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Friday, December 7, 2012

'पता होता.....तो मैं मुसलमान न बनती'


ईसाई पिता और यहूदी मां की बेटी रेचल साराह लूई ने 15 साल की उम्र में इस्लाम धर्म अपना लिया. लेकिन एक नए मुसलमान का ये रास्ता उनके लिए बहुत मुश्किल निकला.
इसलिए नहीं कि उनका अपना परिवार इस फैसले से नाखुश था, बल्कि इसलिए क्योंकि जिस धर्म से वो जुड़ीं, उसी के लोगों ने उन्हें नहीं अपनाया.
एक मुसलमान की तरह जीते हुए अब 15 साल गुज़र चुके हैं. रेचल पीछे मुड़कर देखती हैं तो कहती हैं, ''अगर मैं इस्लाम पर किताबें पढ़ने से पहले समुदाय के लोगों से मिली होती तो कभी मुसलमान ना बनती. आखिर इतनी कड़वाहट के बीच कोई क्यों रहना चाहेगा.''
इस बात में गहरा दुख और हताशा दोनों ही छुपी थीं. मैंने टटोला तो रेचल ने कई बातें बताईं. एक पाकिस्तानी मुस्लिम परिवार में जब रेचल की शादी की बात चली, तो रिश्ता ठुकराते हुए उन्होंने कहा कि रेचल उनके जैसी मुसलमान नहीं है.
कई साल बाद रेचल ने अपने जैसे एक 'नए मुसलमान' (जिसने इस्लाम अपनाया हो) से शादी की और अब उनकी 6 साल की बेटी है. लेकिन रेचल के मुताबिक उनके पति ही नहीं उनकी बेटी को भी मुसलमान परिवारों के भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है.
उन्होंने कहा, ''मेरी बेटी आइशा ये सबकुछ बहुत चुपचाप झेल लेती है. एक बार उसे एक मुसलमान परिवार ने कहा कि वो उनके बच्चों के साथ नहीं खेल सकती, तो उसने कहा कोई बात नहीं, और चली आई. जबकि नए मुसलमान परिवारों के साथ वो बड़े प्यार से घुलमिल जाती है.''
रेचल कहती हैं कि अब वो ऐसे परिवारों से ही ज़्यादा मेलजोल रखते हैं.

ब्रिटेन में बढ़ते ‘नए मुसलमान’

ब्रिटेन में ईसाई धर्म के बाद सबसे ज़्यादा लोग इस्लाम को मानते हैं, और ये धर्म ब्रिटेन में सबसे तेज़ी से बढ़ रहा है क्योंकि हर साल हज़ारों लोग अपना धर्म छोड़कर, इस्लाम को क़बूल रहे हैं.
ब्रिटेन स्थित एक गैर सरकारी संस्था, 'फेथ मैटर्स' के सर्वे के मुताबिक वर्ष 2010 तक ब्रिटेन में 1 लाख लोगों ने अपना धर्म छोड़ इस्लाम को अपनाया. सर्वे ने पाया कि वर्ष 2010 में ही 5,000 से ज़्यादा लोग मुसलमान बने.
नए मुसलमानों ने अब अपने संगठन बनाए हैं, ताकि एक-दूसरे को सहारा देकर एक समुदाय का हिस्सा होने का अहसास मिले.
वहीं मस्जिदों में नए मुसलमानों को पैदाइश से मुसलमान रहे लोगों के साथ जोड़ने के लिए खास आयोजन किए जा रहे हैं.
मैनचेस्टर की डिड्सबरी मस्जिद में ऐसे कार्यक्रमों की देखरेख करनेवाले डॉक्टर हसन अलकतीब मुसलमानों के बीच किसी तरह के भेदभाव को नकारते हुए कहते हैं कि इस्लाम तो ऐसा धर्म है जो सबको साथ लेकर चलता है.
डॉ. अलकतीब के मुताबिक, ''इस्लाम में हमें अपने मज़हब के बारे में जानकारी फैलाने के लिए कहा जाता है. एक इंसान को इस्लाम में लाना दुनियाभर की जायदाद पाने से बेहतर है, जबकि इसमें हमें कोई निजी फ़ायदा नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारी और काम बढ़ जाता है.''
हालांकि वो ये मानते हैं कि नए मुसलमानों को इस्लाम की बारीकियां समझने में और पैदाइश से मुसलमानों को इन नए लोगों को अपनाने में समय लगता है और इसके लिए मस्जिदों को मेलजोल बढ़ाने के और आयोजन करने चाहिए.

