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Tuesday, October 22, 2013

मस्तराम संग जीवन के रंग: एक शायकसुअल पोस्ट

एक शायकसुअल पोस्ट 
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अलोक शायक
(पत्रकार, कवि)
वर्ष 1999-2000 का था जब पहली बार मस्तराम को पढ़ा .. ग्यारहवीं बारहवीं में पढ़ता था और रांची के रातू रोड में आकाशवाणी होस्टल में रहता था .. फिर तो गज्जब जिज्ञासा होती थी कि और किस किसने किस किस के साथ क्या किया .. 'इकसठ बासठ' करने की कल्पनाओं में मस्तराम की कहानियों ने बड़ा साथ दिया .. ऐसा भी दौर चला कि जब भी हम बिरसा चौक से गुजरते तो वहां के फुटकर पोस्टर दूकान से मस्तराम जरुर खरीदते .. हालांकि मैं शर्मीला था तब तो खुद मैंने खरीदने में रूचि नहीं रखी बस मूल्य चूका देता था .. तब पीली पन्नी में पैक रहता था यह डाइजेस्ट .. इस डाइजेस्ट को पढने से देशी हिंदी समृद्ध हुई मेरी और तमाम प्रतिबंधित शब्दों की व्याख्या समझने में मदद मिली .. 

वह भी दौर आया जब मस्तराम पुराने लगने लगे और लगता कि अब कुछ नया नहीं बचा है मस्तराम के पास कहने को .. तभी मैंने अपने होस्टल में मेरा वह ऐतिहासिक वक्तव्य भी दिया था कि ' मस्तराम ने सामाजिक रिश्तों के बंधनों को तोड़कर सेक्स को जिस प्रकार आनंद परमानंद की श्रेणी में पहुंचा दिया है और कल्पनाओं पर जैसा प्रभाव मस्तराम डाइजेस्ट का है वैसा प्रभाव ओशो भी नहीं छोड़ पाए हैं ' .. एक बार तो मैंने यहाँ तक विचार किया कि ओशो को 'सम्भोग से समाधि की ओर' लिखने की प्रेरणा मस्तराम डाइजेस्ट पढने से प्राप्त ज्ञान से ही मिली होगी ..

खैर .. मस्तराम का दौर ख़त्म हुआ तो टी वी सी डी का दौर आया .. बाकायदा चंदा होता था हमारे होस्टल में .. सबसे ज्यादा आर्थिक योगदान करने वाले से उसकी पसंद भी पूछी जाती थी .. जन्मदिन पार्टियों में सी डी प्रदर्शन अनिवार्य कर दिया गया .. कुछ उत्साही मित्र तो बाकायदा बोल कर जाते थे कि पॉज पर रखो अभी पांच मिनट में बाथरूम से आता हूँ .. एक चिन्हित सी गंध होस्टल के दो तीन चिन्हित लड़को के कमरों से आने लगी .. और फिर धीरे धीरे वह दौर भी ख़त्म हो गया ..

इंटरनेट पहली बार मैंने 2005 में इस्तेमाल किया .. याहू याहू सुनता रहता था और मेरे रूम पार्टनर की प्रेयसी ने मेरा याहू अकाउंट बना दिया .. वह ज्यादा उत्सुक इसलिए थी कि जितनी देर मैं कैफे जाकर नेट करता उतनी देर वह मेरे कमरे का उपयोग अपने प्रेम प्रयोग के लिए कर सकती .. यह एक छोटा सा कैफे था कठवरियासराय दिल्ली में और फिर याहू देखते देखते दो एक रोज में गूगल सर्च करना भी सीख गया मैं ..

सचमुच का सेक्स मैंने पहली बार वर्ष 2006 में किया सचमुच कि प्रेयसी के साथ .. तभी पहली बार जाना कि इकसठ बासठ और सेक्स में उतना ही अंतर है जितना मैंगो बाईट लेमनचूस चूसने और सचमुच के आम खाने में .. हालांकि सेक्स को तब तक मैं एक बेशर्म शब्द मानता था और वह और मैं सेक्स को मेकिंग लव कहना पसंद करते थे ..

और फिर ज़िन्दगी ने और कई रंग और स्वाद दिए ..
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शायक

Monday, October 14, 2013

तूफान और हादसे के बीच खड़े हम हिन्दुस्तानी!

जयदीप कर्णिक
(संपादक: वेबदुनिया.कॉम)
हम तूफान से तो लड़ सकते हैं....पर अपने आप से ...? तूफान से तो हम लड़ भी लिए पर अपने आप से लड़ाई फिर एक बार हार गए...।

एक तरफ सारा देश ओडिशा और आंध्र में फैलिन के हालात पर अपनी नज़रें गड़ाए था तो दूसरी ओर एक बड़ा हादसा बस हो जाने का इंतजार कर रहा था।

एक तरफ तूफान से लड़ने की तैयारी, 9 लाख लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुँचाना, सेना, प्रशासन, मौसम विभाग, आपदा से निपटने वाली टीम और मीडिया की भूमिका को देखकर सीना चौड़ा हो रहा था, मन उनको सलाम कर रहा था तो दूसरी ओर हमारे इस गर्व को काफूर कर देने वाला हादसा आकार ले रहा था, आसमान की ओर उठा हमारा सिर शर्म से झुकने को मजबूर हो गया।

एक तरफ़ मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ट्वीट कर रहे थे कि फैलिन तूफान से निपटने में उनकी सरकार ओडिशा सरकार की हर संभव मदद करेगी तो दूसरी ओर उनकी अपनी सरकार के नाकारा अधिकारी ख़ुद अपने घर में एक नया तूफान खड़ा कर रहे थे।

रतनगढ़ माता के दर पर 116 जानें चली गईं। घायल अभी अस्पताल में हैं। मरने वालों में 30 से ज़्यादा बच्चे हैं। कुछ तो बिलकुल दुधमुँहे। अपनी माँ की छाती से लिपटे पड़े इन मासूमों का आप्त स्वर रूह को निचोड़ देने वाला है। 2006 में भी यहीं माता के दर पर 57 जानें गईं थीं। .... कुछ नहीं। मुट्ठी भर पुलिस वाले और लाखों लोगों का सैलाब.... सब भगवान भरोसे। जिम्मेदार अधिकारी छुट्टी पर। पैसे लेकर ट्रैक्टर ट्राली को पुल पर जाने दिया गया। अफवाह फैली। भगदड़ मची। पुलिस की लाठियाँ चलीं। और अधिक भगदड़ मची। जानें चलीं गई। ... भगदड़ के असली कारण पर जाँच होती रहेगी और सच शायद तब भी सामने ना आए। ... 

