के आरोपी ने तिहाड़ जेल में खुदकुशी कर ली थी, तो 4 आरोपियों को फांसी की सजा दिल्ली हाईकोर्ट ने सुनाई। पर इनके अलावा जिस दरिंदे ने सबसे ज्यादा हैवानियत दिखाई थी, वो आज रिहा हो रहा है। क्योंकि उसे नाबालिग होने का फायदा मिला था और महज 3 सालों तक ही उसे सुधार गृह में रखा गया था। पर उसकी रिहाई का जमकर विरोध हो रहा है। दिल्ली महिला आयोग आधी रात में उसकी रिहाई रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंची, पर रात 2 बजे तक चली हलचल के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने उसकी रिहाई पर रोक नहीं लगाई है, हालांकि दिल्ली महिला आयोग की अर्जी मंजूर कर ली गई है और इसकी सुनवाई सोमवार को होगी। 

दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाती मालिवाल ने कहा कि पहले पूरे मामले को वैकेशन बेंच ने सुना और आगे पूरे मामले की सुनवाई सोमवार को होगी। इस मामले को केस नंबर 3 के तौर पर सुप्रीम कोर्ट में सुना जाएगा। अब ये देखना होगा कि बाल सुधार आयोग निर्भया के दोषी को रिहा करेगा या नहीं, क्योंकि साफ तौर पर सुप्रीम कोर्ट ने निर्भया के दोषी की रिहाई को लेकर कोई बात नहीं कही है। जिसके बाद दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाती मालिवाल ने कहा कि हम बाल सुधार आयोग से अपील करते हैं कि दोषी नाबालिग को रिहा न किया जाए।

आधी रात में अपील करने के बाद सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने मामले को फाइल जस्टिस गोयल और जस्टिस ललित उदय के वैकेशन बेंच के पास भेज दिया था। जिसे स्वीकार कर लिया गया है। पर आधी रात में पूरे मामले की सुनवाई न करते हुए वैकेशन बेंच ने कहा कि वो मामले की सुनवाई सोमवार को करेगी। आधी रात में सुप्रीम कोर्ट पहुंचने के सवाल पर स्वाती मालिवाल ने कहा कि कुछ कानूनी दिक्कतों के चलते देरी हो रही थी। पालीवार की अपील पर रजिस्ट्रार पूरे मामले को लेकर सीजेआई के गए थे।

इससे पहले, दिल्ली महिला आयोग के वकील राजेश इनामदार ने बताया था कि अभी फाइल जस्टिस आदर्श कुमार गोयल और जस्टिस ललित उदय  के वैकेशन बेंच के पास गई है। रात में 2.05 बजे तक स्वाती मालीवाल ने पूरे मामले की जानकारी देते हुए बताया कि सोमवार को कोर्ट इस मामले पर सुनवाई करेगी।

गौरतलब है कि निर्भया के दोषी नाबालिग आरोपी को आज रिहा किया जाना था। पर उसकी रिहाई का जोरदार विरोध हो रहा है। एक तरफ दिल्ली में निर्भया के परिजनों ने विरोध प्रदर्शन किया, तो दूसरी ओर उसकी रिहाई रोकने के लिए दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष आधी रात में ही सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी, जिसपर अब सोमवार को सुनवाई होगी।
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Monday, September 7, 2015

आरक्षण: सिख और पारसी समाज से सीख लेने की जरुरत

हम आज कुछ और सुनें न सुने "आरक्षण" शब्द खूब सुन रहे है। देश में जहां देखो वहीँ आरक्षण को लेकर बात-चीत,चर्चा विवाद चरम स्तर पर शुरू है। अखबारों से लेकर मैगजीनों तक,इंटरनेट से लेकर टेलीविज़न चैनलों तक..हर जगह। इसमें भी कोई पटेल जाति को लेकर आरक्षण चाह रहा है तो कोई जाट समुदाय को लेकर,कोई मुस्लिम समुदाय को लेकर आरक्षण चाह रहा है तो कोई बैंसला समुदाय को लेकर! आंदोलन तक हो रहें है आज तो बड़े स्तर पर! ऐसा लगता है जैसे आरक्षण एक अधिकार न होकर एक अध्याय ही बन गया है।लगता है जैसे एक इतिहास लौट कर आ रहा है।
ज्ञानरंजन झा, युवा पत्रकार