नस्ली भेदभाव की जड़

रेचल का अनुभव इकलौता नहीं है. लिवरपूल युनिवर्सिटी में पढ़ा रहे डॉक्टर लिओन मुसावी खुद एक मुसलमान हैं. अपने रिसर्च में उन्होंने कई नए मुसलमानों के अनुभवों के बारे में लिखा है.
डॉक्टर मुसावी बताते हैं, ''कई नए मुसलमानों ने मुझे बताया कि मस्जिदों और कम्यूनिटी सेंटर्स में उनका आना पसंद नहीं किया जाता. उनके साथ नस्ली भेदभाव किया जाता है. कभी तंज़ कस कर, कभी पत्थर फेंक कर, और कभी तो नौबत मार पीट तक आ जाती है. जबकि इस्लाम ऐसे भेदभाव को एकदम ग़लत बताता है.''
पैदाइश से मुसलमान लोगों के द्वारा ना स्वीकार किए जाने की बात 'फेथ मैटर्स' के सर्वे में भी उभर कर आती है.
नए मुसलमानों का कहना है कि इस्लाम अपनाने के बाद वे इस मजहब के उसूलों को तो मानने लगते हैं, मगर उनकी ज़िंदगी जीने के तरीक़े पैदाइशी मुसलमानों से अलग ही रहते हैं- चाहे वो खान-पान हो, रहन सहन हो या पारिवारिक रिश्ते निभाने के तरीके.
जानकारों के मुताबिक नए मुसलमानों के इस अलग ढंग की वजह से ही कुछ पैदाइशी मुसलमान उन पर पक्का मुसलमान न होने का ठप्पा लगा देते हैं.
एक ही धर्म को मानने वाले लोगों में पैदा हुई ये खाई पाटने में संगठित कोशिशें सहायक हो सकती हैं लेकिन ये तब तक कारगर नहीं होंगी जब तक निजी स्तर पर पैदाइश से मुसलमान रहे लोगों के मन में नए मुसलमानों के लिए जगह बन जाए.