पर एक सच पक्का है... शर्मनाक लापरवाही और हादसों से सबक ना लेने का। सच, गरीब की जान सस्ती होने का। सच, आस्था के साथ दिन-रात होते खिलवाड़ का। सच, जनता और व्यवस्था के भगवान भरोसे होने का।

हमारे तमाम धार्मिक स्थलों पर उमड़ने वाली भीड़ और वहाँ मचने वाली लूट, भगवान और आस्था के नाम पर रुपया बना लेने की होड़ क्या कड़वा और बड़ा सच नहीं है? अभी उत्तराखंड में लाशों की अंगुली काटकर अंगूठियां निकाल ली गईं। ..... हमारे तमाम हौसले, हुनर और बेहतरी के बीच लगे ये ऐसे टाट के पैबंद हैं जो हमारी खुशी को मुकम्मल नहीं होने देते।

श्रेष्ठता और बदइंतजामी दोनों के नमूने हम खुद ही पेश करते हैं। हम अपने ही दुश्मन आप हैं। जब तक हम अपने आप से आँख मिलाकर इन सच्चाइयों का सामना नहीं कर लेते... तूफान को जीत लेने का हमारा जश्न अधूरा ही रहेगा

कभी हमारे डॉक्टर इसलिए सम्मानित होते हैं कि एक जान बचाने के लिए उन्होंने अपनी जान लगा दी तो कभी जहरीले मध्यान्ह भोजन से ही हमारे यहाँ 23 स्कूली बच्चे मारे जाते हैं। धड़धडाती ट्रेन कावड़ यात्रियों पर चढ़ जाती है तो कभी किसी कृपालु महाराज के भंडारे में भगदड़ से लोग मारे जाते हैं। श्रेष्ठता और बदइंतजामी दोनों के नमूने हम खुद ही पेश करते हैं। हम अपने ही दुश्मन आप हैं। जब तक हम अपने आप से आँख मिलाकर इन सच्चाइयों का सामना नहीं कर लेते... तूफान को जीत लेने का हमारा जश्न अधूरा ही रहेगा। वो सभी जिनकी जान रतनगढ़ हादसे में गई है, उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि और ये उम्मीद की इस मोर्चे पर भी हम तूफान से जंग जीत ही लेंगे। - जयदीप कर्णिक

यह लेख जयदीप कर्णिक जी के फेसबुक वाल से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.. जयदीप जी से संपर्क करने के लिए यहां क्लिक करें 

Saturday, October 12, 2013

कालू का बिरजू... अब नहीं लौटेगा

अनिल सिंह
(पत्रकार: भड़ास4 मीडिया में
कंटेंट एडिटर के पद पर
कार्यरत रहे अनिल सिंह
ने ढ़ेर सारे पत्र-पत्रिकाओं
के प्रकाशन में सक्रिय भूमिका निभाई।
फिलहाल लखनऊ समेत 7 जगहों से
प्रकाशित डीएनए अख़बार में
महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा रहे हैं)

बरसों पहले की बात है रामपुर गांव का बिरजू पढ़ने के लिए कॉलेज गया. गरीब बिरजू को पढ़ने के अलावा कोई अधिकार नहीं था. अमीरों के शहर में कोई उसे पसंद नहीं करता था. सब उससे दूर रहते थे, कोई उससे बात नहीं करता था. बिरजू फिर भी बुरा नहीं मानता था. उसे लगता था कि यह सब उसकी नियति में लिखा है. अपनी हकीकत का पता होते हुए वह सपने देखा करता था. मेहनत से बड़ा आदमी बनने का सपना. पर गरीबों के सपने कब पूरे होते हैं. मेहनत करके बड़ा बनना तो सबसे बड़ा मजाक था, फिर भी वो इस मजाक को हकीकत में बदलने की कोशिश में लगा रहता था. 

उसे किसी से प्‍यार हो गया था, लेकिन उसके पास बताने की हिम्‍मत नहीं थी. क्‍यों कि वह गरीब था. गरीबी उसका सबसे बड़ा अभिशाप था. दिन बीतते गए. वो सपनों और हकीकत बीच उलझा रहा. ना इधर का हुआ और ना उधर का हो पाया. जिससे उसे प्‍यार था, उसको कभी समझा नहीं पाया, बता नहीं पाया. एक बार कोशिश की तो उसकी कीमत थप्‍पड़ खाकर और औकात में रहने की हिदायत के साथ चुकानी पड़ी. एक दिन लड़की की शादी उसके मां-बाप ने एक अमीर आदमी से कर दिया. लड़की बहुत खुश थी. उसे किसी चीज की कमी नहीं थी. 

बिरजू कुछ नहीं बन पाया, लेकिन उस लड़की को भूल भी नहीं पाया. गरीब बाप ने पेट काटकर उसे पढ़ाया था, लेकिन बिरजू अपनी-उनकी किसी की तकदीर नहीं बदल सका. वो गड़ेरिया स्‍टेशन पर कुली बन गया. गरीबी में भी उसकी प्‍यार करने की बेशर्मी उतरी नहीं थी. स्‍टेशन पर खाली समय में वो उसे याद करता रहता था. साथी कुली और रिक्‍शावाले उसे पागल कहने लगे. क्‍योंकि उसे पागल कहने का बुरा नहीं मानता था, क्‍योंकि बुरा मानकर भी वो कुछ नहीं कर सकता था. अपनी कमजोरी को उसने अपनी ताकत बना ली थी. उसे उम्‍मीद थी कि कभी तो वो लड़की गड़ेरिया स्‍टेशन पर आएगी, लेकिन वो अमीर आदमी के साथ ब्‍याही गई थी, उसे प्‍लेन से आना ज्‍यादा अच्‍छा लगता होगा, इसलिए सालों वो किसी ट्रेन से गड़ेरिया स्‍टेशन पर नहीं उतरी. फिर भी बिरजू ने उम्‍मीद नहीं छोड़ी थी.

आखिर एक दिन एक ट्रेन गड़ेरिया स्‍टेशन पर आकर रूकी. बिरजू की निगाहें शीशे वाली बोगी की तरफ जम गया. आखिर वो पैसे वाली थी और ठंडा-गरम करने वाले बोगी से नीचे तो आ ही नहीं सकती थी. रोज की तरह बिरजू थकी आंखों को समेटकर निराश होने जा रहा था, लेकिन शायद आज उसे निराश होने की जरूरत नहीं थी. 

अमीर आदमी की पत्‍नी, जिसे वह बहुत प्‍यार करता था, सोने में लदी ठंडा-गरम करने वाली बोगी से नीचे उतरी. बिरजू भागा-भागा पहुंचा. उसे लगा कि वह लड़की उसे पहचान लेगी, लेकिन लड़की की आंखों पर अमीरी के साथ महंगा वाला चश्‍मा लगा हुआ था. 

उसने बिरजू को बुलाया ओए कुली इधर आ. बिरजू को लगा कि अब उसे पहचान जाएगी, लेकिन बिरजू को निराशा हाथ लगी. अमीर आदमी ने कहा - ओए कुली ये सामान उठाकर बाहर ले चलो. आज पहली बार बिरजू सामान उठाते समय मोल भाव करना नहीं चाहता था. उसने मोल भाव किया भी नहीं. इस बार उसे डर भी नहीं लगा था कि उसकी मजूरी मारी जाएगी. वो अमीर आदमी और उस लड़की के पीछे चलने लगा. 