इसकी सबसे पहली वजह ये है कि इसका इतिहास पुराना है। आरक्षण के इतिहास पर नज़र डालें तो ये बात सामने आती है कि इसे एक छोटे स्तर पर प्रयोग के तौर पर शुरू किया गया था। इसे लेकर आज़ादी तक बहुत आंदोलन भी हुए। अम्बेडकर जी को इस शब्द को प्रचलित करने का श्रेय भी जाता है। दूसरी वजह ये है कि ये बात एक समुदाय विशेष यानी कम्युनिटी के हित से जुडी है इसलिए भी इस पर ज्यादा दवाब से बात होती है। अगर किसी विशेष समुदाय को अधिकार ज्यादा मिले तो समझिये आरक्षण का फेर है। लाभ हर स्थान पर प्राप्त होता है इसलिए यह अधिकार कारगर माना जाता है निजी हितों के लिए।

पर जब आरक्षण पर ज्यादा बात होती ही है तब हम उस समय हर बार ये सोचना क्यों भूल जाते है कि जो 'समुदाय' आज सच मायनों में आरक्षण के हकदार है जब वो इसकी मांग नहीं कर रहे तो आखिर दूसरे क्यों इस पर जबरन अड़े है?

हम ये इतिहास जरूर जानना चाहिए कि जब अंग्रेज देश छोड़ कर जा रहे थे तब उन्होंने पार्लियामेंट के सामने ये प्रस्ताव दिया था कि पारसी समाज को अल्पसंख्यक होने के नाते इस दायरे में रखा जाये मगर पारसियों ने उनका प्रस्ताव ठुकरा दिया। उन्होंने कहा कि अपने ही मुल्क ईरान से अलग होने के बाद जिस देश ने हमें हज़ारों वर्षों तक संभाला वहाँ हम अपने लिए आरक्षण की मांग कैसे कर सकते हैं। उन्होंने अंग्रेजों से इतना ही कहा था कि आप बस ये मुल्क छोड़ कर चले जाइए हमें आरक्षण की कोई जरुरत नहीं है।

ठीक यही हाल सिख समुदाय का भी है,वो भी देश में कभी आरक्षण को लेकर शोर मचाते नहीं दिखाई पड़ते। ये लोग चाहते तो आज तक बहुत कुछ मांग सकते थे देश से।

होता ये है कि आरक्षण को लेकर सबसे ज्यादा तेज़ी उन्हें ही होती है जिनके पास आज अपने ऊपर कोई उम्मीद नहीं है। वो बस इसी के सहारे टिके हैं। मेहनत आज उन्हें अपनी ओर आकर्षित करने में नाकाम है।

सबसे रोचक पहलु ये है कि क्या हम इन पारसियों और सिख समुदायों से सीख नहीं ले सकते! क्या हम ये नहीं सोच सकते कि जब ये इतनी कम तादाद में होकर भी आरक्षण नहीं मांग रहे तो दूसरे क्यों इसकी चाह में हैं?  ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि आरक्षण के लिए चीख-पुकार करने वालों को ये दिखाई नहीं देते, देते तो जरूर होंगे मगर फिर भी ये नहीं सीखते और ख़ास बात ये कि इस आरक्षण के खत्म होने से जब बहुत सारे मुद्दे सुलझ सकते है फिर आखिर ये क्यों बंद नहीं होता ?

हम आज काबिलियत पर भरोसा करना क्यों भूलते जा रहे हैं। हर एक इंसान के अंदर काबिलियत होती है बस उसका मापन उसी से होना चाहिए। जाति और धर्म के नाम पर बटवारा आखिर कितनी देर तक चलेगा?  माना परिस्थितियां उस वक़्त इसके माकूल थी मगर अब तो बदलाव आ गया है ना ! हमें इस पहलु को समझना चाहिए। हम देश को विकासशील होते नहीं देख सकते हमें इसे विकसित बनाना है। ऐसे में जरुरी है ये पूर्ण रूप से खत्म हो। जब मुद्दा अस्तित्व में ही नहीं रहेगा तो लोग मांग ही नहीं करेंगे।ये तुरंत नहीं हो सकता मगर इसके लिए एक मजबूत एवं बड़ा प्रयास तो हो ही सकता है न!