दिव्या आर्य
साभार-बीबीसी
दिव्या आर्य
बीबीसी संवाददाता, लंदन



Wednesday, December 5, 2012

नेपाल को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित करना धोखा: सिंघल


नई दिल्ली/काठमांडू: नेपाल एकमेव हिन्दूराष्ट्र के रूप में पहचाना जाता रहा है। नवीन जनगणना के अनुसार देश की 81 प्रतिशत जनसंख्या हिन्दू है और ओंकार परिवार सहित 94 प्रतिशत होने के बाद भी नेपाल को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित करना, नेपाली समाज के साथ धोखा ही नहीं षड्यंत्र भी है।
                धर्मनिरपेक्षता की आड़ में धर्मान्तरण के कानून की खुली अवहेलना करते हुए चर्च के माध्यम से धर्मान्तरण हो रहा है। भारी मात्रा में अमेरिका व यूरोप से इस कार्य के लिए धन आ रहा है। इसमें अन्तरराष्ट्रीय गैर सरकारी संगठन (आई. एन. जी. ओ.) सहयोग कर रहे हैं।
                सरकार धर्मान्तरण के कानून को और कठोर बनाए तथा लागू भी करे तो सामूहिक धर्मान्तरण रोका जा सकता है। बंगलादेशी मुसलमानों की भारी मात्रा में घुसपैठ हो रही है। असम क्षेत्र में बंगलादेशी मुसलमानों के द्वारा जो हमले हो रहे हैं उसके कारण बोडो क्षेत्र के हिन्दुओं को घर छोड़ने के लिए बाध्य किया जा रहा है। वे शरणार्थी का जीवन जी रहे हैं। नेपाल में भी यदि इसको रोकने के लिए कानून नहीं बनाया गया तो यहाँ भी यही स्थिति पैदा होगी। इसलिए सरकार को बंगलादेशी मुसलमानों के प्रवेश पर रोक लगानी चाहिए तथा देश में अवैध रूप से घुसे हुए बंगलादेशी मुसलमानों को खोजकर बाहर करना चाहिए। धर्मनिरपेक्षता की आड़ में ही यह सब हो रहा है।
                गोरक्षा का कानून नेपाल में है किन्तु उसकी पूरी तरह से अवहेलना हो रही है जिसके कारण हजारों की संख्या में गोधन बंगलादेश जा रहा है। देश में भी अवैध रूप से जगह-जगह पर गोवध हो रहा है तथा होटलों में भी गोमांस का खुलकर प्रयोग किया जा रहा है। इसको रोकने के लिए नेपाल सरकार को कड़े कानून बनाने एवं लागू करने की जरूरत है।
                धर्म विरोधी तत्वों द्वारा वेद अध्ययन के 300 विद्यालय जो नेपाल की हिन्दू जनता ने भिक्षा दान के आधार पर संचालित किए थे, बन्द करवा दिए गए जिसके कारण हमारे मन्दिरों के लिए पुजारी एवं पौरोहित्य कार्य के लिए योग्य कर्मकाण्डी पंडितों का अभाव होता जा रहा है। यह हिन्दू धर्म, हिन्दू समाज एवं हिन्दू संस्कृति पर बहुत बड़ा सीधा प्रहार है। समाज को वेद विद्यालयों का संचालन, संरक्षण करते हुए इस कार्य को पूरा करना चाहिए। पहले माध्यमिक शिक्षा तक संस्कृत एक अनिवार्य विषय के रूप में था परन्तु धर्मनिरपेक्षता की आड़ में सरकार ने इस विषय को पाठ्यक्रम से हटा दिया है। हिन्दू जनता इन सब षड्यंत्रों से सावधान रहे।
                ये समस्त कार्य धर्मनिरपेक्षता की आड़ में ही किए जा रहे हैं। विश्व हिन्दू परिषद हिन्दू धर्म एवं संस्कृति की रक्षा के लिए सन्नद्ध है। हिन्दू जनता से परिषद की अपील है कि वह संगठित होकर नेपाल राष्ट्र की हिन्दू पहचान को प्रस्थापित करने के लिए परिषद के साथ सक्रिय हों।

Saturday, December 1, 2012

उस्ताद आखिर उस्ताद ही होता है


पुष्कर पुष्प की बैंड ...

उस्ताद आखिर उस्ताद होता है  

एक पत्रकार हैं पुष्कर पुष्प.. जोकि एक वेबसाइट चलाते हैं! जोकि कल तक सुधीर/समीर प्रकरण समेत सभी मीडिया जनित मुद्दों पर सवाल उठाने के साथ ही पुण्य प्रसून जैसे वरिष्ठ पत्रकार को कटघरे में खड़ा कर रहे थे, आज स्वयं किसी बात का जवाब न दे पाए.. जब अपनी बारी आई तो जनाब लगभग मुंह काला करने वाले अंदाज़ में ब्लाक कर खिसकते बने .. लीजिए प्रस्तुत है उनकी भद्द पिटने सहित ब्लाक कथा का कुछ अंश : 

आजकल अपने गुरु अजीत-अंजुम जी का जबरदस्त तरीके से बचाव(चाहे इसके लिए हाथापाई/धमकीबाजी ही क्यों न करनी पड़े) कर रहे हैं या यह कहें कि वो अपनी गुरुदक्षिणा दे रहे है तो गलत नही होगा! आज अजीत-अंजुम जी के लिए पूछे गए सवालों पर जबरदस्ती आकर यशवंत सिंह से भीड़ गए, जब वहां भद्द पिटी तो अपने स्टेटस पर बकबक करने लगे.. कभी प्यार-गुस्से की बात तो कभी तिहाड़ में देखने की बाते भी जनाब ने की.. जब मैंने इस विषय पर उन्हें कड़ा जवाब दिया तो जनाब बौखला गए.. जब अंतिम समय में और भी ज्यादा भद्द पिटने की नौबत आई तो ब्लाक करके खिसकते बने.. (अभीतक दूसरों समीर/सुधीर के मामले में कूदकर मजा ले रहे पुष्कर स्वयं ही किसी अन्य को अपनी बातचीत में शामिल होने से रोक दिया.. और वह भी इतने गंदे शब्दों में ..! और फिर बेबस होकर मुझे ब्लाक करके चलते बने..!)प्रिंट स्क्रीन इसीलिए लेकर रखा, क्योंकि उनकी मनोदशा का अंदाज़ा पहले ही चल चुका था..! लेकिन उन्हें कैसे समझाया जाए? कि उस्ताद आखिर उस्ताद ही होता है ..!