स्‍टेशन से बाहर निकलते ही एक चमचमाती गाड़ी खड़ी मिली. इसे लड़की के बाप ने अपने अमीर दामाद को लाने के लिए स्‍टेशन भेज रखा था. बिरजू ने सामान गाड़ी में रखकर खड़ा रहा कि लड़की अब भी पहचान जाएगी कि यह बिरजू ही है, जिसे उसने थप्‍पड़ मारा था, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. अमीर आदमी ने बिना पूछे बिरजू को सौ रुपए का नोट पकड़ा दिया. बिरजू जब बीस रुपए वापस करने चाहे तो अमीर आदमी की पत्‍नी ने उसे टिप समझकर रख लेने को कहा. अब उसे लगने लगा था कि लड़की ने उसे पहचान लिया था. उसने व्‍यंग्‍य के साथ मुस्‍कान बिखेरी जैसे कह रही हो, चले आए थे मुझसे प्‍यार करने, तेरी औकात तो इस बीस रुपए के टीप से ज्‍यादा नहीं थी. 

चमचमाती गाड़ी धीरे धीरे बिरजू से दूर जा रही थी. साथ ही उससे दूर जा रही थी वो उम्‍मीद, जो उसको अब तक गरीबी, तमाम कमजोरियों के बाद जिंदा रखे हुए थी. उसे हर ट्रेन से किसी के आने का इंतजार तो था, जो उसे जिंदा रखे हुए था. बाप-मां के लिए नालायक तो वह पहले से ही हो गया था. 

दुनियावालों के लिए तो उसकी कोई अहमियत नहीं थी. उसकी जरूरत किसी को नहीं थी. इतना होने के बाद भी वो जिए जा रहा था, पता नहीं किसलिए जिए जा रहा था. पर आज कुछ हो गया था. वो उदास था. स्‍टेशन की उस पुलिया के नीचे, जहां वो अपना समय काटता था, उसका दोस्‍त बन चुका कालू कुत्‍ता भी आज उससे कुछ ज्‍यादा ही प्‍यार जता रहा था. वो उसकी गोद में बैठने का प्रयत्‍न करता ताकि बिरजू रोज की तरह उसको अपने हाथों से सहलाए, पर आज ऐसा कुछ नहीं हो रहा था. कालू थक कर उसकी पीठ की तरफ सो गया. अब वो भी बिरजू से प्‍यार जताना नहीं चाहता था.

फिर कालू उठकर कहीं चला गया. शायद गुस्‍सा था. सुबह बिरजू की लाश पटरियों पर मिली. पुलिस ने उसे उठाकर प्‍लेटफार्म पर रखवाया. एक सफेद चादर से ढंक दिया गया बिरजू के शव को. लोग आते जाते रहे, किसी ने भी मरने वाले के बारे में जानने की कोशिश नहीं की. बिरजू की किसी को जरूरत नहीं थी, लेकिन ऐसा नहीं था.

कालू अब भी उसके लाश के पास गुमसुम बैठा था. उसकी आंखों में आंसू थे. शायद इस बात के लिए कि वो आज बिरजू को छोड़कर गया ही क्‍यों. कालू शव गाड़ी के काफी पीछे तक दौड़ा लेकिन वो वहां तक पहुंच नहीं पाया. वापस लौट आया, उसी पुलिया के नीचे जहां उसने बिरजू को छोड़ दिया था. क्‍या पता बिरजू फिर आ जाए. आखिर उसके अलावा बिरजू को किसी और ने चाहा भी तो नहीं था.

(यह कहानी अनिल सिंह जी के फेसबुक वाल से साभार लेकर यहां प्रकाशित की गई है। आप इस अनिल सिंह के फेसबुक वाल पर भी पढ़ सकते हैं। इस कहानी के वास्तविक स्रोत पर जाने के लिए यहां क्लिंक करें)

Friday, October 11, 2013

वो सचिन का “असर” था...ये सचिन का “असर” है !

आगे बढ़ने से पहले..
मनीष शर्मा
(स्पोर्ट्स हेड: महुआ न्यूज)
बात 1995-96 की है| मैं उत्तर प्रदेश स्पोर्ट्स कॉलेज (लखनऊ) में था| दीपावली की छुट्टियों पर घर आया हुआ था| रिश्तेदारों, मुहल्ले और आस-पास के इलाकों में नाम हो चला था| मेरी माता, जिनकी पृष्ठभूमि पूरी तरह से ग्रामीण है, और जिनके लिए क्रिकेट का मतलब काला अक्षर भैंस बराबर था, का इसी वजह से खेल में इंट्रेस्ट पैदा हुआ| भारत का कोई मैच चल रहा था और सचिन आउट हो गए| मेरे मुंह से निकला: 

“ओह शिट, सचिन आउट हो गया....”

मम्मी ने खाना बनात-बनाते कहा;

“कोई बात नहीं सचिन आउट हो गया..तेंदुलकर तो बाकी है न, वो मैच जिता देगा”

ये वो बात है, जिसे लेकर आज भी मम्मी की खिंचाई करते हैं...

बहरहाल, ये वो दौर था, जब सचिन कमोबेश हर दिन हिंदुस्तान के घर-घर (गांव के दूर दराज के एरिया में भी) में चर्चा का विषय बन चुके थे...उनकी आभा एक नया मुकाम गढ़ने की ओर बढ़ रही थी...वो मां-बाप भी अपने बच्चों में सचिन को ढूंढने लगे थे, जिन्हें न क्रिकेट समझ में आती थी, न ही जिनकी खेल में तनिक भी रुचि थी| लेकिन सचिन ने ऐसे ही न जाने कितने लाखों-करोड़ों लोगों का क्रिकेट से परिचय ही नहीं कराया, बल्कि खेल का और अपना मुरीद भी बना दिया....इसमें उन घरेलू महिलाओं की संख्या भी बहुत बड़ी तादाद में थी, जिनकी दुनिया टीवी सीरियलों या रसोईघर तक ही सीमित थी....ये सचिन का असर था...

भारत तेजी से (उस दौर में) में आर्थिक तरक्की की ओर अग्रसर था और उदारीकरण के बाद अगर बाजार, या विदेशी कंपनियां और ज्यादा क्रिकेट पर मेहरबान होना शुरू हो गए, तो उसमें सचिन का असर सबसे बड़ा था...धोनी आज भले ही भारतीय बाजार और ब्रांड्स (विज्ञापनों) के बादशाह बने हुए हैं, लेकिन सच ये है कि इसकी नींव करीब डेढ़ दशक पहले सचिन ने ही रखी थी।

सचिन का पहली बार जब साल 1995 में वर्ल्ड टेल से करोड़ों का करार हुआ, तो वो मां-बाप जिनकी जुबां पर एक ही मुहावरा रहता था- “पढ़ोगे लिखोगे, बनोगे नवाब’, खेलोगे कूदोगे बनोगे खराब, बच्चों को खुद मैदान पर लेकर पहुंचने लगे....बेटे के सचिन बनने की उम्मीदों के साथ..ये सचिन का असर था.

वो भी समय आया, जब भारतीय टीम की जीत और सचिन और एक-दूसरे के पूरक बन गए...वो भी समय था, जब सचिन का चलना टीम की जीत होता था...सचिन का जल्द आउट होने का मतलब था टीम की हार....ऐसे भी करोड़ों क्रिकेटप्रेमी थे, जो सचिन के आउट होते ही टीवी का स्विच ऑफ यकर देते थे...ये दौर लंबे समय तक चला...और ये वो दौर (अच्छा खासा) था, जब सचिन वास्तव में खेल से बड़े हो गए!!