इसके लिए इस मुद्दे का गैर-राजनीतिकरण होना सबसे आवश्यक है।इसकी ही वजह से आज तक ये मुद्दा बड़ा फुला-फला है।अपने फायदे के लिए इस शब्द का खूब इस्तेमाल हुआ है।ये जहाँ खत्म हुआ समझिये आरक्षण खत्म।

एक बात ये कि माना हम आज की परिस्थितयों से सीख नहीं ले सकते मगर इतिहास से तो ले सकते है न ! इसलिए हमें सीख लेनी चाहिए।आरक्षण जैसे मुद्दे का हल होना बहुत जरुरी है आज देश में ! इसे खात्मे के बाद देश जरूर एक नए उजाले का सवेरा देखेगा।

युवा ज्ञानरंजन झा जुझारू पत्रकार हैं। पढ़ाई के साथ ही समसामयिक मुद्दों पर की-बोर्ड घिसते ही रहते हैं। ज्ञानरंजन से फेसबुक(क्लिक करें) पर भी संपर्क किया जा सकता है।

Tuesday, August 18, 2015

दिल्ली में बिजली के दाम बढ़ाने के पीछे है बड़ा झोल! CAG indicts Delhi power DISSCOMS

नई दिल्ली। दिल्ली में बिजली के दाम बढ़ाने की तैयारी चल रही है। सरकार चाहती है, बिजली के दाम न बढ़ें। लेकिन बिजली कंपनियां अपने घाटे का रोना रोते हुए दाम बढ़ाना चाहती हैं। इसके पीछे क्या बिजली कंपनियां बड़ा झोल कर रही हैं? इसी झोल की पड़ताल के दौरान कई ऐसे तथ्य सामने आएं, तो चौंकाने वाले हैं। 

दिल्ली में मुख्य रूप से रिलायंस कंपनी की बीएसईएस यमुना, बीएसईएस राजधानी और टाटा की टीपीडीडीएल (एनडीपीएल) बिजली आपूर्ति कर रहे हैं। ये प्राइवेट कंपनियां बिजली की कीमतों में औसतन 19 फीसदी की वृद्धि चाहती हैं। ऐसा करने के पीछे बिजली कंपनियां तर्क देती हैं कि उनका खर्च काफी ज्यादा हो रहा है। जो वसूली की तुलना में कम है। बिजली कंपनियां वर्तमान बिजली दर में लगभग 19 फीसदी की बढ़ोत्तरी की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में पहुंच गई हैं। हालांकि दिल्ली विद्युत नियामक आयोग (डीईआरसी) ने निजी कंपनियों की घाटे की बात को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट में दिए हलफनामे में कहा है कि निजी कंपनियों ने अपने घाटे को जानबूझ कर बढ़ाया है। 

दरअसल, दिल्ली के बिजली उपभोक्ताओं को सस्ती बिजली और बेहतर सेवाएं देने के उद्देश्य से 2002 में दिल्ली विद्युत बोर्ड का विघटन करके बिजली आपूर्ति का काम निजी कंपनियों को दे दिया गया था। बिजली आपूर्ति करने वाली ये कंपनियां आज तक न तो दिल्ली से बिजली कटने को रोक पाईं और न ही बिजली की दरों में कोई कमी आई। यह कंपनियां उपभोक्ता हित के बजाए निजी हित में काम कर रही हैं। निजी बिजली कंपनियां लगातार घाटे का रोना रोकर बिजली दर में बढ़ोत्तरी कराती रही हैं। अब एक नजर इन बिजली कंपनियों के लगातार रोने की वजह रखरखाव और परिवहन में बिजली की बर्बादी के आंकड़ों पर डालेंगे, तो काफी कुछ सामने आ जाएगा। 

आंकड़े के मुताबिक साल 2002-03 में जब सरकारी कंपनियों के जिम्मे दिल्ली की बिजली थी, तो टोटल बिजली की बर्बादी की तुलना में अब कम बर्बाद हो रहा है। देखिए ये आंकड़ा..