कथा को देख आप भी मज़ा उठाएं ..!और जाने पुष्कर पुष्प जैसे कथित सीदे-सादे, सफेदपोश-चेलेनुमा पत्रकार की भद्द कैसे पिटी..! आप एक-एक फोटो देखते जाइए, आपका दिल उन बेचारे की मनोदशा खुद ब खुद अंदाज़ा लगा लेगा...


वैसे मुझे ब्लाक करने के बाद कि अब भद्द पिट ही गई है तो उन्होंने अपने कमेन्ट का एडिटेड वर्जन डाला.. 



Pushkar Pushp यहाँ यशवंत कहाँ आ गए . और मेरे और यशवंत जी के बीच सवाल पूछने वाला तीसरा कौन आ गए. बेहतर होगा कि कहीं के तार कहीं से न जोड़े. यशवंत और पुष्कर एक दूसरे को पांच साल जानते हैं और उन्हें आपस में कुछ समझना - समझाना होगा तो समझा ले. कृपया जबरन कोई पंचैती न करे. यह दो हमपेशा लोगों के बीच की बात है और आपस मे क्या हम बात कर रहे है इसका स्पष्टीकरण जरूरी नहीं. वैसे तिहाड़ वाली हास - परिहास की है. आप दिल पर क्यों लेते हैं. चिल्ल...

अब सवाल यह उठता है कि उन्होंने यह एडिटेड वर्जन क्यों डाला? क्या वह यशवंत से डर गए या मेरे जवाबों से? अगर मेरे जवाबो से डर गए तो कोई बात नहीं .. लेकिन अगर यशवंत से डरकर एडिट किया तो मुझे किस डर की वजह से ब्लाक किया? स्पष्टीकरण जरुरी है..आखिर अपना अपराध भी तो जानने का हक है न? एक तरफ दिल पे न लेने की बात कहते हैं ब्लाक करने के बाद वहीँ दूसरी तरफ ब्लाक भी कर देते हैं.. वाह ..क्या खूब अंदाज़ है जनाब का !

https://www.facebook.com/media/set/?set=a.4539181491530.2168679.1650949861&type=1 
आप मुझे फेसबुक पर भी ढूंढ सकते हैं 
https://www.facebook.com/realfighar 




Tuesday, November 27, 2012

रांची मतलब ‘स्युसाइड सिटी’ !



रांची  में आत्महत्याओं के बढ़ते मामले कम होने का नाम नहीं रहे| हाल के दिनों में झारखंड की राजधानी रांची में आत्महत्याओं का सिलसिला लगातार बढ़ता ही जा रहा हैं| आत्महत्याओं के बढ़ते मामले को देखते हुए रांची को ‘स्युसाइड सिटी’ तक की संज्ञा दी जा रही है| एक रिपोर्ट के मुताबिक इस वर्ष जनवरी से लेकर अबतक सिर्फ रांची में ही 87 आत्महत्याओं के मामले सामने आ चुके हैं|

रांची में अभी दो दिन पहले ही एक के बाद एक हुई आत्महत्या की तीन घटनाओं ने आम लोगों की नींदे उड़ा दी हैं| ऐसे में लोग खौफ में हैं कि कहीं कोई उनका अपना किसी भी प्रकार की घबराहट में आकर ऐसे कदम न उठा ले|

ऐसी घटना मसलन आत्महत्याओं पर रोक लगाने के लिए जरूरी है कि स्कूल, कॉलेज या फिर परिवार में भी इस बात पर चर्चा की जाए कि बच्चों को कैसे इस तरह के कदम उठाने से रोका जाय। बच्चों से इस बात की भी चर्चा की जानी चाहिए कि ऐसे माहौल से कैसे बचा जाए|