शायद मैं गलत हो सकता हूं कि लेकिन सचिन ने अपनी सर्वश्रेष्ठ क्रिकेट (चरम परफॉर्मेंस, कंसिस्टेंसी) 95 से 2000 तक खेली...कई प्रथम श्रेणी (रणजी, दलीप ट्रॉफी) क्रिकेटरों को मैंने सचिन की तकनीक की नकल करने पर घंटों पसीने बहाते देखा...कई क्रिकेटरों का करियर सचिन की नकल करते-करते खत्म हो गया...ये कहते कहते- “देख, सचिन की तरह ही खेला न ये शॉट”...ये सचिन का असर था, लाख कोशिशों के बावजूद इक्का दुक्का क्रिकेटर सचिन की तकनीक के आस-पास पहुंच पाने में कामयाब रहे..मसलन वीरेंद्र सहवाग। ये सचिन का असर था.....करोड़ों बच्चे मैदान पर सचिन बनने पहुंचने...कभी नहीं ही बन सकते थे...लेकिन टीम इंडिया को सहवाग मिल गए.. विराट कोहली मिल गए...ये सचिन का ही असर है...अब सचिन क्रिकेट से जा रहे हैं....ड्रेसिंग रूम में, भारतीय क्रिकेट में इससे बहुत ही बड़ा शून्य पैदा हो जाएगा??...क्या ये कभी भर पाएगा???...क्या हमारे मरने तक???.....क्या अगले सौ-डेढ़ सालों तक??........ये सचिन का असर है....और ये असर हमेशा रहेगा!!...ब्रह्मांड में क्रिकेट के अस्तित्व तक जब भी बड़े परिप्रेक्ष्य में क्रिकेट पर गंभीर चर्चा होगी, तो सचिन के इस असर की चर्चा अनिवार्य रूप से होगी ही होगी और करनी पड़ेगी...क्योंकि बिना इस चर्चा के क्रिकेट की हर बाइबल, महाभारत और क्रिकेट का हर ग्रंथ अधूरा रहेगा...धन्यवाद सचिन बहुत बहुत धन्यवाद...इतना ढेर सारा आनंद और गौरव देने के लिए...!

Wednesday, October 9, 2013

एहसास ...पहली बार लड़की होने का!

मनीष पाण्डेय
(फीचर संपादक:इंडिया टुडे)
एक दिन मेरी एक दोस्‍त ने पूछा, अच्‍छा ये बताओ, तुम्‍हें जिंदगी में पहली बार अपने लड़की होने और इस कारण लड़कों से कुछ अलग होने का एहसास कब हुआ। 

मैं सोचने लगी। 

जब पहली बार पीरियड्स हुए थे, तब? 

नहीं। 

लड़की होने की शुरूआत तो उसके बहुत पहले ही हो चुकी थी। बहुत बहुत पहले। तब मैं चौथी में पढ़ती थी। गर्मियों की छुट्टियां थीं। मैं और मेरे बड़े पापा के दोनों बेटे आम के पेड़ के नीचे सांप-सीढ़ी खेल रहे थे। एक भाई मुझसे दो साल बड़ा था और एक एक साल छोटा। तीनों लगभग हमउम्र थे। खेल बहुत क्रिटिकल मोड़ पर था। जीवन-मरण सब उस खेल में। किसे सांप काटेगा, किसको सीढ़ी मिलेगी। उस वक्‍त खेल के आगे कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा था। तभी अंदर से आवाज आई, 

मनीषा................................ 

मैंने सुनकर अनसुना कर दिया। आधे मिनट में फिर

मनीषा................................ इस बार आवाज ज्‍यादा तेज थी

मैं डर के मारे भागकर अंदर गई।

बड़ी मां बर्तन धो रही थी। मुझे तुरंत आदेश मिला, "ये सारे कप ले जाकर किचन में रखो।" मैंने दौड़कर कप किचन में पहुंचाए। "अब ये प्‍लेट भी रखो, ये बर्तन भी रखो, वो बर्तन भी रखो।" मैं दौड़-दौड़कर बर्तन किचन में पहुंचाती रही, लेकिन मेरा पूरा ध्‍यान तो खेल में लगा हुआ था। कहीं उन लोगों ने बेईमानी कर दी तो। कहीं सांप के आगे वाले खाने में अपनी गोटी रख दी दो। कहीं झूठमूठ सीढ़ी चढ़ गए तो। कहीं पांच को छह बोलकर सांप के मुंह से बचकर निकल गए तो। कहीं मैं हार गई तो।

लेकिन किसी को मेरे दिल से क्‍या, मेरे खेल से क्‍या। उन्‍हें तो बर्तन रखवाने थे किचन में। मैं काम निपटाकर वापस भागी तो फिर पांच मिनट में आवाज लगी। "बड़े पापा को चाय देकर आओ।" उसके बाद क्‍या हुआ, मुझे याद नहीं।

सिर्फ दौड़-दौड़कर बर्तन किचन में पहुंचाने की याद है मुझे।

उस दिन बहुत तकलीफ हुई थी। ठीक-ठीक समझ में नहीं आया लेकिन फिर भी दुख तो हुआ था कि भाई को क्‍यों नहीं बुलाया। छोटे वाले को न सही, तो बड़े को ही आवाज दी होती। उन तीनों में बर्तन रखने के लिए, चाय देने के लिए मुझे ही क्‍यों आवाज लगाई गई। बड़ी मां के लिए उस वक्‍त वो काम करवाना उतना इंपॉर्टेंट नहीं था, लड़की को घर का काम सिखाना इंपॉर्टेंट था। वो दिन भर किसी न किसी बहाने मुझे घर के काम सिखाने की कोशिश किया करती थीं।

..............................

वक्‍त गुजर गया। शायद मैं भूल भी गई थी। शायद मैं कभी नहीं भूली। शायद मेरे सबकॉन्‍शस में वो क्षण कैद हो गया। उस दिन मुझे लगा कि मैं अलग हूं। अपने भाइयों से अलग।

मैंने पल्‍लवी से कहा, "उस दिन मुझे पहली बार अपने लड़की होने का एहसास हुआ।"

उसके बाद तो इतनी कहानियां हैं, इतनी कहानियां कि शायद संसार के सारे कागज खत्‍म हो जाएं, लेकिन कहानियां खत्‍म नहीं होंगी।

(मनीषा पाण्डेय जी के फेसबुक वाल से साभार)

Thursday, October 3, 2013

दास्तां-ए-सिगरेट by श्रवण शुक्ल

((C) Copyright  @ श्रवण शुक्ल)
सिगरेट की दास्तां है अजीब! 
डिब्बी से निकली
माचिस की तिल्ली के साथ होंठों पर
फिर खत्म होते ही पैरों तले!

क्या अजीब है 
दास्तां-ए-सिगरेट!
जलते हुए फेफड़ों में
फिर दिल तक पहुंचता है
वही जो शरीर का कर्ता-धर्ता है
फिर आगे का तो है ही पता..!!

दिल से हवा में.
फिर होंठे से फेफड़े 
और फिर दिल तक!

कई दफे
यह दुष्चक्र
फिर दूसरी या चौथी बार में
फेफड़ों से दिल और फिर मष्तिष्क!

है न अलग?