बिजली बर्बादी की स्थिति

वर्ष            BSES यमुना      BSES राजधानी            टीपीडीडीएल
2002-03          61.9%            57                      51%
2013-14          21.04%          77o/o                   10.35%


ये आंकड़े साफ जाहिर करते हैं कि बिजली कंपनियां जिस बिजली बर्बादी(विपणन में अधिक लागत) का रोना रो रही हैं, वो 2002-03 के मुकाबले काफी कम हैं। ये वो आंकड़ा है, जो बिजली कंपनियों के घाटे की पोल खोलती हैं। हालांकि बिजली कंपनियों के इन आंकड़ों में 2013-14 के बाद जो सुधार आना चाहिए था, उसकी गति भले ही धीमी हो गई हो, लेकिन लगाम नहीं लग पाई। 2013-14 में BSES यमुना के बिजली की जो बर्बादी 21.4 फीसदी(15.66% स्वीकृत, टैरिफ ऑर्डर 31 जुलाई 2013 को स्वीकृत) थी, उसके 2015-16 में 17% रहने की उम्मीद है। वहीं, BSES राजधानी की बिजली बर्बादी का जो आंकड़ा 15.60 0/o(13.33% स्वीकृत, टैरिफ ऑर्डर 31 जुलाई 2013 को स्वीकृत)  था, उसके 2015-16 में 14.12% रहने की उम्मीद है। जबकि टीपीडीडीएल की बिजली बर्बादी का जो आंकड़ा 10.35 0/o था, उसके 2015-16 में 13.32% रहने की उम्मीद है। यहां गौर करने वाली बात है कि बीएसईएस की दोनों कंपनियों की बिजली बर्बादी जहां घटी है, वहीं टीपीडीडीएल की ज्यादा बिजली बर्बाद हो रही है। इसके पीछे विपणन में गड़बड़ियों को जिम्मेदार माना जा रहा है।

इस बर्बादी का हिसाब लगाते हुए डिस्कॉम ने बिजली कंपनियों के ऑपरेशन और मेंटिनेंस का जो हिसाब किताब तैयार किया है। उसमें टैरिफ कमीशन ने BSES यमुना के 363.33 करोड़ के खर्च को स्वीकृत किया था। जबकि BSES यमुना ने दावा किया कि उसने ऑपरेशन और मेंटिनेंस में 384.19 करोड़ रुपए खर्च किए। वहीं, 2015-16 के लिए ये आंकड़ा 456 करोड़ तक पहुंचने की बात कही जा रही है। इसी तरह से टैरिफ कमीशन ने BSES राजधानी के 500.11 करोड़ के खर्च को स्वीकृत किया है। जबकि BSES राजधानी का दावा है कि उसने ऑपरेशन और मेंटिनेंस में 611.04 करोड़ रुपए खर्च किए। वहीं, 2015-16 के लिए ये आंकड़ा 763.73 करोड़ तक पहुंचने की बात कही जा रही है। 

इसी तरह से तीसरी कंपनी टीपीडीडीएल के लिए टैरिफ कमीशन ने 413.51 करोड़ के खर्च को स्वीकृत किया है। जबकि टीपीडीडीएल का दावा है कि उसने ऑपरेशन और मेंटिनेंस में 541.75 करोड़ रुपए खर्च किए। वहीं, 2015-16 के लिए ये आंकड़ा 707.93 करोड़ तक पहुंचने की बात कही जा रही है। बिजली कंपनियां अपने इसी घाटे को पूरा करने के लिए सरकार से बिजली की दरों में 19-25फीसदी की बढ़ोतरी की मांग कर रही हैं। ऐसा न होने पर बिजली कंपनियां पिछले साल की तरह फिर से बिजली सप्लाई से हाथ खड़ी कर सकती हैं। 