इस मुद्दे पर मनोचिकित्सक डॉ. एके. झा का मानना है कि बच्चों में बढ़ती आत्महत्याओं के मामले में उनपर माता-पिता द्वारा डाला गया दवाब प्रमुख कारण है| उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में घबराहट में आकर ऐसे कदम उठा बैठते हैं जोकि आत्मघाती होता है| इन दवाबों में आने के कारण बच्चा चाहकर भी उनसे बात नहीं कर पाता और न अपने मन में चल रही समस्याओं पर किसी से चर्चा कर पाता है| उनपर दवाब होता है कि अगर कम नंबर आए तो डांट पड़ेगी या फिर अच्छे स्कूल/ कॉलेज ने एडमिशन नहीं होगा। अभिभावकों को समझना चाहिए कि हर बच्चा पढ़ाई में ही बेहतर नहीं हो सकता, ऐसे में बच्चों की समझ के अनुसार उन्हें उसी क्षेत्र में आगे बढ़ने का मनोबल प्रदान करने और अपनी तरफ से ज्यादा दवाब न देने की कोशिश करनी चाहिए।

आत्महत्या के मसले पर लम्बे अरसे से बहस चल रही है। कई सारे कार्यक्रम भी चलाए गए, कुछ मामले में इसके आंकड़ों में कमियां भी आई है। जरुरत है जागरूकता अभियान को जोर शो से चलाने की  ताकि  आत्महत्याओं के मामलों को बच्चो के बीच रख उन्हें जागरूक किया जा सके, जिससे कोई भी बच्चा इस तरह के कदम न उठाए।

गौरतलब है कि बीते 25 नवम्बर को ही आत्महत्या की तीन घटनाएं सामने आई थी| जिनमें एक छात्र, एक छात्रा व एक अन्य व्यक्ति शामिल हैं|
साभार : महुआ न्यूज

Saturday, November 17, 2012

इस्लाम धर्म के बारे में विभिन्न विचारकों के मत

निम्नलिखित विभिन्न विचारकों की बातें मैंने कई स्थान पर समय-२ पर पढ़ी हैं. लोगो को सत्य का अधिक से अधिक और जल्द से जल्द पता लगे इसलिए मैं भी इन बातों को अपने ब्लॉग पर डाल रहा हूँ. मानवता की भलाई के लिये प्रत्येक हिन्दू को ये विचार जानना और इसका प्रसार करना अतिआवश्यक है ताकि सभी जागृत रहें और जेहादियों के छलावे में कभी न आयें.

महर्षि दयानन्द सरस्वती

इस मजहब में अल्लाह और रसूल के वास्ते संसार को लुटवाना और लूट के माल में खुदा को हिस्सेदार बनाना शबाब का काम हैं । जो मुसलमान नहीं बनते उन लोगों को मारना और बदले में बहिश्त को पाना आदि पक्षपात की बातें ईश्वर की नहीं हो सकती । श्रेष्ठ गैर मुसलमानों से शत्रुता और दुष्ट मुसलमानों से मित्रता , जन्नत में अनेक औरतों और लौंडे होना आदि निन्दित उपदेश कुएं में डालने योग्य हैं । अनेक स्त्रियों को रखने वाले मुहम्मद साहब निर्दयी , राक्षस व विषयासक्त मनुष्य थें , एवं इस्लाम से अधिक अशांति फैलाने वाला दुष्ट मत दसरा और कोई नहीं । इस्लाम मत की मुख्य पुस्तक कुरान पर हमारा यह लेख हठ , दुराग्रह , ईर्ष्या विवाद और विरोध घटाने के लिए लिखा गया , न कि इसको बढ़ाने के लिए । सब सज्जनों के सामन रखने का उद्देश्य अच्छाई को ग्रहण करना और बुराई को त्यागना है ।।