और फिर दिशा-दशा,
सब बदल देती है

दिल की धडकनें तेज
पहुंचाके आसमां
पटकती है जमीं पर!

और जब ख़त्म..
तो आखिरी कश के साथ ही
खुद सिगरेट भी जमीन पर!

रौंद दी जाती है 
जमीं पर.. पैरों तले!

कुचलना भी है 
रगड़ना भी है 
पैरों से 
धूल में.. और आसमां तक!

बिखरना है, टूटना है 
फिर मिल जाना है
उसी मिटटी में.. हवा में!

जिसमें हम जीते हैं 
चलते हैं.. मिलते हैं 
हंसते हैं .. खेलते हैं
खाते हैं..लेकिन...
सिगरेट की हालत?

वह जो जमीं पर फेंका हुआ!
धूल-धूसरित होता हुआ
पड़ा रहता है 
अपने आखिरी अंजाम तक पहुंचने को..

ठीक ऐसे ही
तभी शुरू होती है
दूसरे सिगरेट का 
जीवन-मरण चक्र

है न अजीब?
दास्तां-ए-सिगरेट?
होंठो से पैरों तले.. रौंदे जाने तक!

ऐसा ही है मानव
जो सिगरेट
और दूसरी चीजों में
फर्क नहीं समझता, उपयोग करने तक!

बाद में फिर वही..
मिट्टी
होंठ-फेफड़े-दिल- मस्तिष्क
और जमीं!
है न अजीब?
दास्तां-ए-सिगरेट?

Monday, September 2, 2013

दास्तां

श्रवण शुक्ल
9871283999
तुम... तुम... और सिर्फ तुम
कुछ कहना नहीं
कुछ सुनना नहीं..
बस चाहत और तुम्हारी आहट
यही है .. हमारे दिल की दास्तां..

तुम जो कहो
तो तुम्हारे पास आ जाएं
आशिकी भी करें
आवारगी भी करें
और तुम्हारे हो जाएं
अब तुम भी कहो.. कुछ अपनी दास्तां

हम और कुछ कह नहीं सकते
कुछ और सुन नहीं सकते
सिवाय तुम्हारे इश्क के
हम अब रह नहीं सकते

और क्या कहें?
सबकुछ तो कह चुके नहीं..
आखिरी शब्द यही हैं..
जीना है, मरना है.. सिर्फ तुम्हारे साथ
लो खतम हो गयी हमारी दास्तां..!

(C) कॉपीराइट@ श्रवण शुक्ल

Thursday, April 11, 2013

यकीन दिला दूंगा कि मैं बुरा था, मगर इतना भी नहीं


श्रवण शुक्ल: बस जो दिल को छू जाए...
लाइफ है बॉस..झटके खाने के लिए..



यादों में कितने दफा
तुम्हारी गली, तुम्हारा दर्द पुकारता रहा
मगर क्या करूं? मुझसे ही आया न गया
एक गम जो मैंने दिया था तुम्हे
मुझसे भुलाया न गया
उस रोज मैं यहां से गया था, यह सोचकर, कि लौट आऊंगा
एक वादा जो किया था तुमसे, वो निभा जाऊंगा
मगर शायद उस वक्त ज़िन्दगी को यह मंजूर नहीं था
वरना मैं इस कदर भी मजबूर नहीं था
अभी भी वक्त है .. हां वक्त है अभी
लेकिन यह वादा है खुद दे
कि एक दिन तुम्हारे सामने आऊंगा
तुमने जो किया था, वह हर शिकवा मिटा जाऊंगा
यकीन दिला दूंगा कि मैं बुरा था, मगर इतना भी नहीं
वरना तुम्हारा हर इलज़ाम अपने सर उठा लूंगा
जो कर पाया अगर इतना भी नहीं

तेरे बिन, तेरे बिन डर सहा
लम्हा –लम्हा कैसे कटा
साथ चले पर राह में पिछड़े
मैं कहा तू कहा आ आ आ आ
तेरे बिन तेरे बिना तेरे लिए
तेरे बिन तेरे बिन ऐसे जिए
गम और ख़ुशी, लेके कभी
जी लिए, मर लिए
देरे न, देरे न देरे न....

Roman hindi.. I just luv this track
Yaado me Kitni dafa
Tumhari Gali Tumhara Dard Pukarta Raha
Magar Kya karoo Mujhse hi aaya na gaya
Ek gum jo maine diya tha tumhe
Mujhse bhulaya na gaya
Us roz main yaha se gaya tha ye sochkar ki laut aaunga
Ek wada jo kiya tha tumse wo nibha jaunga
Magar shayad us waqt zindagi ko ye manzoor nahi tha
Warna main is kadar bhi majboor nahi tha
Abhi bhi waqt hai... haa waqt hai abhi
Lekin ye wada hai khud se
Ki ek din tumhare saamne aaunga
Tumne jo kiya tha wo her shikwa mita jaaunga
Yakeen dila dunga ki main bura tha magar itna bhi nahi
Warna tumhara her ilzaam apne sir utha lunga
Jo kar paya aagar itna bhi nahi.
Tere Bin tere bin dard saha
Lamha lamha kaise kata
Saath chale per raah me bichre
Main kaha tu kaha aa aa aaa
Tere bin tere bin tere liye
Tere bin tere bin aise jiye
Gum or khushi leke kabhi
Ji liye mar liye
Dere na dere naa aa

Monday, April 8, 2013

अखबार के मालिक और मेरी भिड़ंत: अरुणेश सी. दवे


अख़बारों के नजरिए में पाठक, बोले तो-रै बेवकूफ़ भारतीय आम आदमी..आगे पढ़ें....

शाम के वक्त एक साहित्य प्रेमी अमीर मित्र का फ़ोन आया। उनके फ़ार्म हाउस में वाईन एंड डाईन का न्योता था।  मुफ़्त में पैग लगाने की खुशी में हम दनदनाते पहुंच गये। वहां एक सज्जन और विराजमान थे। मित्र ने मेरा उनसे परिचय करवाया। वे मध्य भारत के सबसे बड़े अखबार के मालिक और संपादक थे। उन्होने ससम्मान मुझसे हाथ मिलाया। मित्र ने मेरा परिचय दिया- "भाईसाहब बड़े अच्छे व्यंग्य कार हैं।" यह सुनते ही सज्जन के चेहरे पर तिरस्कार के भाव उभरे। मन ही मन उन्होने अनुमान लगाया कि जरूर इस लेखक की चाल होगी। पार्टी के बहाने अपने लेख पढ़वायेगा। पर टेबल पर रखी शीवाज रीगल की बोतल देख, उनकी नाराजगी कुछ कम हो गयी। मन मार कर बोले- "चलिये इसी बहाने आपसे मुलाकात हो गयी।"
मैने भी मन ही मन सोचा, भाड़ में जाये मुझे इनसे क्या लेना देना। अपन तो पैग लगाओ। यहां वहां की चर्चा होती रही। और अखबार के  मालिक साहब इंतजार करते रहे कि कब मै अपनी रचना उन्हे दिखाउंगा । दो राऊंड होने के बाद भी जब लेख प्रकाशित करने की कोई चर्चा न हुई। तो मालिक साहब का माथा ठनका। पांच राउंड होने के बाद तो सब गहरे मित्र बन जाते हैं। ऐसे में बात टालते न बनेगी।  मालिक साहब ने बात मेरे लेखन पर मोड़ी बोले- "भाई साहब, कोई रचना साथ लाये हैं क्या। मैने पूछा- "किस लिये श्रीमान।" हकबकाये मालिक साहब ने कहा- " अखबार में छपवाने के लिये और क्यों।"  मैने पूछा- "किस अखबार में छपवाने के लिये ?" वे बोले- अरे भाई, मैं छापूंगा तो अपने अखबार मे ही ना। लगता है आप मेरी बात कुछ समझे नही।" मैने कहा- "आप तो कोई अखबार निकालते ही नहीं हैं श्रीमान।"  मालिक साहब ने असहाय भाव से मित्र की ओर देखा। मानो कह रहें हो ’कैसे आदमी के साथ बैठा दिया दो पैग में ही लग गयी है।’