इन कंपनियों पर काफी समय से निगाह रख रहे वरिष्ट रिटायर्ड नौकरशाह ने ऑफ द रिकॉर्ड जानकारी दी है कि बिजली कंपनियां अपने घाटे को बढ़ाने के लिए कई बड़े उपभोक्ताओं से मिले राजस्व का कोई लेखा-जोखा नहीं दिखा रही हैं। पश्चिमी दिल्ली में बने इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा को बीएसईएस राजधानी बिजली आपूर्ति करता है। लेकिन उससे मिले धन को वो खाते में नहीं दिखाती। इसी तरह दिल्ली मेट्रो रेल कार्पोरेशन और दिल्ली जल बोर्ड से मिलने वाला बिजली राजस्व को भी बिजली वितरण कंपनियां अपने बहीखाते में दर्ज नहीं करती हैं।
बिजली कंपनियों के कुल खर्च की जानकारी इसीलिए दी गई, ताकि आपकी समझ में आ सके कि बिजली कंपनियों का क्या खर्च है। उनका दावा कितने का है, और जो खर्च वो दर्शा रहे हैं, वो कितना सही है। आपको बता दें कि डायरेक्ट्रोरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलीजेंस (डीआरआई) की जांच में ये बात सामने आई है कि बिजली बनाने वाली प्राईवेट कंपनियां लागत को जानबूझकर बढ़ाकर दिखा रही हैं। ऐसी कंपनियां बिजली उत्पादन में ज्यादा कोयले की खपत तक दिखा रही हैं। और ज्यादा दामों पर बिजली बेच रही हैं। 

बिजली के दामों को देखें, तो सरकारी और प्राइवेट कंपनियों के दामों में जमीन आसमान का अंतर है। यहां 1.2 रुपए प्रति यूनिट से 12.21 रुपए प्रति यूनिट तक की बिजली अलग अलग दामों में खरीदी जा रही है। एक तरफ जहां नेशनल थर्मल पावर कार्पोरेशन1.75 रुपए प्रति यूनिट से 6.15 रुपए प्रति यूनिट की दर पर बिजली दे रही है, तो एनएचपीसी 1.77 रुपए प्रति यूनिट से 12.21 रुपए प्रति यूनिट के बीच बिजली बेचती है। वहीं, सासन अल्ट्रा मेगा बिजली संयंत्र से बनी बिजली कहीं ज्यादा मंहगी है, जिसकी कीमत 1.96 रुपए से लेकर 11.96 रुपए तक है।
दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष अजय माकन बिजली बिल बढ़ोतरी के खिलाफ हैं। वो कहते हैं कि जो कंपनियां आंकड़ों में खेल कर लगातार बिजली के दाम बढ़ा रही हैं, उनकी बात को कतई नहीं माना जाना चाहिए। उन्होंने कहा, होना तो यह चाहिए था कि बिजली कंपनियों के नुकसान में जबरदस्त कमी आने पर बिजली कम्पनियों को जबरदस्त फायदा हुआ। जिसका फायदा आम जनता तक नही पहुंच रहा और बिजली कम्पनियां मालामाल हो रही है। इसलिए बिजली कंपनियों की बिजली के रेट में बढ़ोतरी की मांग को डीईआरसी को तुरंत खारिज कर देना चाहिए और बिजली की दरों में कमी की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि बिजली कंपनियों का यह कहना कि आपरेशन व मेन्टेनेन्स के खर्चे बढ़ रहे हैं इसलिए बिजली के रेट बढ़ाएं जाएं, सरासर झूठ हैं।

अगर सभी तथ्यों को मिलाकर देखें तो बिजली के दामों को बढ़ाने के पीछे बड़ा खेल साफ तौर पर दिखता है। दिल्ली सरकार सभी तथ्यों को देखते हुए बिजली के दामों को न बढ़ाने पर अड़ी है, लेकिन वो पूरी तरह से ऑडिट रिपोर्ट पर आश्रित है। ऐसे में अगर दिल्ली सरकार इस झोल को न पकड़ पाई, तो मार सिर्फ उपभोक्ताओं को पड़ेगी, जबकि बिजली कंपनियों की बल्ले-बल्ले होना तय है।