-सत्यार्थ प्रकाश १४ वां समुल्लास विक्रमी २०६१


स्वामी विवेकानन्द
ऎसा कोई अन्य मजहब नहीं जिसने इतना अधिक रक्तपात किया हो और अन्य के लिए इतना क्रूर हो । इनके अनुसार जो कुरान को नहीं मानता कत्ल कर दिया जाना चाहिए । उसको मारना उस पर दया करना है । जन्नत (जहां हूरे और अन्य सभी प्रकार की विलासिता सामग्री है) पाने का निश्चित तरीका गैर ईमान वालों को मारना है । इस्लाम द्वारा किया गया रक्तपात इसी विश्वास के कारण हुआ है । -कम्प्लीट वर्क आफ विवेकानन्द वॉल्यूम २ पृष्ठ २५२-२५३

गुरु नानक देव जी

मुसलमान सैय्यद , शेख , मुगल पठान आदि सभी बहुत निर्दयी हो गए हैं । जो लोग मुसलमान नहीं बनते थें उनके शरीर में कीलें ठोककर एवं कुत्तों से नुचवाकर मरवा दिया जाता था ।
-नानक प्रकाश तथा प्रेमनाथ जोशी की पुस्तक पैन इस्लाममिज्म रोलिंग बैंक पृष्ठ ८०

महर्षि अरविन्द

हिन्दू मुस्लिम एकता असम्भव है क्योंकि मुस्लिम कुरान मत हिन्दू को मित्र रूप में सहन नहीं करता । हिन्दू मुस्लिम एकता का अर्थ हिन्दुओं की गुलामी नहीं होना चाहिए । इस सच्चाई की उपेक्षा करने से लाभ नहीं ।किसी दिन हिन्दुओं को मुसलमानों से लड़ने हेतु तैयार होना चाहिए । हम भ्रमित न हों और समस्या के हल से पलायन न करें । हिन्दू मुस्लिम समस्या का हल अंग्रेजों के जाने से पहले सोच लेना चाहिए अन्यथा गृहयुद्ध के खतरे की सम्भावना है । ।
-ए बी पुरानी इवनिंग टाक्स विद अरविन्द पृष्ठ २९१-२८९-६६६ 

सरदार वल्लभ भाई पटेल

मैं अब देखता हूं कि उन्हीं युक्तियों को यहां फिर अपनाया जा रहा है जिसके कारण देश का विभाजन हुआ था । मुसलमानों की पृथक बस्तियां बसाई जा रहीं हैं । मुस्लिम लीग के प्रवक्ताओं की वाणी में भरपूर विष है । मुसलमानों को अपनी प्रवृत्ति में परिवर्तन करना चाहिए । मुसलमानों को अपनी मनचाही वस्तु पाकिस्तान मिल गया हैं वे ही पाकिस्तान के लिए उत्तरदायी हैं , क्योंकि मुसलमान देश के विभाजन के अगुआ थे न कि पाकिस्तान के वासी । जिन लोगों ने मजहब के नाम पर विशेष सुविधांए चाहिंए वे पाकिस्तान चले जाएं इसीलिए उसका निर्माण हुआ है । वे मुसलमान लोग पुनः फूट के बीज बोना चाहते हैं । हम नहीं चाहते कि देश का पुनः विभाजन हो ।
-संविधान सभा में दिए गए भाषण का सार ।