मालिक साहब ने याद दिलाया- "अरे भाई मै  फ़लां अखबार का मालिक संपादक हूं, भूल गये क्या आप।" मैने पलट कर जवाब दिया- "वो तो अखबार है नही, सत्तारूढ़ पार्टी का मुखपत्र है। भाट और चारण जैसे चाटूकारिता करने वाला। अंतर यही है कि सरकार की छोटी मोटी गलतिया छाप दी जाती है । हां कभी कभी उसमे मंहगाई का जिक्र जरूर कर दिया जाता है।" मालिक साहब बैकफ़ुट पर थे- "आप गलत समझ रहे हैं। हमारा अखबार दूसरो से अलग है। हम किसी के दबाव में नही आते।" मैने कहा- "आम जनता को टोपी पहनाईगा मालिक साह्ब, हमे नही। सरकार के हर विभाग में खुला कमीशन बट रहा है। घपले हो रहे हैं। और आपके पत्रकार भी भीख मांगते वहीं पाये जाते हैं। कभी छापा आपने ?  क्या छापते हैं आप-  "अन्ना हजारे ने अपने भांजे को कांग्रेस में भरती किया" "बाबा रामदेव खुद को राम कह रहे हैं।" शांती भूषण नजर आ रहा है आपको। भ्रष्टाचार का प्रदूषण नही।  सलवा जुड़ूम के नाम पर हो रहा अत्याचार तो खैर आपको मालूम ही न होगा। नक्सलवाद की चक्की पर पिस रहे आदिवासियो के बारे में क्या किया आपने ? कुछ नही। छापते क्या हैं आप- "चमत्कारी अंगूठी", "फ़र्जी बाबाओ के विज्ञापन"। और तो और  वो लिंगवर्धक यंत्र का कभी उपयोग किया है आपने क्या मालिक साहब जो दूसरो को बतलाते हो ।

बात बिगड़ती देख, मालिक साहब ने समझौते का प्रयास किया- "आप इतने जोशीले आदमी हैं। लेख भी जानदार लिखते होंगे।" मैने कहा- "लिखता तो हूं, पर छापने की हिम्मत आपमे न होगी।  छाप पायेंगे उन कंपनियो की काली करतूत। जिनके शेयर आपने सस्ते दामो में ले रखे हैं। जिनके करोड़ो रूपये के एड आपके मुखपत्र को मिलते हैं। आप तो छापिये दलित लड़की से बलात्कार, सड़क हादसे, ब्लागरो से चुराये हुये लेख।" फ़िर हमने हाथ होड़ कर कहा- " हे फ़्री प्रेस के चाचा, फ़्री मे ब्लागरो के लेख पाओ और जनता को दिखाने के लिये बड़े नाम की तारे और मच्छर पर घटिया तुकबंदी छपवाओ। पर अपने को अखबार बस मत कहो।" आज भारत का चौथा स्तंभ न  बिकता, तो मजाल है भारत में ये भ्रष्टासुर पैदा हो जाता।"

अब तक चार राउंड हो चुके थे। मालिक साहब भी क्रोध में आ चुके थे । वे  जोर से चिल्लाये- "रै बेवकूफ़ भारतीय आम आदमी। इसके जिम्मेदार खुद तुम लोग हो। तुमको हर चीज फ़ोकट में चाहिये पैसा जेब से एक न निकलेगा। बस दुनिया मुफ़्त में तुम्हारी रक्षा करे। दो रूपये किलो वाला सस्ता चावल जैसे २ रूपये में सस्ता अखबार चाहिये। तो कनकी ही मिलेगा बासमती नही। बीस रूपया महिना खर्चा कर एक पत्रिका तो खरीदना नही है। कहां से रूकेगा भ्रष्टाचार। कागज का दाम मालूम है ? अखबार के खर्चे कैसे पूरे होते होंगे कभी सोचा है? तुम खुद पैसा कमाओ तो ठीक और हम लोग तुम्हारे लिये भूखा मरें। बात ध्यान से सुन - "हम लोग तुझको अखबार बेचते नहीं है। सस्ते दाम में तुझे अखबार देकर तुझको खरीद लेते हैं।"  फ़िर हम तुझे बेचते हैं उन कंपनियो को। जो हमे तुम्हारा सही दाम देती हैं। उन नेताओ को जो तुम्हारे पैसे मे ऐश करते हैं और हमे भी करवाते हैं । पैसा देकर तुम्हारी तरह फ़ोकट नही। और सुन तुझे और लोग भी खरीदते हैं सी आई ए से लेकर तमाम विदेशी। ताकि वे अपने हिसाब का लेख छपवा कर भारत में मन माफ़िक जनमत तैयार करवाएं और अपना माल खपाएं। किसी पेपर में पढ़ता है क्या कि अमेरिकी विमान रूस के समान विमान से डेढ़ गुनी कीमत के पड़ते हैं। या परमाणू रियेक्टर की कीमतो का तुलनात्मक अध्ययन। नही न क्यों क्योंकि तुम लोग पैसा नही देते उन लोग देते हैं।" फ़िर मालिक साहब ने हमारी ही तर्ज पर हमे हाथ जोड़ कहा- तो हे फ़ोकट चंद भिनभिनाना बंद कर और चैन से मुझे पैग लगाने दे।"

मैने फ़जीहत से बचने के लिये अपने मित्र की ओर देखा। पर वह तो चैन से मजा ले रहा था। अब मुझे समझ में आया। ये सारा युद्ध प्रायोजित था  मै और मालिक साहब रोमन ग्लेडिएटर की तरह उसके मजे के लिये लड़ रहे थे। मैने प्रतिरोध किया-" मालिक साहब देशभक्ती भी कोई चीज है कि नहीं। मालिक साहब बोले- "है क्यो नही दवे जी। हम लोग दाल में नमक की तरह उसको भी इस्तेमाल करते हैं। तभी तो ये देश आज बचा हुआ है। राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले मे हम कोई समझौता नही करते। अरे भाई अगर देश ही नही रहेगा तो फ़िर तो हम ऐश कैसे करेंगे। पर भाई लोगो को जब इंडिया टीवी मे भूत प्रेत देखने में मजा आ रहा है तो कोई क्यो खोजी पत्रकारिता कर अपना जीवन बरबाद करे।"