ये रिपोर्ट April 21, 2015 को लिखी गई थी। इससे पहले आईबीएनखबर.कॉम पर इसी से संबंधित एक खबर प्रकाशित हुई थी। उस खबर के बाद लंबा समय लग गया था इस रिपोर्ट को तैयार करने में। और डिस्कॉम का वर्जन न मिल पाने की वजह से अधूरी गई, तो ये रिपोर्ट पब्लिस नहीं कर पाया और आखिरकार रद्दी की टोकरी में डाल कर दूसरे प्रोजेक्ट्स में व्यस्त हो गया। दूसरी रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

Tuesday, July 28, 2015

भारत मां के अमर बेटे हैं डॉ एपीजे अब्दुल कलाम

कई बेवकूफों के पोस्ट देख रहा हूं जो कलाम साहब के मुस्लिम होने को लेकर है। अरे मूर्खों, कलाम जैसे धर्मात्मा अरबों सालों में होते हैं। कलाम वर्तमान भारत देश के कृष्ण हैं। जिन्होंने हनुमान जैसा ब्रह्मचर्य निभाया। कृष्ण जैसी दूरदृष्टि। राम जैसा पुरुषत्व, भोले बाबा जैसा सेवक... तुम क्या समझोगे बेवकूफो।

वो समय याद करो, जब केंद्रीय मंत्रिमंडल ने डीआरडीओ के बजट को बंद कर दिया था, तो इंदिरा ने कलाम साहब के हाथों सीक्रेट बजट सौंपकर देश के सुरक्षा मिशन का जिम्मा ही सौंप दिया... और अब हमारे पास पृथ्वी, जल, आकाश की सुरक्षा का चक्र है। स्माइल बुद्धा की स्माइल है। अपना जीपीएस(केवल सैन्य) सिस्टम है। हम आत्मनिर्भर हैं। वो अलग बात है कि देश के नेताओं की कभी हिम्मत ही नहीं हुई, खुलकर सामने आने की। सिवाय अटल बिहारी वाजपेयी के। जिनके एक फोन पर डॉ साहब ने राष्ट्रपति की कुर्सी संभाल 5 साल अपने छात्रों से दूर रहे। हालांकि बीच बीच में वो सबसे संपर्क करते रहे, यहां तक कि तिरुवनंतपुरम के जिस होटल में वो वैज्ञानिक के तौर पर रुकते रहे, उसके मालिक से भी फोन पर बात करते रहे।

तुम क्या जानों, हिंदू मुस्लिम। एक पाकिस्तानी अब्दुल कादिर हुआ, जिसने परमाणु बम को इस्लामिक बम बना दिया, तो दूसरे हमारे अपने अबुल पाकिर जैनुलआबदीन अब्दुल कमाल साहब रहे, जिन्होंने अपना पूरा जीवन देश को समर्पित कर दिया। हमें सर उठाकर जीने और हमारी संपूर्ण सुरक्षा का बंदोबस्त कर गए। कलाम साहब ने अक्षरधाम मंदिर का उद्घाटन किया, उन्होंने तमाम हिंदु साधु-संतों का आशिर्वाद भी लिया। वो कहां से मात्र मुस्लिम दिखे? न ... वो हमारी मां के सच्चे सपूत थे। डॉ साहब हमारी मां के सबसे महान बेटे थे। मेरे जैसे लाखों-करोड़ों की प्रेरणा हैं। हमारे जैसे लोगों के दिलों में हैं। वो कहीं नहीं गए, हमारे बीच फैल गए हैं।

महान आत्मा को विनम्र श्रद्धांजलि... अभी उनके अंतिम दर्शन करके लौटा हूं। पत्रकार होने के नाते नहीं, एकलव्य होने के नाते। उन्होंने हमेशा कहा कि पहली सफलता पर खुश मत हो जाओ, क्योंकि बाकी तुम्हारी असफलता पर हंसी उड़ाने को तैयार हैं।
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