बाबा साहब भीम राव अंबेडकर 
हिन्दू मुस्लिम एकता एक अंसभव कार्य हैं भारत से समस्त मुसलमानों को पाकिस्तान भेजना और हिन्दुओं को वहां से बुलाना ही एक हल है । यदि यूनान तुर्की और बुल्गारिया जैसे कम साधनों वाले छोटे छोटे देश यह कर सकते हैं तो हमारे लिए कोई कठिनाई नहीं । साम्प्रदायिक शांति हेतु अदला बदली के इस महत्वपूर्ण कार्य को न अपनाना अत्यंत उपहासास्पद होगा । विभाजन के बाद भी भारत में साम्प्रदायिक समस्या बनी रहेगी । पाकिस्तान में रुके हुए अल्पसंख्यक हिन्दुओं की सुरक्षा कैसे होगी ? मुसलमानों के लिए हिन्दू काफिर सम्मान के योग्य नहीं है । मुसलमान की भातृ भावना केवल मुसमलमानों के लिए है । कुरान गैर मुसलमानों को मित्र बनाने का विरोधी है , इसीलिए हिन्दू सिर्फ घृणा और शत्रुता के योग्य है । मुसलामनों के निष्ठा भी केवल मुस्लिम देश के प्रति होती है । इस्लाम सच्चे मुसलमानो हेतु भारत को अपनी मातृभूमि और हिन्दुओं को अपना निकट संबधी मानने की आज्ञा नहीं देता । संभवतः यही कारण था कि मौलाना मौहम्मद अली जैसे भारतीय मुसलमान भी अपेन शरीर को भारत की अपेक्षा येरूसलम में दफनाना अधिक पसन्द किया । कांग्रेस में मुसलमानों की स्थिति एक साम्प्रदायिक चौकी जैसी है । गुण्डागर्दी मुस्लिम राजनीति का एक स्थापित तरीका हो गया है । इस्लामी कानून समान सुधार के विरोधी हैं । धर्म निरपेक्षता को नहीं मानते । मुस्लिम कानूनों के अनुसार भारत हिन्दुओं और मुसलमानों की समान मातृभूमि नहीं हो सकती । वे भारत जैसे गैर मुस्लिम देश को इस्लामिक देश बनाने में जिहाद आतंकवाद का संकोच नहीं करते ।
-प्रमाण सार डा अंबेडकर सम्पूर्ण वाग्मय , खण्ड १५१

माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर गुरू जी
पाकिस्तान बनने के पश्चात जो मुसलमान भारत में रह गए हैं क्या उनकी हिन्दुओं के प्रति शत्रुता , उनकी हत्या , लूट दंगे, आगजनी , बलात्कार , आदि पुरानी मानसिकता बदल गयी है , ऐसा विश्वास करना आत्मघाती होगा । पाकिस्तान बनने के पश्चात हिन्दुओं के प्रति मुस्लिम खतरा सैकड़ों गुणा बढ़ गया है । पाकिस्तान और बांग्लादेश से घुसपैठ बढ़ रही है । दिल्ली से लेकर रामपुर और लखनउ तक मुसलमान खतरनाक हथियारों की जमाखोरी कर रहे हैं । ताकि पाकिस्तान द्वारा भारत पर आक्रमण करने पर वे अपने भाइयों की सहायता कर सके । अनेक भारतीय मुसलमान ट्रांसमीटर के द्वारा पाकिस्तान के साथ लगातार सम्पर्क में हैं । सरकारी पदों पर आसीन मुसलमान भी राष्ट्र विरोधी गोष्ठियों में भाषण देते हें । यदि यहां उनके हितों को सुरक्षित नहीं रखा गया तो वे सशस्त्र क्रांति के खड़े होंगें ।
-बंच आफ थाट्स पहला आंतरिक खतरा मुसलमान पृष्ठ १७७-१८७


गुरूदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर
ईसाई व मुसलमान मत अन्य सभी को समाप्त करने हेतु कटिबद्ध हैं । उनका उद्देश्य केवल अपने मत पर चलना नहीं है अपितु मानव धर्म को नष्ट करना है । वे अपनी राष्ट्र भक्ति गैर मुस्लिम देश के प्रति नहीं रख सकते । वे संसार के किसी भी मुस्लिम एवं मुस्लिम देश के प्रति तो वफादार हो सकते हैं परन्तु किसी अन्य हिन्दू या हिन्दू देश के प्रति नहीं । सम्भवतः मुसलमान और हिन्दू कुछ समय के लिए एक दूसरे के प्रति बनवटी मित्रता तो स्थापित कर सकते हैं परन्तु स्थायी मित्रता नहीं ।
- रवीन्द्र नाथ वाडमय २४ वां खण्ड पृच्च्ठ २७५ , टाइम्स आफ इंडिया १७-०४-१९२७ , कालान्तर
लाला लाजपत राय