 अब तक पांच राउंड हो चुके थे और हम और मालिक साहब  गहरे मित्र भी बन चुके थे। मालिक साहब बोले- यार वैसे तू बंदा बड़ा जोशीला है। तुझे व्यस्त न किया गया और सरकारी माल न दिया गया तो  नक्सली नेता बन जायेगा और फ़ोकट में मारा जायेगा। एक काम कर भाई  कल से मेरे आफ़िस आजा। दिन भर यहां वहां से सामग्री चुराना और जरा जोश भर के उसमे हेर फ़ेर कर देना। तू भी खुश रहेगा और मुझे भी चैन से पीने और जीने देगा।"

 मालिक साहब के विदा होने के बाद मैने दोस्त को धिक्कारा- " धुर कमीना है तू। अपने ही दोस्तो को इनवाईट कर आपस में लड़ा कर मजा लेता है।  मित्र भी दार्शनिक बन गया- " मालिक साहब की बात भूल गया। कोई भी चीज फ़ोकट में नही मिलती बेटा।  दारू का खर्चा मैने किया था तो मजे लेने के लिये ही न।"

अरुणेश जी के ब्लॉग से साभार: ब्लॉग पर जाने के लिए यहां क्लिक करें.

Monday, March 25, 2013

अंग्रेजों का वहशीपन और 'शहादत में ही हमारी जीत है: भगत सिंह'


मुंबई। 23 मार्च 1931 को शाम 7.30 बजे भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को लाहौर जेल में फांसी दे दी गई थी। भगत सिंह की उम्र वक्‍त महज 23 साल थी, लेकिन इतनी सी उम्र में उन्‍हें पता था कि बिखरे हुए भारत को कैसे एकसाथ खड़ा किया जा सकता है। वो हमेशा कहा करते थे,‘हमारी शहादत में ही हमारी जीत है।’ भारत की आजादी के लिए जो वह सोचते थे उस पर उन्‍हें पूरा भरोसा था और उन्‍होंने बिना हिचक अपनी जिंदगी दांव पर लगा दी। ऐसा नहीं था कि उन्‍होंने जोश में ये कदम उठाया था बल्कि वह जानते थे कि उनकी शहादत से ही देश के लिए आजादी का रास्‍ता खुलेगा। भगत सिंह ने महात्‍मा गांधी का सम्‍मान किया, लेकिन कई मामलों पर उनके मतभेद थे ये बात सभी जानते हैं, लेकिन 23 साल के भगत सिंह उस समय अंग्रेजों के लिए महात्‍मा गांधी से भी बड़ी चुनौती बन गये थे। भगत सिंह ने बिना कोई पद यात्रा किए, बिना हजारों लोगों को जुटाए सिर्फ अपने और चंद साथियों के दम अंग्रेजों को लोहे के चने चबाने को मजबूर कर दिया था। शायद यही कारण रहा कि अंग्रेजों ने न केवल उन्‍हें फांसी पर चढ़ाया बल्कि उनके शवों को भी क्षत-विक्षत किया और टुकड़ों में शवों को काटकर अधजली हालत में सतलुज नदी में बहाया गया। आइये जानते हैं 23 मार्च 1931 के दिन आखिर क्‍या हुआ था?      

11 घंटे पहले लिया गया फांसी का फैसला

अंग्रेज सरकार भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी देने का मतलब अच्‍छी तरह से जानती थी। उसे पता था कि इन तीनों नौजवानों को फांसी देने से पूरा देश उठ खड़ा होगा, लेकिन उसे ये भी पता था कि अगर ये तीनों जिंदा रहे तो जेल में बैठे-बैठे ही क क्रांति का बिगुल बजा देंगे, इसलिए भगत सिंह को फांसी देने के लिए पूरा सीक्रेट प्‍लान तैयार किया गया और 23 मार्च यानी फांसी के दिन से सिर्फ 11 घंटे पहले ये तय किया गया कि भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु को कब फांसी देनी है। अंग्रेज सरकार ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को उसी दिन फांसी की खबर दी, जिस दिन उन्‍हें फांसी पर चढ़ाया जाना था।

शाम 7.33 बजे दी गई फांसी 

23 मार्च 1931 को शाम में करीब 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फांसी दे दी गई। फांसी पर जाने से पहले वे लेनिन की नहीं बल्कि राम प्रसाद बिस्मिल की जीवनी पढ़ रहे थे। कहा जाता है कि जेल के अधिकारियों ने जब उन्हें यह सूचना दी कि उनके फांसी का वक्‍त आ गया है तो उन्होंने कहा था- ठहरिये! पहले एक क्रान्तिकारी दूसरे से मिल तो ले। फिर एक मिनट बाद किताब छत की ओर उछाल कर बोले -ठीक है अब चलो।

रात के अंधेरे में शवों के साथ वहशियाना सलूक 

अंग्रेजों ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी खबर को बहुत गुप्‍त रखा था, लेकिन फिर भी ये खबर फैल गई और लाहौर जेल के बाहर लोग जमा होने लगे। अंग्रेज सरकार को डर था कि इस समय अगर उनके शव परिवार को सौंपे गए तो क्रांति भड़क सकती है। ऐसे में उन्‍होंने रात के अंधेरे में शवों के टुकड़े किये और बोरियों में भरकर जेल से बाहर निकाला गया। शहीदों के शवों को फिरोजपुर की ओर ले जाया गया, जहां पर मिट्टी का तेल डालकर इन्‍हें जलाया गया, लेकिन शहीद के परिवार वालों और अन्‍य लोगों को इसकी भनक लगी तो वे उस तरफ दौड़े जहां आग लगी दिखाई दे रही थी। इससे घबराकर अंग्रेजों ने अधजली लाशों के टुकड़ों को उठाया और सतलुज नदी में फेंककर भाग गये। परिजन और अन्‍य लोग वहां आए और भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के शवों को टुकड़ों को नदी से निकालाकर उनका विधिवत अंतिम संस्‍कार किया।

शहादत के बाद भड़की चिंगारी 

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत की खबर को मीडिया ने काफी प्रमुखता से छापा। ये खबर पूरे देश में जंगल की आग तरह फैल गई। हजारों युवाओं ने महात्‍मा गांधी को काले झंडे दिखाए। सच पूछें तो देश की आजादी के लिए आंदोलन को यहीं से नई दिशा मिली, क्‍योंकि इससे पहले तक आजादी के कोई आंदोलन चल ही नहीं रहा था। उस वक्‍त तो महात्‍मा गांधी समेत अन्‍य नेता अधिकारों के लिए लड़ रहे थे, लेकिन भगत सिंह पूर्ण स्‍वराज की बात करते थे, जिसे बाद में गांधी जी ने भी अपनाया और हमें आजादी मिल सकी।

साभार: हिंदी.इन.कॉम

Monday, February 4, 2013

यह कैसा दर्द है भाई..!