मुस्लिम कानून और मुस्लिम इतिहास को पढ़ने के पश्चात मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि उनका मजहब उनके अच्छे मार्ग में एक रुकावट है । मुसलमान जनतांत्रिक आधार पर हिन्दुस्तान पर शासन चलाने हेतु हिन्दुओं के साथ एक नहीं हो सकते । क्या कोई मुसलमान कुरान के विपरीत जा सकता है ? हिन्दुओं के विरूद्ध कुरान और हदीस की निषेधाज्ञा की क्या हमें एक होने देगी ? मुझे डर है कि हिन्दुस्तान के ७ करोड़ मुसलमान अफगानिस्तान , मध्य एशिया अरब , मैसोपोटामिया और तुर्की के हथियारबंद गिरोह मिलकर अप्रत्याशित स्थिति पैदा कर देंगें ।
-पत्र सी आर दास बी एस ए वाडमय खण्ड १५ पृष्ठ २७५


समर्थ गुरू राम दास जी
छत्रपति शिवाजी महाराज के गुरू अपने ग्रंथ दास बोध में लिखते हैं कि मुसलमान शासकों द्वारा कुरान के अनुसार काफिर हिन्दू नारियों से बलात्कार किए गए जिससे दुःखी होकर अनेकों ने आत्महत्या कर ली । मुसलमान न बनने पर अनेक कत्ल किए एवं अगणित बच्चे अपने मां बाप को देखकर रोते रहे । मुसलमान आक्रमणकारी पशुओं के समान निर्दयी थे , उन्होंने धर्म परिवर्तन न करने वालों को जिन्दा ही धरती में दबा दिया ।
- डा एस डी कुलकर्णी कृत एन्कांउटर विद इस्लाम पृष्ठ २६७-२६८


राजा राममोहन राय 
मुसलमानों ने यह मान रखा है कि कुरान की आयतें अल्लाह का हुक्म हैं । और कुरान पर विश्वास न करने वालों का कत्ल करना उचित है । इसी कारण मुसलमानों ने हिन्दुओं पर अत्यधिक अत्याचार किए , उनका वध किया , लूटा व उन्हें गुलाम बनाया ।
-वाङ्मय-राजा राममोहन राय पृष्ट ७२६-७२७

श्रीमति ऐनी बेसेन्ट
मुसलमानों के दिल में गैर मुसलमानों के विरूद्ध नंगी और बेशर्मी की हद तक तक नफरत हैं । हमने मुसलमान नेताओं को यह कहते हुए सुना है कि यदि अफगान भारत पर हमला करें तो वे मसलमानों की रक्षा और हिन्दुओं की हत्या करेंगे । मुसलमानों की पहली वफादार मुस्लिम देशों के प्रति हैं , हमारी मातृभूमि के लिए नहीं । यह भी ज्ञात हुआ है कि उनकी इच्छा अंग्रेजों के पश्चात यहां अल्लाह का साम्राज्य स्थापित करने की है न कि सारे संसार के स्वामी व प्रेमी परमात्मा का । स्वाधीन भारत के बारे में सोचते समय हमें मुस्लिम शासन के अंत के बारे में विचार करना होगा ।
- कलकत्ता सेशन १९१७ डा बी एस ए सम्पूर्ण वाङ्मय खण्ड, पृष्ठ २७२-२७५


स्वामी रामतीर्थ 

अज्ञानी मुसलमानों का दिल ईश्वरीय प्रेम और मानवीय भाईचारे की शिक्षा के स्थान पर नफरत , अलगाववाद , पक्षपात और हिंसा से कूट कूट कर भरा है । मुसलमानों द्वारा लिखे गए इतिहास से इन तथ्यों की पुष्टि होती है । गैर मुसलमानों आर्य खालसा हिन्दुओं की बढ़ी संख्या में काफिर कहकर संहार किया गया । लाखों असहाय स्त्रियों को बिछौना बनाया गया । उनसे इस्लाम के रक्षकों ने अपनी काम पिपासा को शान्त किया । उनके घरों को छीना गया और हजारों हिन्दुओं को गुलाम बनाया गया । क्या यही है शांति का मजहब इस्लाम ? कुछ एक उदाहरणों को छोड़कर अधिकांश मुसलमानों ने गैरों को काफिर माना है । - भारतीय महापुरूषों की दृष्टि में इस्लाम पृष्ठ ३५-३६ 





२०१० में संकलन.. समय की कमी के चलते प्रकाशन नहीं ..! प्रकाशन १७ नवंबर २०१२
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