मनोज भट्ट
मनोज दिनेश चन्द्र भट्ट
अतिथि लेखक
(लेखक युवा पत्रकार हैं)

एक गुजारिश है यारों तुमसे,
कोई बाहर निकाले मुझे इस गम से!
बड़ी तकलीफ होती है,
जब उनका ख्याल आता है!
आंखो में आंसू, सीने में दर्द,
और दिल में न जाने कैसा तूफां आता है!
मुझे पता है, हाल उस ओर भी, कुछ ऐसा ही होगा!
सीने में लौ जगी होगी, मेरी मोहब्बत की
और आंसुओं के दरिया में, गुस्से का सैलाब होगा!
द्वंदों के महासमर के बाद भी,
उनके हांथों में तस्वीर होगी मेरी,
और खुदा के लिए तंज होगा!
कोई बताए, यह कैसा दर्द है भाई?
कोई जाए, और उधर भी मरहम लगाए भाई.......! 

Friday, February 1, 2013

‘विश्‍वरूप’ रिलीज हुई, लोगों ने सराहा

नई दिल्ली (श्रवण शुक्ल): अभिनेता कमल हासन की फिल्‍म `विश्‍वरुपम` का हिंदी संस्करण ‘विश्वरूप’ आज दिल्‍ली, लखनऊ, नॉएडा समेत उत्‍तर भारत के सभी शहरों में रिलीज हो गई। फिल्म देखने के बाद सभी लोगों ने कलम हासन के साहस की तारीफ़ की है।

आज थोड़े अफरा तफरी के माहौल के बाद यूपी में भी फिल्म रिलीज हो गई। हालांकि सिनेमाघरों तक प्रिंट के समय पर न पहुंचने की वजह से लखनऊ में सुबह के शो कैंसिल कर दिए गए, लेकिन इसमें प्रतिबन्ध जैसी कोई बात नहीं थी। उधर नॉएडा के सिनेमाघरों में आज सुबह से ही काफी चहल पहल दर्ज की गई।

‘फिल्म अलकायदा और तालिबान की
पृष्ठिभूमि में बनी है, इस फिल्म को
लेकर भारतीय मुस्लिमों का
हाय-तौबा मचाना समझ से
परे है’: राहुल पल्हानिया
लोगों ने फिल्म की तारीफ करते हुए बताया कि फिल्म से आपको तालिबानी और अलकायदा आतंकियों की वास्तविकता को जानने का मौका मिलता है। ऐसी फिल्म बनाने के लिए कमल हासन के साहस को मानना पड़ेगा कि उन्होंने इस फिल्म के लिए अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया।

नॉएडा के एक सिनेमाघर में फिल्म देखने पहुंचे एक युवा ने बातचीत में कहा कि हमने सुबह का शो देखने का फैसला किया, क्योंकि हम उत्तर-प्रदेश सरकार के बयान के बाद से असमंजस में थे कि कहीं फिल्म को प्रतिबंधित न कर दिया जाए।

फिल्म देखने के बाद बाहर निकले राहुल पल्हानिया नाम के युवक ने कहा, ‘फिल्म बहुत साफ़ सुथरी है, इसमें ऐसा कुछ भी नहीं, जिसमें किसी को भी आपत्ति हो’। युवक ने आगे जोड़ा, ‘फिल्म अलकायदा और तालिबान की पृष्ठिभूमि में बनी है, इस फिल्म को लेकर भारतीय मुस्लिमों का हाय-तौबा मचाना समझ से परे है’। ऐसे ही कुछ विचार फिल्म देखकर निकले मुस्लिम युवक उस्मान ने व्यक्त किए।

उस्मान ने कहा, ‘फिल्म वास्तविकता को दर्शाती है, मुझे जहां तक लगता है कि अबतक मेरे द्वारा देखी गई आतंक पर आधारिक बेहतरीन फिल्म है। इस फिल्म को देखने के बाद मुझे उन लोगों पर दया आ रही है जो बिना फिल्म देखे ही विरोध कर रहे हैं। ऐसी फ़िल्में बननी चाहिए’। फिल्म देखकर निकले उस्मान के चेहरे पर काफी सुकून नजर आया, क्योंकि फिल्म देखने पहले उन्हें काफी निगेटिव रिव्यूज मिले थे।

वहीं फिल्म देखकर निकलती ज्योति नाम की युवती ने फिल्म के बारे में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि फिल्म में तालिबानी और अलकायदा सदस्यों द्वारा महिलाओं पर अत्याचार को भी अहम् जगह दी गई है। यह फिल्म न सिर्फ आतंक पर आधारित है बल्कि इस फिल्म में तालिबानी शासन के दौरान महिलाओं की सामाजिक स्थिति पर भी रोशनी डाली गई है।

आज फिल्म के रिलीज होने के बाद लगभग सभी सिनेमाघरों के बाहर और अन्दर सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए थे। इस बीच, कहीं से भी किसी भी प्रकार की कोई अप्रिय घटना की जानकारी नहीं है।

Thursday, January 24, 2013

बोलो धत्त तेरे की by राजीव दीक्षित

नमस्कार को टाटा खाया, नूडल को आंटा !! 
अंग्रेजी के चक्कर में हुआ बडा ही घाटा !! 
बोलो धत्त तेरे की !! 

माताजी को मम्मी खा गयी, पिता को खाया डैड !! 
और दादाजी को ग्रैंडपा खा गये, सोचो कितना बैड !! 

बोलो धत्त तेरे की !! 

गुरुकुल को स्कूल खा गया, गुरु को खाया चेला !!
और सरस्वती की प्रतिमा पर उल्लू मारे ढेला !!
बोलो धत्त तेरे की !!

चौपालों को बियर बार खा गया, रिश्तों को खाया टी.वी. !!
और देख सीरियल लगा लिपिस्टिक बक-बक करती बीबी !!
बोलो धत्त तेरे की !! 

रस्गुल्ले को केक खा गया और दूध पी गया अंडा !!
और दातून को टूथपेस्ट खा गया, छाछ पी गया ठंढा !!
बोलो धत्त तेरे की !! 

परंपरा को कल्चर खा गया, हिंदी को अंग्रेजी !! 
और दूध-दही के बदले चाय पी कर बने हम लेजी !!
बोलो धत्त तेरे की !!


स्वदेशी आन्दोलन के आधुनिक अगुवा राजीव जी की यह कविता बेहद प्रासंगिक है..! उन्हें नमन

Friday, January 18, 2013

ऐ ज़िंदगी, तुझे क्या दूं?


ऐ ज़िंदगी,
तुझे क्या दूं?
मौत का तोहफ़ा
या ज़िंदगी का गम?
चुनना तुझे ही है,
मै तो बस तेरा साया हूं!!

तू ऐसे ही
तड़पाती रह मुझे,
खुशी देकर
रुलाती रह हमें,
तुझे समझना है
अपना हूं या पराया हूं!!

जिनकी कभी
आदत भी नहीं,
उन्ही को
जोड़ दिया हमसे,
कभी सोचा?
तेरे पास क्यों आया हूं!

गलतियां
इतनी हसीं करती है,
रुलाकर फिर
हंसाने की सोचती है?
क्यों ऐसा?
जैसे
तू ही मुझमें समाया है!

ऐ ज़िंदगी
तुझे क्या दूं?
मौत का
या जिंदादिली का नाम?
स्वीकारना
तुझे ही है
तू लाई है
मुझे?
या
मैं खुद तेरे लिए आया हूं?
:स्वरचित(श्रवण शुक्ल"बालमन")
यह पोस्ट आप मेरे ब्लॉग पर भी पढ़ सकते हैं

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